Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 2/53

2/53
Sutra
धारणासु च योग्यता मनसः ।। २.५३ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Inception

अव० - किञ्च -

अर्थ - (प्राणायाम से) और क्या (लाभ) होता है (यह सूत्र से कहा जाता है) -

Word Meaning

धारणासु च योग्यता मनसः॥५३॥

शब्दार्थ - (धारणासु) धारणाओं में () और (योग्यता) सामर्थ्य (मनसः) मन की होती है। 

सूत्रार्थ - और उस प्राणायाम के अनुष्ठान से धारणाओं में अर्थात् मस्तिष्कादि विभिन्न स्थानों में मन को लगाने की योग्यता हो जाती है अर्थात् योगाभ्यासी जहाँ कहीं भी मन को रोकना चाहे, वहाँ रोकने में समर्थ हो जाता है।

Vyas Bhashya

प्राणायामाभ्यासादेव, प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ( १ / ३४ ) इति वचनात्॥५३॥

व्या० भा० अ० - प्राणायाम के अभ्यास से ही (धारणाओं में मन की योग्यता भी होती है) 'प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य' (१/३४) इस वचन से।। ५३॥

Yog Prakash

इस सूत्र में प्राणायाम का और भी फल बतलाया है। चित्त को किसी स्थान में रोक देना धारणा है। प्राणायाम करने से मन में एक विशेष सामर्थ्य उत्पन्न होता है। उससे योगी जहाँ भी धारणा करना चाहता है, उसको सफलता मिलती है। " प्रच्छर्दन विधारणाभ्यां वा प्राणस्य "॥१३४॥इस सूत्र में प्राणायाम के अनुष्ठान से मन की स्थिरता बतलाई है।सत्यार्थप्रकाश में प्राणायाम के लाभ बतलाये हैं।

प्राणायाम के विषय में महर्षि दयानन्द सरस्वती एवं महर्षि मनु महाराज के प्रमाण - " जब मनुष्य प्राणायाम करता है तब प्रतिक्षण उत्तरोत्तर काल में अशुद्धि का नाश और ज्ञान का प्रकाश होता जाता है। जब तक मुक्ति न हो तब तक उसके आत्मा का ज्ञान बराबर बढ़ता जाता है।

दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां च यथा मलाः।

तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात्॥मनुस्मृति ६ / ७१॥

जैसे अग्नि में तपाने से सुवर्णादि धातुओं के मल नष्ट होकर शुद्ध होते हैं, वैसे प्राणायाम करके मन आदि इन्द्रियों के दोष क्षीण होकर निर्मल हो जाते हैं।"

"इस प्रकार करने से आत्मा और मन की पवित्रता और स्थिरता होती है।" " प्राण अपने वश में होने से मन और इन्द्रियाँ भी स्वाधीन होते हैं। बल पुरुषार्थ बढ़कर बुद्धि तीव्र सूक्ष्मरूप हो जाती है कि जो बहुत कठिन और सूक्ष्म विषय को भी शीघ्र ग्रहण करती है। इससे मनुष्य शरीर में वीर्य्य वृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर बल, पराक्रम, जितेन्द्रियता, सब शास्त्रों को थोड़े ही काल में समझ कर उपस्थित कर लेगा।" -सत्यार्थप्रकाश तृतीयसमुल्लास-

"इन चारों का अनुष्ठान इसलिये है कि जिससे चित्त निर्मल होकर उपासना में स्थिर रहे।" ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका-उपासनाविषय

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