इस सूत्र में आसन सिद्धि के उपाय बतलाये हैं। सामान्य रूप से व्यक्ति शरीर से कोई न कोई क्रिया करता रहता है। आसन की सिद्धि में वह क्रिया बाधा डालती है। इसलिये आसन को सिद्ध करने के लिये शरीर की समस्त चेष्टाओं को रोक देना चाहिये। 'प्रयत्नशैथिल्य' का यह अर्थ नहीं है कि शारीरिक परिश्रम न्यून करना चाहिये। क्योंकि शारीरिक परिश्रम से आसन का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। इसलिये जब साधक आसन लगाकर ईश्वर का ध्यान करता है तब शारीरिक सभी क्रियाओं को बन्द कर देना चाहिये। इससे आसन की सिद्धि होती है।
आसन की सिद्धि का दूसरा उपाय 'अनन्त समापत्ति' है। अनन्त का अर्थ है - जिसकी कोई सीमा न हो। ईश्वर की कोई सीमा नहीं है। जब साधक ईश्वर को अनन्त मानकर उसका ध्यान करता है, तब आसन की सिद्धि होती है। योगाभ्यासी जिस वस्तु का ध्यान करता है उस वस्तु का उस पर प्रभाव पड़ता है। ईश्वर कभी भी हिलता - डुलता नहीं है। ईश्वर का ध्यान करने से व्यक्ति के शरीर का भी हिलना-डुलना बन्द हो जाता है। इससे आसन की सिद्धि होती है। जब साधक अधिक प्रेम से ईश्वर का ध्यान करता है तब भी आसन की सिद्धि में सहायता मिलती है। दीर्घकाल तक आसन में बैठकर ध्यान करने से आनन्द की प्राप्ति होती है। ऐसा जानने से भी व्यक्ति आसन की कठिनाईयों को सहन करके अधिक समय तक आसन पर बैठ जाता है। इससे आसन में बैठने का अभ्यास बढ़ जाता है। इस प्रकार से इन सभी उपायों से ‘आसन की सिद्धि' करनी चाहिये। इससे प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि में सुविधा होती है॥४७॥