Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 2/8

2/8
Sutra
दुःखानुशयी द्वेषः ।। २.८ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

दुःखानुशयी द्वेषः॥८॥

शब्दार्थ - (दुःख-अनुशयी) दुःख भोगने के पश्चात् अन्त:करण में दुःख और दुःख के साधनों के प्रति रहने वाली जो विनाश की इच्छा, क्रोध, आक्रोश है (द्वेषः) द्वेष नामक क्लेश है। 

सूत्रार्थ - दुःख भोगने के पश्चात् दुःख और दुःख के साधनों के प्रति अन्तःकरण में रहने वाली जो विनाश की इच्छा, क्रोध, आक्रोश है, वह 'द्वेष' नामक क्लेश कहलाता है। 

Vyas Bhashya

व्या० भा० - दुःखाभिज्ञस्य दुःखानुस्मृतिपूर्वो दुःखे तत्साधने वा यः प्रतिघो मन्युर्जिघांसा क्रोधः द्वेष इति॥८॥

व्या० भा० अ० - दुःख को जानने वाले का दुःख स्मरणपूर्वक दुःख वा दुःख के साधन में जो प्रतिकार करने का भाव, क्रोध करने का (मानसिक), भाव मारने की इच्छा; क्रोध है, वह 'द्वेष' है॥८॥

Yog Prakash

इस सूत्र में 'द्वेष' का स्वरूप बतलाया है। जब व्यक्ति दुःख और उसके साधनों का अनुभव करता है, तब उस अनुभव से चित्त में संस्कार उत्पन्न होते हैं। उन संस्कारों से स्मृति उत्पन्न होती है। उस स्मृति से द्वेष की उत्पत्ति होती है। यह द्वेष का स्वरूप है। द्वेष को उत्पन्न करने वाले संस्कार इस जन्म और पूर्व जन्म के भी होते हैं। दुःख को उत्पन्न करने वाले जड़-चेतन पदार्थों का व्यक्ति प्रतिकार करता है और उनके अस्तित्व को समाप्त करना चाहता है। यही द्वेष है। इस द्वेष के कारण व्यक्ति अन्यायपूर्वक विविध प्राणियों की हिंसा करता रहता है। इससे पाप की राशि संगृहीत हो जाती है। पाप कर्मों के कारण आत्मा को पशु आदि नीच योनियों में जाना पड़ता है।

द्वेष और राग का परस्पर सम्बन्ध है। यदि राग रुक जाता है तो द्वेष भी रुक जाता है। जो साधन राग के हटाने में कारण हैं वे द्वेष के हटाने में भी कारण हैं। योगाभ्यासी को यह जानना चाहिये कि द्वेष ईश्वरप्राप्ति में बाधक है और उसके उपदेश के विरुद्ध है। उसका उपदेश है कि मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे...॥ यजु० ३६ / ९८॥ अर्थात् सभी प्राणी परस्पर मित्र की दृष्टि से देखें। ऐसा समझने से द्वेष की निवृत्ति होती है। ईश्वर को प्राणिमात्र का माता - पिता मानने से भी द्वेष की निवृत्ति होती है। वेद में ईश्वर का आदेश है - त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता शतक्रतो बभूविथ.....॥ ऋ. ८/९८ / ११॥ अर्थात् सभी प्राणी मुझे माता, पिता समझें। द्वेष को छोड़ने और मित्रता का व्यवहार करने से तथा परस्पर का सहयोग से सबकी उन्नति होती है। इसके विपरीत द्वेष से अवनति होती है। इसलिये अविद्या का निराकरण आदि उपायों से द्वेष को हटाना चाहिये॥८॥

All Bhashya Sutras