इस सूत्र में अभिनिवेश क्लेश का वर्णन है। मृत्युभय को 'अभिनिवेश' कहते हैं। यह क्लेश साधारण मनुष्य से लेकर विद्वानों तक के जीवन में भी देखा जाता है। यहाँ पर उन विद्वानों का ग्रहण करना चाहिये, जो अभी योगाभ्यास के द्वारा आत्मा, परमात्मा का साक्षात्कार करके समाधि की परिपक्व अवस्था में नहीं पहुँचे हैं। जैसे पूर्वजन्म में साधारण आत्माओं ने मरण दुःख का अनुभव किया था, वैसे ही विद्वान् आत्माओं ने भी पूर्वजन्म में अनुभव किया था। इसलिये मरण दुःख की अनुभूति के संस्कार दोनों में समान रूप से हैं। मृत्यु से भय करने वाले व्यक्ति ने न तो इस जन्म में प्रत्यक्ष प्रमाण से मृत्यु दुःख का अनुभव किया है और न ही शब्द प्रमाण से जाना है। इससे यह सिद्ध होता है कि उसने पूर्वजन्म में प्रत्यक्ष प्रमाण से मृत्यु दुःख का अनुभव किया है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि जीवात्मा अनादि है। यदि आत्मा शरीर नाश के साथ ही नष्ट हो गया होता तो इस जन्म में मृत्यु से न डरता।
जब व्यक्ति यह जान जाता है कि आत्मा अनादि और नाश रहित है तब उसको मृत्यु से भय नहीं होता। क्योंकि शरीर के उत्पन्न होने से न आत्मा की उत्पत्ति होती है और न उसके विनाश से विनाश होता है। इस विषय में यह शंका उत्पन्न होती है कि जीवात्मा उत्पत्ति-विनाश रहित क्यों है ? इसका समाधान यह है "कारणाभावात् कार्याभाव:॥ वैशेषिक १-२-१॥ कारण के अभाव होने पर कार्य उत्पन्न नहीं होता। किसी भी पदार्थ की उत्पत्ति के तीन कारण होते हैं एक निमित्त कारण, दूसरा उपादान कारण, तीसरा साधारण कारण। जैसे घड़े की उत्पत्ति में कुम्हार निमित्त कारण, मिट्टी उपादान कारण और दण्ड, चाक आदि साधारण कारण हैं। वैसे जीवात्मा के तीन उत्पादक कारण नहीं हैं अतः आत्मा की उत्पत्ति नहीं होती। इसी प्रकार से विनाश के तीन कारण न होने से उसका विनाश भी नहीं होता। वेद से भी यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा अनादि है। जब अच्छे प्रकार से व्यक्ति यह जान लेता है कि ईश्वर, जीव और प्रकृति अनादि हैं और इनका कभी विनाश भी नहीं होता, तब मृत्यु भय से मुक्त हो जाता है। सांसारिक पदार्थों को अपना मानने से, उनके सुख को दुःखरहित मानने से और उन पदार्थों को नित्य मानने से मृत्यु से भय होता है परन्तु उन पदार्थों को ईश्वर का मानने से, उनके सुख को दुःखमिश्रित तथा अनित्य मानने से और उन पदार्थों को अनित्य मानने से अभिनिवेश क्लेश की निवृत्ति होती है। इन अविद्या आदि पाँच क्लेशों का विनाश करके मोक्ष को सिद्ध करना ही मानव जीवन का मुख्य प्रयोजन है॥९॥