Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 2/9

2/9
Sutra
स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः ।। २.९ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः॥९॥

शब्दार्थ - (स्व-रस-वाही) मृत्यु दुःख के अनुभव से जो संस्कार बनता है, उस संस्कार से उत्पन्न होनेवाला (विदुषः) शाब्दिक विद्वान् अर्थात् योग की ऊँची स्थिति को न प्राप्त करने वाले विद्वानों में और साधारण मनुष्यों में तथा अन्य प्राणियों में (अपि) भी (तथाआरूढः) समान रूप से विद्यमान मृत्यु का भय (अभिनिवेश:) 'अभिनिवेश क्लेश' है। 

सूत्रार्थ - योग की ऊँची स्थिति को अप्राप्त विद्वानों में और साधारण मनुष्यों में तथा अन्य प्राणियों में भी समानरूप से विद्यमान मृत्यु दुःख से जो संस्कार बनता है, उस संस्कार से उत्पन्न होने वाला भय 'अभिनिवेश क्लेश' कहलाता है।

Vyas Bhashya

सर्वस्य प्राणिन इयमात्माशीर्नित्या भवति मा न भूवं भूयासमिति। न चाननुभूतमरणधर्मकस्यैषा भवत्यात्माशीः। एतया च पूर्वजन्मानुभवः प्रतीयते। स चायमभिनिवेशः क्लेशः स्वरसवाही, कृमेरपि जातमात्रस्य प्रत्यक्षानुमानागमैरसंभावितो मरणत्रास उच्छेददृष्टयात्मकः पूर्वजन्मानुभूतं मरण दुःखमनुमापयति।

यथा चायमत्यन्तमूढेषु दृश्यते क्लेशस्तथा विदुषोऽपि विज्ञातपूर्वापरान्तस्य रूढः। कस्मात् ? समाना हि तयोः कुशलाकुशलयोर्मरणदुःखानुभवादियं वासनेति॥९॥

व्या० भा० अ० - प्रत्येक प्राणी की यह नित्य आत्मेच्छा होती है कि मैं न होऊँ ऐसा न हो किन्तु मैं होऊँ (अर्थात् सदा रहूँ)। मरण धर्म के अनुभव के बिना यह आत्मेच्छा नहीं होती। इसके द्वारा पूर्वजन्म का अनुभव सिद्ध होता है। और यह अभिनिवेश क्लेश अपने संस्कार से, केवल जन्मे हुए कृमि का भी प्रत्यक्षानुमानागमों द्वारा असम्भावित मरणभय उच्छेद स्वरूप (यह क्लेश) पूर्वजन्म में अनुभूत मरण दुःख को जनाता है।

अत्यन्त मूढ़ों में जिस प्रकार यह क्लेश दिखता है, उसी प्रकार आदि और अन्त जानने वाले विद्वान् में भी विद्यमान है। क्यों ? मरण दुःख के अनुभव करने के कारण यह वासना उन ज्ञानी एवं अज्ञानी दोनों में समान रूप से होती है॥। ९॥

Yog Prakash

इस सूत्र में अभिनिवेश क्लेश का वर्णन है। मृत्युभय को 'अभिनिवेश' कहते हैं। यह क्लेश साधारण मनुष्य से लेकर विद्वानों तक के जीवन में भी देखा जाता है। यहाँ पर उन विद्वानों का ग्रहण करना चाहिये, जो अभी योगाभ्यास के द्वारा आत्मा, परमात्मा का साक्षात्कार करके समाधि की परिपक्व अवस्था में नहीं पहुँचे हैं। जैसे पूर्वजन्म में साधारण आत्माओं ने मरण दुःख का अनुभव किया था, वैसे ही विद्वान् आत्माओं ने भी पूर्वजन्म में अनुभव किया था। इसलिये मरण दुःख की अनुभूति के संस्कार दोनों में समान रूप से हैं। मृत्यु से भय करने वाले व्यक्ति ने न तो इस जन्म में प्रत्यक्ष प्रमाण से मृत्यु दुःख का अनुभव किया है और न ही शब्द प्रमाण से जाना है। इससे यह सिद्ध होता है कि उसने पूर्वजन्म में प्रत्यक्ष प्रमाण से मृत्यु दुःख का अनुभव किया है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि जीवात्मा अनादि है। यदि आत्मा शरीर नाश के साथ ही नष्ट हो गया होता तो इस जन्म में मृत्यु से न डरता।

जब व्यक्ति यह जान जाता है कि आत्मा अनादि और नाश रहित है तब उसको मृत्यु से भय नहीं होता। क्योंकि शरीर के उत्पन्न होने से न आत्मा की उत्पत्ति होती है और न उसके विनाश से विनाश होता है। इस विषय में यह शंका उत्पन्न होती है कि जीवात्मा उत्पत्ति-विनाश रहित क्यों है ? इसका समाधान यह है "कारणाभावात् कार्याभाव:॥ वैशेषिक १-२-१॥ कारण के अभाव होने पर कार्य उत्पन्न नहीं होता। किसी भी पदार्थ की उत्पत्ति के तीन कारण होते हैं एक निमित्त कारण, दूसरा उपादान कारण, तीसरा साधारण कारण। जैसे घड़े की उत्पत्ति में कुम्हार निमित्त कारण, मिट्टी उपादान कारण और दण्ड, चाक आदि साधारण कारण हैं। वैसे जीवात्मा के तीन उत्पादक कारण नहीं हैं अतः आत्मा की उत्पत्ति नहीं होती। इसी प्रकार से विनाश के तीन कारण न होने से उसका विनाश भी नहीं होता। वेद से भी यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा अनादि है। जब अच्छे प्रकार से व्यक्ति यह जान लेता है कि ईश्वर, जीव और प्रकृति अनादि हैं और इनका कभी विनाश भी नहीं होता, तब मृत्यु भय से मुक्त हो जाता है। सांसारिक पदार्थों को अपना मानने से, उनके सुख को दुःखरहित मानने से और उन पदार्थों को नित्य मानने से मृत्यु से भय होता है परन्तु उन पदार्थों को ईश्वर का मानने से, उनके सुख को दुःखमिश्रित तथा अनित्य मानने से और उन पदार्थों को अनित्य मानने से अभिनिवेश क्लेश की निवृत्ति होती है। इन अविद्या आदि पाँच क्लेशों का विनाश करके मोक्ष को सिद्ध करना ही मानव जीवन का मुख्य प्रयोजन है॥९॥

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