स्वविषयसंप्रयोगाभावे चित्तस्वरूपानुकार इवेति चित्तनिरोधे चित्तवन्निरुद्धानीन्द्रियाणि नेतरेन्द्रियजयवदुपायान्तरमपेक्षते। यथा मधुकरराजं मक्षिका उत्पतन्तमनूत्पतन्ति निविशमानमनुनिविशन्ते तथेन्द्रियाणि चित्तनिरोधे निरुद्धानीत्येष प्रत्याहारः॥५४॥
व्या० भा० अ० - इन्द्रियों का अपने-अपने विषयों के साथ संयोग न होने पर चित्त के स्वरूप का अनुकरण करना अर्थात् चित्त के निरुद्ध होने पर चित्त के समान इन्द्रियाँ निरुद्ध हो जाती हैं, इतर इन्द्रिय जय के समान दूसरे उपाय की अपेक्षा नहीं रखती। जिस प्रकार मधु मक्खियों की रानी के उड़ने पर मधुमक्खियाँ उड़ती है, बैठने पर बैठती हैं उसी प्रकार इन्द्रियाँ चित्त के निरोध होने पर निरुद्ध होती हैं, यह 'प्रत्याहार' है॥५४॥