Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 2/46

2/46
Sutra
स्थिरसुखं आसनं ।। २.४६ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Inception

अव० - उक्ताः सह सिद्धिभिर्यमनियमाः। आसनादीनि वक्ष्यामः। तत्र -

अर्थ० - यम नियम सिद्धियों सहित कह दिए हैं। आसनादि को कहेंगे। उनमें से 

Word Meaning

स्थिरसुखमासनम्॥४६॥

शब्दार्थ - (स्थिर-सुखम्) (ध्यान के लिए जिस अवस्था में) शरीर स्थिर और सुखयुक्त हो वह (आसनम्) आसन कहाता है।

सूत्रार्थ - जिस अवस्था में शरीर स्थिर और सुखयुक्त हो वह 'आसन' कहाता है। 

Vyas Bhashya

तद्यथा पद्मासनं, वीरासनं, भद्रासनं, स्वस्तिकं, दण्डासनं, सोपाश्रयं, पर्यङ्कं, क्रौञ्चनिषदनं, हस्तिनिषदनमुष्ट्रनिषदनं, समसंस्थानं, स्थिरसुखं, यथासुखं चेत्येवमादीनि॥४६॥

व्या० भा० अ० - वह जैसे कि पद्मासन, वीरासन, भद्रासन, स्वस्तिक, दण्डासन, सोपाश्रय पर्यङ्क,

क्रौञ्चनिषदन, हस्तिनिषदन, उष्ट्रनिषदन, समसंस्थान, स्थिरसुख और यथासुख आदि।। ४६।। 

Yog Prakash

इस सूत्र में आसन की परिभाषा का कथन है। आसनों के अनेक भेद हैं। आसनों का प्रयोग दो प्रकार से किया जाता है। प्रथम प्रयोग शरीर को स्वस्थ और बलवान् बनाने के लिये व्यायाम के रूप में किया जाता है। दूसरा प्रयोग प्राणायाम, प्रत्याहार धारणा, ध्यान और समाधि की सिद्धि के लिये किया जाता है। जिन आसनों का प्रयोग शरीर को स्वस्थ और बलवान् बनाने के लिये किया जाता है, वे व्यायाम सम्बन्धी आसन हैं। जिन आसनों का प्रयोग धारणा, ध्यान, समाधि के लिये किया जाता है वे योगासन हैं। सभी आसनों का नाम योगासन नहीं है।

आसनों के अनेक नाम है। स्वस्तिकासन, पद्मासन आदि। इनमें से जो भी अपने अनुकूल हो योगाभ्यासी को उसी आसन का प्रयोग करना चाहिये। ऐसा कोई नियम नहीं है कि किसी एक आसन से समाधि की सिद्धि होती हो और अन्य आसन से नहीं होती हो। जिस आसन में बैठकर सुखपूर्वक ईश्वर का ध्यान किया जा सके उसी में बैठकर करना चाहिये। नीचे इस प्रकार का वस्त्र आदि रखा जाये कि जिस पर बैठने से भूमि अथवा तख्त आदि पीड़ा न देवें। आसनकाल में शरीर को सीधा रखना चाहिये। टेढ़ा बैठने से आलस्य और निद्रा आती है। ऐसी स्थिति में ध्यान और समाधि की सिद्धि नहीं होती। जो साधक सीधा नहीं बैठ सकता, वह जिस प्रकार से भी बैठ सकता है उसी प्रकार से बैठकर करे। जो किसी प्रकार से भी बैठ नहीं सकता वह लेटकर ईश्वर का ध्यान करे। रुग्ण अवस्था में वा अतिवृद्ध अवस्था में चाहे लेट कर भी हो ध्यान तो करना ही चाहिये। उससे भी लाभ होता है। यदि एक आसन पर दीर्घकाल पर्यन्त न बैठा जाय तो मध्य-मध्य में आसन को परिवर्तित कर लेना चाहिये।

यह आवश्यक नहीं है कि ३ वा ४ घण्टे तक आसन में बैठने से ही ध्यान हो सकता है। जितने काल तक बैठा जा सके, उतने काल तक ध्यान किया जा सकता है। कुछ लोगों की यह मान्यता है कि यम, नियम इन दो योग के अङ्गों की ईश्वर प्राप्ति वा मोक्षप्राप्ति के लिये कोई आवश्यकता नहीं है। यह मान्यता ठीक नहीं है। क्योंकि यम, नियम के अनुष्ठान के बिना शुद्ध ज्ञान और शुद्ध कर्म नहीं हो सकते। इनके बिना इन्द्रियों को भी वश में नहीं किया जा सकता है। मन इन्द्रियों को जीते बिना ईश्वरोपासना नहीं हो सकती। इसलिये यह मान्यता हेय है, उपादेय नहीं। कुछ लोग आसनों को और प्राणायाम को ही योग मानते हैं। इससे योग के विषय में भ्रान्ति उत्पन्न होती है। क्योंकि योग एक सूक्ष्म विद्या और आचरण का नाम है। जिससे व्यक्ति ईश्वर का साक्षात्कार करके समस्त दुःखों से छूटकर आनन्द की प्राप्ति करता है॥४६॥

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