Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 2/50

2/50
Sutra
बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर् देशकालसंख्याभिःपरिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ।। २.५० ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Inception

अव० स तु -

अर्थ वह (प्राणायाम)

Word Meaning

बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः॥५०॥

शब्दार्थ - (बाह्य-आभ्यन्तर-स्तम्भवृत्तिः) बाह्यवृत्तिः = प्राण को बाहर निकालकर बाहर ही रोक देना। आभ्यन्तर वृत्तिः = प्राण को अन्दर लेकर अन्दर ही रोक देना। स्तम्भवृत्तिः = न बाहर निकालना न अन्दर लेना, जहाँ का तहाँ रोक देना। (देश-काल- संख्याभिः) देश - जितने स्थान पर प्राण की क्रिया होती है। काल - जितने समय तक प्राण अन्दर, बाहर या जहाँ का तहाँ रुका रहता है। संख्या - एक प्राणायाम के नियत काल में जितने श्वास-प्रश्वास हो सकते हैं उनकी गणना करना। और कितने प्राणायाम किये उनकी संख्या = को जानना। सबसे (परिदृष्टः) देखा = जाना हुआ (दीर्घ-सूक्ष्मः) लम्बा और हल्का (हो जाता है) ।

सूत्रार्थ - बाह्यवृत्ति, आभ्यन्तरवृत्ति और स्तम्भवृत्ति प्राणायाम देश, काल और संख्या के द्वारा जाना हुआ लम्बा और हल्का हो जाता है।

Vyas Bhashya

यत्र प्रश्वासपूर्वको गत्यभावः स बाह्यः। यत्र श्वासपूर्वको गत्यभावः स आभ्यन्तरः। तृतीयः स्तम्भवृतिर्यत्रोभयाभावः सकृत्प्रयत्नाद्भवति। यथा तप्ते न्यस्तमुपले जलं सर्वतः संकोचमापद्यते तथा द्वयोर्युगपद्गत्यभाव इति। त्रयोऽप्येते देशेन परिदृष्टा इयानस्य विषयो देश इति। कालेन परिदृष्टा क्षणानामियत्तावधारणेनावच्छिन्ना इत्यर्थः। संख्याभिः परिदृष्टा एतावद्भिः श्वासप्रश्वासैः प्रथम उद्घातस्तद्वन्निगृहीतस्यैतावद्भिर्द्वितीय उद्धात एवं तृतीयः। एवं मृदुरेवं मध्य एवं तीव्र इति संख्यापरिदृष्टः। स खल्वयमेवमभ्यस्तो दीर्घसूक्ष्मः॥५०॥

व्या० भा० अ० - जिसमें श्वास को बाहर निकाल कर रोकना (होता है) वह 'बाह्य' है जिसमें भीतर भरकर रोकना (होता है) वह 'आभ्यन्तर' है। तीसरा 'स्तम्भवृत्ति' (वह है जिसमें ) दोनों श्वास-प्रश्वासों को प्रयत्न से तत्काल रोकना होता है। जैसे तपे पाषाण पर डाला हुआ जल चारों ओर से संकोच को प्राप्त करता है उसी प्रकार दोनों श्वास-प्रश्वासों की गति का अभाव होता है। ये तीनों देश से परीक्षित होते हैं। इतना देश इसका विषय है, इस प्रकार काल के द्वारा परीक्षित अर्थात् क्षणों की सङ्ख्या से निश्चित काल द्वारा निर्धारित सङ्ख्या द्वारा परीक्षित - इतने श्वास प्रश्वासों द्वारा प्रथम उद्घात, इसी प्रकार धारित ( स्तम्भित) प्राणायाम का (इतने श्वास प्रश्वासों द्वारा) द्वितीय उद्घात एवं तृतीय उद्घात। ऐसा मृदु, ऐसा मध्य, ऐसा तीव्र इस प्रकार सङ्ख्या के द्वारा परीक्षित प्राणायाम हुआ। वह (तीन प्रकार का प्राणायाम) उक्त विधि से अभ्यस्त होने पर दीर्घ एवं सूक्ष्म हो जाता है॥५०॥

Yog Prakash

इस सूत्र में बाह्य, आभ्यन्तर, स्तम्भवृत्ति प्राणायामों का देश, काल और सङ्ख्याओं से परीक्षित करने पर दीर्घ और सूक्ष्म होने का कथन है।जिसमें श्वासपूर्वक गति को रोक दिया जाता है, वह बाह्य प्राणायाम है। जिसमें प्रश्वासपूर्वक गति को रोक दिया जाता है वह आभ्यन्तर प्राणायाम है। जिसमें न प्राण को बाहर निकाला जाता है और न अन्दर लिया जाता है अपितु यथास्थान रोका जाता है, वह स्तम्भवृत्ति प्राणायाम है। इसमें श्वास प्रश्वास को जहाँ का तहाँ रोक दिया जाता है। जिस प्रकार से गरम पत्थर पर जल डालने से वह सब ओर से संकुचित हो जाता है। उसी प्रकार श्वास-प्रश्वास संकुचित हो जाते हैं। ये तीनों प्राणायाम देश, काल और सङ्ख्या से परीक्षित किये जाते हैं।

देश से परीक्षित प्राणायाम - जब बाह्य प्राणायाम किया जाता है तब प्राण शरीर से बाहर होता है। उस समय बाहर निकाला हुआ प्राण जहाँ पर रहता है वही उसका देश है। जब प्राण को अन्दर रोका जाता है उस समय शरीर में जहाँ पर प्राण रहता है, वह ही उसका 'देश' है।

काल से परीक्षित प्राणायाम - प्राणायाम करते समय जितने समय तक प्राण को रोका जाता  है, उन क्षणों का नाम 'काल' है

संख्या से परीक्षित प्राणायाम - एक प्राणायाम के काल में कितने स्वाभाविक स्थिति में श्वास-प्रश्वास लिये जा सकते हैं यह संख्या है। अर्थात् बाहर वा भीतर जितने काल तक प्राण को रोका जाता है। उतने काल में जितने श्वास-प्रश्वास लिये जा सकते हैं वह ही उसकी 'संख्या ' है। देश, काल और संख्याओं से परीक्षित प्रयोग में लाया हुआ प्राणायाम लम्बा और हल्का होता है अर्थात् प्राणायाम का समय बढ़ता जाता है और प्राणायाम करने में हल्कापन दिखाई देता है अर्थात् अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ता और अधिक थकान नहीं आती। एक प्राणायाम में जितना समय लगता है और उस समय में जितने श्वास-प्रश्वास लिये जा सकते हैं उसको उद्घात कहते हैं अर्थात् उस काल का नाम उद्घात है। जैसे बाह्य प्राणायाम में जितने समय तक प्राण को बाहर रोका गया, उतने समय में बारह श्वास-प्रश्वास लिये जा सकते हैं। इतने काल का नाम प्रथम उद्घात है। जब प्राण इससे दुगुने काल तक रुकता हो तो यह दूसरा उद्घात है। इसी प्रकार से सर्वत्र जान लेना चाहिये॥

 

बाह्य प्राणायाम की विधि - आसन पर बैठकर ईश्वर साक्षात्कार मानव जीवन का मुख्य प्रयोजन है, प्रथम इसका स्मरण करना चाहिये और अन्य समस्त विषयों से मन को रोक देना चाहिये। जिस आसन पर बैठकर प्राणायाम किया जाए वह ऐसा हो कि जिससे भूमि चुभे नहीं, और ध्यान में बाधा उपस्थित न हो। प्राणायाम के प्रारम्भ में मूलेन्द्रिय को ऊपर की ओर संकुचित करना चाहिये। अर्थात् मलद्वार को संकुचित करना चाहिये। इसके पश्चात् आन्तरिक प्राण को बलपूर्वक बाहर निकालना चाहिये। प्राण को बाहर निकालकर यथाशक्ति बाहर ही रोक देना चाहिये। अधिक बलपूर्वक रोकना हानिकारक है। इसलिये ऐसा नहीं करना चाहिये। जब कुछ घबराहट हो तब मूलेन्द्रिय के संकोच को छोड़ देना चाहिये और धीरे-धीरे नासिका के माध्यम से प्राण को अन्दर ले लेना चाहिये। किन्तु हाथ से नासिका को पकड़ना, एक नासिका छिद्र से प्राण लेना अन्य से छोड़ना ठीक नहीं। ऐसा करने से ध्यान में बाधा पडती है तथा श्वास के अधिक रुकने से हानि भी हो सकती है। जब प्राण की पूर्ति हो जाये, तब यह जानना कि एक प्राणायाम हो गया है। इस प्राणायाम में प्राण को अन्दर न रोका जाय। केवल प्राण की आवश्यकता पूर्ण हो जानी चाहिये। इसी प्रकार से दूसरी बार और तीसरी बार प्राणायाम करे। यदि नवीन साधक सतत तीन प्राणायाम न कर सके तो मध्य-मध्य में एक, दो, तीन श्वास ले लेवे और पुनः दूसरा प्राणायाम करे। प्रारम्भ में तीन प्राणायाम प्रातःकाल और तीन सायंकाल करे। कुछ दिनों के पश्चात् एकएक प्राणायाम बढ़ाता जाये। इसी प्रकार से बढ़ाते - बढ़ाते जितनी अपनी शक्ति हो उतने ही प्राणायाम करे। अधिक नहीं।

प्राणायाम के बढ़ाने और घटाने में कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। जैसे कि – 

(१) बलावस्था शरीर में बल कितना है और अवस्था क्या है अर्थात् बाल्य, युवा, वृद्ध अवस्था इसका भी ध्यान रखना चाहिये।

(२) भोजन - यदि भोजन पौष्टिक हो तो अधिक प्राणायाम करना चाहिये और साधारण हो तो न्यून करना चाहिये।

(३) ऋतु - शीत ऋतु में अधिक, वर्षा ऋतु में मध्यम और उष्ण ऋतु में न्यून प्राणायाम करना चाहिये। 

(४) अनुभव - प्राणायाम करते-करते जब मुख सूखने लगे अथवा शिर अधिक भारी हो जाए वा अधिक थकान हो जाए, तब प्राणायाम नहीं करना चाहिये।

आभ्यन्तर प्राणायाम की विधि - जब बाह्य प्राणायाम का अच्छा अभ्यास हो जाए अर्थात् सरलता से प्राणायाम होने लग जाए और प्राणायाम करते समय जप भी सरलता से होने लग जाय तब आभ्यान्तर प्राणायाम का अभ्यास प्रारम्भ करना चाहिये।

अच्छे प्रकार से आसन पर बैठकर अन्दर के वायु को बाहर निकाल देना चाहिये। पुनः बाहर के वायु को अन्दर ले लेना चाहिये और उसको अन्दर ही रोक देना चाहिये। जब कुछ घबराहट हो तो श्वास को धीरे-धीरे बाहर छोड़ना चाहिये। यह एक प्राणायाम हो गया। इसी प्रकार से दूसरी बार और तीसरी बार करना चाहिए। इस आभ्यन्तर प्राणायाम में मूलेन्द्रिय को संकुचित करने का विधान नहीं है।

प्राणायाम से सम्बद्ध कुछ आवश्यक बातें

(१) भोजन के पश्चात् नहीं - भोजन करके वा दूध आदि पीकर प्राणायामनहीं करना चाहिये। खाली पेट अथवा खाया पिया पदार्थ जब पच जाए तब प्राणायाम करना चाहिये।

(२) अति रुग्णावस्था में अधिक रुग्ण होने पर भी प्राणायाम नहीं करना चाहिये। 

(३) प्राणायाम-शिक्षक - जो प्राणायाम के विशेषज्ञ हों उनसे प्राणायाम का प्रशिक्षण लेना चाहिये, अन्यथा हानि हो सकती है।

(४) न्यून-अधिक - न्यून से न्यून तीन और अधिक से अधिक इक्कीस प्राणायाम करने चाहिये। 

(५) जप - प्राणायाम करते समय ओ३म् अथवा प्राणायाम मन्त्र और जिस मन्त्र में ईश्वर के स्वरूप का वर्णन हो, उसका अर्थ सहित मानसिक जप करना चाहिये। 

(६) शुद्ध वायु - जहाँ तक हो सके शुद्ध वायु में प्राणायाम करना चाहिये॥५०॥

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