नाभिचक्रे, हृदयपुण्डरीके, मूर्ध्नि ज्योतिषि, नासिकाग्रे, जिह्वाग्र इत्येवमादिषु देशेषु बाह्ये वा विषये चित्तस्य वृत्तिमात्रेण बन्ध इति धारणा॥१॥
व्या० भा० अ० - नाभि चक्र में, हृदय कमल में, मस्तकगत प्रकाश में, नासिका के अग्र भाग में, जिह्वा के अग्रभाग आदि प्रदेशों में अथवा बाह्य विषय में चित्त का केवल वृत्ति से बाँधना 'धारणा' कही जाती है॥१॥
विशेष - योगदर्शन के इस विभूतिपाद में योग के अन्तरंग साधनों धारणा, ध्यान - तथा समाधि और योगाभ्यास के द्वारा योगी को जो विभूतियाँ प्राप्त होती हैं उनका वर्णन है। योगाभ्यास के करने से जो ज्ञान, बल, स्वास्थ्य आदि की प्राप्ति, मन, इन्द्रियों पर विजय प्राप्तिरूप ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं, उनको 'विभूति' कहते हैं।