इस सूत्र में अस्मिता क्लेश का लक्षण किया है। जीवात्मा दृक्शक्ति-चेतन पदार्थ। बुद्धि दर्शनशक्ति दिखाने का साधन और एक जड़ पदार्थ है। जीवात्मा भोक्ता है। बुद्धि उसका भोग्य है। इन दोनों में परस्पर किसी प्रकार का सम्मिश्रण नहीं है। बुद्धि परिणामिनी है। आत्मा अपरिणामी है। आत्मा स्वभाव से शुद्ध है, प्रकृति से सम्बन्ध होने पर उसमें अविद्या, अधर्मादि दोष उत्पन्न होते हैं। अतः वह अशुद्ध हो जाता है। यद्यपि बुद्धि सत्त्वगुण प्रधान है। उसमें तमोगुण और रजोगुण का संमिश्रण होने से अशुद्धि बनी रहती है। आत्मा और बुद्धि दोनों भिन्न पदार्थ होने पर भी अविद्या के कारण दोनों एक प्रतीत होते हैं, यह अस्मिता क्लेश का स्वरूप है। जिस प्रकार बुद्धि को और स्वयं को आत्मा एक समझता है वैसे ही मन, इन्द्रियाँ और शरीर इनको और आत्मा को भी एक समझता है। काम, क्रोध, लोभ, अहंकार, सुख, दुःख ये प्रकृति के गुण हैं। परन्तु अज्ञानता के कारण जीवात्मा इनको अपने गुण मानता है। अपने स्वाभाविक गुण मान लेने पर इनको दूर करने का प्रयास नहीं करता। बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और शरीर आदि जड़ पदार्थों का और आत्मा का वास्तविक स्वरूप ज्ञात हो जाने पर भोग की स्थिति समाप्त हो जाती है और मोक्ष की स्थिति आ जाती है।
इस अविद्या के निराकरण के लिये सांख्यदर्शनकार ने कहा है कि "देहादिव्यतिरिक्तोऽसौ वैचित्र्यात्"॥६/२॥अर्थात् शरीर आदि समस्त जड़ पदार्थों से आत्मा भिन्न है। "षष्ठी व्यपदेशादपि "॥ सांख्य० ६ / ३।। संसार में षष्ठी विभक्ति का प्रयोग देखने में आता है। व्यक्तियह कहता है कि यह मेरा हाथ है, यह मेरा पैर है। इससे सिद्ध होता है कि इनको मेरा कहने वाला पृथक् है और ये सब उससे पृथक् हैं। इस प्रकार से तत्त्वज्ञान होने से अविद्या की निवृत्ति हो जाती है। अविद्या की निवृत्ति होने से अस्मिता की निवृत्ति हो जाती है। यहाँ एक प्रश्न उपस्थित होता है कि अविद्या के रहने पर भोग होता है और उसके न रहने पर भोग नहीं रहता तो जीवनमुक्त देहधारी योगी भी प्राकृतिक पदार्थों को खाते पीते हैं, क्या वह भोग नहीं है ? इसका समाधान यह है कि अविद्यायुक्त सांसारिक जन खाने पीने में सुख समझते हैं। परन्तु योगी उन पदार्थों का प्रयोग शरीर, इन्द्रियों को स्वस्थ बनाने और जीवन रक्षा के लिये करता है, सुख के लिये नहीं।
यहाँ पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि जैसे-जैसे अविद्या न्यून होती जाती है वैसे वैसे अस्मिता क्लेश भी निर्बल होता जाता है। उसके निर्बल होने से मिथ्या अभिमान की निवृत्ति होती है और व्यक्ति निरभिमानी बन जाता है। संसार में यह देखा जाता है, मनुष्य यह मानता है कि मैं बलवान् हूँ, रूपवान् हूँ, बड़ी अवस्था वाला हूँ, उपाधि वाला हूँ, अनुसन्धान करके विश्वविख्यात उपाधि प्राप्त करने वाला हूँ, विश्वविख्यात वैज्ञानिक हूँ, राजा हूँ, आदि-आदि। इस क्लेश के कारण अल्प सामर्थ्य वाला होकर भी मानव अपने को अधिक सामर्थ्य वाला मानता है। यह भयंकर अहंकार अस्मिता क्लेश से उत्पन्न होता है। उससे संसार में बहुत समस्याएँ एवं दुःख उत्पन्न होते हैं। इसलिये अविद्या को दूर करके अस्मिता क्लेश का निवारण करना चाहिये॥६॥