Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 2/5

2/5
Sutra
अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ।। २.५ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Inception

अव० - तत्राविद्यास्वरूपमुच्यते।

अर्थ - उनमें से 'अविद्या का स्वरूप' बताया जाता है-

Word Meaning

अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या॥५॥

शब्दार्थ - (अनित्य-अशुचि-दुःख-अनात्मसु) अनित्य, अशुचि, दुःख और अनात्मा में क्रमश: (नित्य-शुचि-सुख-आत्म-ख्यातिः) नित्य, शुचि, सुख और आत्मा का मानना (अविद्या) अविद्या = मिथ्याज्ञान है। 

सूत्रार्थ - अनित्य, अशुचि, दुःख और अनात्मा में क्रमशः नित्य, शुचि, सुख और आत्मा का मानना 'अविद्या' है।

Vyas Bhashya

अनित्ये कार्ये नित्यख्यातिः तद्यथा - ध्रुवा पृथिवी, ध्रुवा सचन्द्रतारका द्यौः, दिवौकस इति। तथाऽशुचौ परमबीभत्से काये शुचिख्यातिः, उक्तं च – अमृता स्थानाद्बीजादुपष्टम्भान्निः स्यन्दान्निधनादपि।

कायमाधेयशौचत्वात्पण्डिता शुचिं विदुः॥

इत्यशुचौ शुचिख्यातिर्दृश्यते। नवेव शशाङ्कलेखा कमनीयेयं कन्या मध्वमृतावयवनिर्मितेव चन्द्रं भित्त्वा निःसृतेव ज्ञायते, नीलोत्पलपत्रायताक्षी हावगर्भाभ्यां लोचनाभ्यां जीवलोकमाश्वासयन्तीवेति कस्य केनाभिसंबन्धो, भवति चैवमशुचौ शुचिविपर्यासप्रत्यय इति। एतेनापुण्ये पुण्यप्रत्ययस्तथैवानर्थे चार्थप्रत्ययो व्याख्यातः।

तथा दुःखे सुखख्यातिं वक्ष्यति - परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः (२।१५ ) इति। तत्र सुखख्यातिरविद्या।

तथानात्मन्यात्मख्यातिर्बाह्योपकरणेषु चेतनाचेतनेषु भोगाधिष्ठाने वा शरीरे, पुरुषोकरणे वा मनस्यनात्मन्यात्मख्यातिरिति। तथैतदत्रोक्तम् - व्यक्तमव्यक्तं वा सत्त्व - मात्मत्वेनाभिप्रतीत्य तस्य संपदमनुनन्दत्यात्मसंपदं मन्वानस्तस्य व्यापदमनुशोचत्यात्मव्यापदं मन्वानः, स सर्वोऽप्रतिबुद्ध इति।

एषा चतुष्पदा भवत्यविद्या मूलमस्य क्लेशसंतानस्य कर्माशयस्य च सविपाकस्येति। तस्याश्चामित्रागोष्पद्वद्वस्तुसतत्त्वं विज्ञेयम्। यथा नामित्रो मित्राभावो न मित्रमात्रं किं तु तद्विरुद्धः सपत्नः। तथाऽगोष्पदं न गोष्पदाभावो न गोष्पदमात्रं किंतु देश एव ताभ्यामन्यद्वस्त्वन्तरम्। एवमविद्या न प्रमाणं न प्रमाणाभावः किं तु विद्याविपरीतं ज्ञानान्तरमविद्येति॥५॥

 

व्या० भा० अ० - अनित्य पदार्थों में नित्य पदार्थ का ज्ञान (अविद्या है)। जैसे कि पृथिवी नित्य, चन्द्र तारों सहित द्युलोक नित्य, देवगण नित्य हैं, ऐसा। उसी प्रकार अशुद्ध अतिघृणित शरीर में शुद्धज्ञान। और कहा है - स्थान (उदर स्थान) के कारण, उपादान (रजवीर्य) के कारण, उपष्टम्भ (रसरक्तादि) का आश्रय होने के कारण, निःस्यन्द ( मलमूत्र स्वेदादि) के कारण और निधन (मृत्यु) के कारण व शुद्धि की अपेक्षा रखने के कारण विद्वान् शरीर को अशुद्ध मानते हैं। इस प्रकार अशुद्ध शरीर में शुद्ध ज्ञान देखा जाता हैं।

चन्द्रमा की नवीन कला के समान मनोरम यह कन्या मधु और अमृत के अवयवों से बनी हुई के समान, चन्द्रमा को फोड़कर निकली हुई सी प्रतीत होती है। नीलकमल की पंखुडियों के समान विशाल नेत्रवाली शृंगाररसविलास से युक्त दृष्टियों के द्वारा मानों प्राणिजगत् को तृप्त कर रही हो। इस प्रकार किस (अपवित्र शरीर) का किस (मधु अमृत चन्द्र) के साथ सम्बन्ध है ? इस प्रकार अशुद्ध शरीर में शुद्धि का विरुद्ध ज्ञान होता है। इसी प्रकार इसके द्वारा अपुण्य में पुण्य का ज्ञान और अनर्थ में अर्थ का ज्ञान व्याख्यात हुआ।वैसे ही दुःख में सुख का ज्ञान 'परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः ' (२/१५) के द्वारा कहेगा। उसमें सुख ज्ञान 'अविद्या' है। 

इसी प्रकार अनात्मा में आत्मख्याति अर्थात् बाह्योपकरण चेतन (बन्धु, बान्धव, पशु आदि) अचेतन (भूमि, धन, सम्पत्ति आदि) भोग के आधार शरीर को, पुरुष के उपकरण मन को, जो कि आत्मा नहीं हैं उनको आत्मा जानना 'अविद्या' है। इसी प्रकार इस विषय में कहा गया है कि पुत्र, मित्र, पशु आदि व्यक्त, धन सम्पत्ति भूमि आदि अव्यक्त पदार्थों को अपना स्वरूप मानकर उनकी सम्पन्नता पर अपनी सम्पन्नता जानता हुआ प्रसन्न होता है। उनकी विपन्नता में अपनी विपन्नता मानता हुआ शोक करता है, ऐसा मानने वाला प्रत्येक व्यक्ति अज्ञानी है।

इस क्लेश सन्तान और फल सहित कर्माशय की चार भागों में रहने वाली यह अविद्या मूल है। अमित्र, अगोष्पद के समान इस अविद्या की सत्ता जाननी चाहिए। 'अमित्र' का अर्थ न मित्र मात्र है, न मित्र का अभाव है किन्तु उन से विरुद्ध शत्रु है। इसी प्रकार 'अगोष्पद' का अर्थ न गोष्पद का अभाव है, न गोष्पदमात्र है अपितु उन दोनों से भिन्न देश ही है। 'अविद्या' भी इसी प्रकार न प्रमाण है, न प्रमाणाभाव है किन्तु विद्याविरुद्ध ज्ञानान्तर है॥५॥

Yog Prakash

इस सूत्र में अविद्या के स्वरूप का वर्णन है। अविद्या एक क्लेश है। जिस साधन से पदार्थ का स्वरूप ठीक प्रकार से जाना जाता है उसको विद्या कहते हैं और जिस साधन से पदार्थ का स्वरूप विपरीत रूप में जाना जाता है वह अविद्या कहाती है। ठूंठ को ठूंठ रूप में जानना विद्या है, मनुष्य के रूप में जानना अविद्या है। जिस समय व्यक्ति किसी पदार्थ के स्वरूप को न वास्तविक रूप में जानता है और न विपरीत रूप में जानता है यह विद्या का अभाव है, अविद्या नहीं है। विद्या और अविद्या परस्पर एक दूसरे के विरोधी हैं। जहाँ पर विद्या होती है वहाँ पर अविद्या नहीं रह सकती। जहाँ पर अविद्या होती है वहाँ पर विद्या नहीं रह सकती। अविद्या का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। परन्तु योगदर्शनकार ने अविद्या के उसी अंश को यहाँ पर दिखलाया है जो मुक्ति में बाधक है। अविद्या के इस अंश को निम्न प्रकार से समझना चाहिये।।

(१) अनित्य पदार्थों को नित्य जानना - मनुष्य का यह शरीर अनित्य है। अविद्या के कारण व्यक्ति इसको नित्य समझता है और यह इच्छा रखता है कि मेरा यह शरीर अनन्त काल तक बना रहे। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि देवों के शरीर सदा बने रहते हैं, मरते नहीं। संसार में अनेक लोग वाणी से तो यही कहते हैं कि यह शरीर नाशवान् है। परन्तु मन से शरीर को नाशवान् मानने वाले विरले ही होते हैं। जैसे अनित्य शरीर को अविद्या के कारण व्यक्ति नित्य मानता है वैसे ही वह पृथिवी, सूर्य आदि अनित्य पदार्थों को भी नित्य मानता है। जो भी धन, सम्पत्ति, परिवार आदि मनुष्य के साथ सम्बद्ध हैं, उनको नित्य मानता है। यह अविद्या का एक भाग है।

(२) अशुद्ध पदार्थों को शुद्ध मानना - जैसे सुन्दर शरीर को देखकर व्यक्ति यह समझता है कि इस शरीर में कोई मल नहीं है, यह नितान्त शुद्ध है। चोरी आदि अधर्माचरण को शुद्ध मानता है और उत्साहपूर्वक उसको करता रहता है। संसार में अशुद्ध कर्मों को शुद्ध मानने से अन्याय की प्रवृद्धि और न्याय का ह्रास होता है। इसी प्रकार से अन्यायपूर्वक धनोपार्जन को शुभ समझना और अशुद्ध खान-पान को शुद्ध समझना भी अविद्या है।

(३) दुःख को सुख समझना - संसार में जो सुख है उसमें चार प्रकार का दुःख मिश्रित है। परन्तु अविद्या के कारण व्यक्ति उसको शुद्ध एवं दुःखरहित समझता है। उसकी प्राप्ति के लिये अनेक प्राणियों की हिंसा करता है।

(४) जो पदार्थ आत्मा नहीं है उनको आत्मा समझना - शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदि ये सब पदार्थ आत्मा नहीं है। इनको व्यक्ति आत्मा समझता है। इनको आत्मा समझने के कारण इनके आधीन होकर अशुभ कर्मों को करता रहता है और मन आदि को दोषी मानता है।

अविद्या के स्वरूप को इस प्रकार से भी समझ लेना चाहिये कि जैसे व्यक्ति अनित्य को नित्य समझता है, वैसे ही नित्य को अनित्य समझता है। शुद्ध को अशुद्ध, सुख को दु:ख, चेतन को जड़ समझता है। चार प्रकार की इस अविद्या के स्वरूप को जानना और इसका निराकरण करना अनिवार्य है। व्यक्ति शास्त्रों को पढ़ने और पढ़ाने के पश्चात् यह मान लेता है कि मेरी अविद्या नष्ट हो गई है और मैं वास्तविक विद्वान् बन गया हूँ। परन्तु ऐसा मानना भूल है, जब तक व्यक्ति प्रकृति, विकृति, आत्मा, परमात्मा के स्वरूप को अच्छे प्रकार से जानकर तदनुसार आचरण नहीं करता तब तक अविद्या का नाश और विद्या की प्राप्ति नहीं होती।

इस बात को समझने के लिये छान्दोग्य उपनिषद् (७-१) में लिखे नारदसनत्कुमार- संवाद से सहायता मिल सकती है। उस सम्वाद का कुछ भाव यहाँ पर लिखा जाता है - सनत्कुमारजी ने नारद जी से पूछा कि आपका आगमन कैसे हुआ ? नारद जी ने कहा कि मैं आपसे विद्या प्राप्त करने के लिये आया हूँ। सनत्कुमार जी ने पूछा कि आपने कौन कौन सी विद्या पढ़ी है ? नारद जी ने कहा कि मैंने ऋग्वेदादि अठारह विद्याएँ पढ़ी हैं। सनत्कुमार जी ने कहा कि इतनी विद्या पढ़ने के पश्चात् आप मुझसे क्या पढ़ेंगे ? नारद जी ने कहा कि "मैं मन्त्रवित् हूँ, आत्मापरमात्मा को नहीं जानता। क्योंकि आत्मा-परमात्मा को जानने वाले को क्लेश सन्तप्त नहीं करते परन्तु मुझे सन्तप्त करते हैं।" इस संवाद से व्यक्ति यह जान सकता है कि मेरी अपनी अविद्या दूर हुई वा नहीं॥५॥

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