इस सूत्र में प्राणायाम का फल बतलाया है। प्राणायाम से ज्ञान को आच्छादित करने वाला आवरण = अज्ञान क्षीण हो जाता है। उससे अशुभ संस्कार और भावी अशुभ कर्म क्षीण होते हैं। प्राणायाम करने से ये क्षीण हो जाते हैं। ये कैसे क्षीण होते हैं, इसकी प्रक्रिया निम्न लिखित है -
(१) जब व्यक्ति प्राणायाम करता है तो मन और इन्द्रियों की चंचलता रुक जाती है। उनकी चञ्चलता रुक जाने पर योगी स्थिर बुद्धि से उनके दोषों को जानकर उनको दूर करने में समर्थ हो जाता है। उनके दोषों को दूर करने से शुभ संस्कार विकसित होते हैं अर्थात् पूर्व के शुभ संस्कार उद्बुद्ध होते हैं और नवीन शुभ संस्कारों की उत्पत्ति होती है। उससे अज्ञान का नाश होता है।
(२) प्राणायाम करने से मन - इन्द्रियों पर योगी का अधिकार हो जाता है। उससे वह विधिपूर्वक ईश्वर की उपासना करने में सफल हो जाता है। इस स्थिति में उसको ईश्वर विद्या प्रदान करता है। उस विद्या से अविद्या का नाश हो जाता है।
(३) प्राणायाम से सत्त्वगुण की वृद्धि और रजोगुण, तमोगुण का ह्रास होता है। उससे अज्ञान का नाश और ज्ञान की वृद्धि होती है।
(४) प्राणायाम से शरीर और नाड़ियाँ शुद्ध होती हैं। इनके शुद्ध होने से ज्ञान का विकास और अज्ञान का नाश होता है। इस प्रकार से ज्ञान को ढकने वाला आवरण क्षीण होता है और ज्ञान की वृद्धि होती है। इससे मल दूर होते हैं और ज्ञान की दीप्ति होती है इसलिए यह कहा है कि प्राणायाम से बढ़कर कोई तप नहीं है। प्राणायाम का जो यह फल बतलाया है उसमें यमनियमों का अच्छे प्रकार से पालन करना भी आवश्यक है॥५२॥