तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात्॥१०॥
शब्दार्थ - (तस्य) उस चित्त का (प्र-शान्त-वाहिता) प्रशान्तरूप से रहना (संस्कारात्) निरोध संस्कारों से होता है।
सूत्रार्थ - निरोध संस्कारों के लगातार अभ्यास से निरोध अवस्था वाले चित्त की, व्युत्थान संस्कार रूप मल से रहित, निरोध संस्कार परम्परामात्र-वहनशील स्थिति होती है अर्थात् उस काल में निरोध संस्कारों के विमलधाराप्रवाह से चित्त युक्त हो जाता है।