इस सूत्र में चित्त के समाधि परिणाम का वर्णन है। चित्त का विविध विषयों में प्रवृत्त होना अर्थात् व्यक्ति के द्वारा चित्त को अनेक विषयों में लगा देना, यह सर्वार्थता है। अभ्यास वैराग्य के द्वारा उसको योग से सम्बद्ध किसी एक विषय में स्थिर कर देना यह एकाग्रता है। सर्वार्थता चित्त का धर्म है। एकाग्रता भी चित्त का धर्म है। योगी द्वारा प्रयत्न से चित्त की सर्वार्थता दूर कर दी जाती है। अर्थात् उसका क्षय = (तिरोभाव) कर दिया जाता है। चित्त में एकाग्रता को वह उत्पन्न कर देता है। सर्वार्थता और एकाग्रता इन दोनों धर्मों में धर्मीरूप से चित्त सम्बद्ध रहता है। यह चित्त की सर्वार्थता का हट जाना और किसी एक पदार्थ में एकाग्र हो जाना चित्त का 'समाधि परिणाम' है।।
चित्त को क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त अवस्थाओं से रोककर, योग से सम्बद्ध किसी एक विषय में अधिकारपूर्वक स्थिर करना साधक का कर्तव्य है। अपने आप चित्त एकाग्रता को प्राप्त नहीं होता। यद्यपि एकाग्रता चित्त का धर्म है। परन्तु यह स्वयं उत्पन्न नहीं होता। सर्वार्थता भी चित्त का ही धर्म हैं। यह भी स्वयं उत्पन्न नहीं होता। इन दोनों को उत्पन्न करने वाला जीवात्मा है। यदि व्यक्ति यह मानता है कि चित्त एक चेतन वस्तु है, वह स्वयं चंचल होता है और स्वयं एकाग्र होता है तो उसका चित्त को अधिकारपूर्वक दीर्घकाल तक एकाग्र करना असम्भव है। योगाभ्यासी और भौतिक वैज्ञानिक जो चित्त को जड़ न भी जान पाये हों, वे योग के प्रति श्रद्धा होने और अत्यन्त परिश्रम करने के कारण मन को किसी सीमा तक एकाग्र करते हैं। उस स्थिति में आत्मा, परमात्मा, मन आदि पदार्थों का साक्षात्कार नहीं कर सकते। वे दीर्घकाल पर्यन्त साधिकार किसी विषय में मन को एकाग्र नहीं कर सकते। इसलिए मन को जड़ और प्रकृति से उत्पन्न जानकर एकाग्र करने का अभ्यास करना चाहिये॥११॥