इस सूत्र में स्वाध्याय का फल बतलाया है। स्वाध्याय-मोक्षशास्त्रों का पढ़ना-पढ़ाना और प्रणवादि का अर्थ सहित जप करना है। स्वाध्याय से इष्ट देव की प्राप्ति होती है। जीवात्माओं का प्रमुख इष्टदेव ईश्वर है। ईश्वर-प्राप्ति से समस्त कामनायें पूर्ण हो जाती हैं। वेद और वेदानुकूल मोक्ष के स्वरूप का वर्णन करने वाले शास्त्रों के पठन-पाठन से ईश्वर के स्वरूप का परिज्ञान होता है और ईश्वर प्राप्ति के साधनों तथा उसकी प्राप्ति से होने वाले लाभों का भी ज्ञान होता है। बिना स्वाध्याय के यह परिज्ञान नहीं होता। शास्त्रों के अध्ययन से- प्रथम शब्दार्थ और सम्बन्ध के माध्यम से ईश्वर का स्वरूप जाना जाता है। उसके पश्चात् मनन, निदिध्यासन किया जाता है। पश्चात् ध्यान और समाधि से साधक को इष्टदेव ईश्वर का साक्षात्कार होता है। उससे उसके समस्त दुःखों की निवृत्ति और आनन्द की प्राप्ति होती है। इसी को 'इष्ट देव का सम्प्रयोग' अथवा प्राप्ति कहा जाता है।
शास्त्रों के अध्ययन से और उनके अनुसार आचरण से व्यक्ति की इतनी योग्यता हो जाती है कि वह विशुद्ध योगियों को जानने में समर्थ हो जाता है। उनके गुणों के जानने से उनसे सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। इससे व्यक्ति के इष्ट प्रयोजन की सिद्धि होती है। यह इष्टदेव का सम्प्रयोग अथवा इष्टदेवों की प्राप्ति है। ओम् का अथवा ईश्वर के स्वरूप का वर्णन करने वाले मन्त्रों का अर्थ सहित जप करने से ईश्वर से साधक का सम्बन्ध हो जाता है। ईश्वर से सम्बन्ध होने से वह उपासक को सहायता प्रदान करता है। विद्वानों, योगियों से सम्बन्ध होने से वे भी उत्तमकार्यों में सहायता प्रदान करते हैं।
कुतः, 'नावेदविन्मनुते तं बृहन्तमिति'॥ तैत्तिरीय ब्राह्मण ३/१२/९/७॥ यो मनुष्यो वेदार्थान्न वेत्ति, स नैव तं बृहन्तं परमेश्वरं धर्मं विद्यासमूहं वा वेत्तुमर्हति। कुतः, सर्वासां विद्यानां वेद एवाधिकरणमस्त्यतः। नहि तमवज्ञाय कस्यचित्सत्यविद्याप्राप्तिर्भवितुमर्हति। यद्यत् किञ्चिद्भूगोलमध्ये पुस्तकान्तरेषु हृदयान्तरेषु वा सत्यविद्याविज्ञानमभूत्, भवति, भविष्यति च तत् सर्वं वेदादेव प्रसृतमिति विज्ञेयम्। कुतः, यद्यद्यथार्थं विज्ञानं तत्तदीश्वरेण वेदेष्वधिकृतमस्ति। तद्वारैवाऽन्यत्र कुत्रचित्सत्यप्रकाशो भवितुं योग्यः। अतो वेदार्थ विज्ञानाय सर्वैर्मनुष्यैः प्रयत्नोऽनुष्ठेय इति।
क्योंकि, 'नावेदवित०'॥ तैत्तिरीय ब्राह्मण ३/१२/९/७॥ वेदों को नहीं जानने वाला मनुष्य परमेश्वरादि सब पदार्थ विद्याओं को अच्छी प्रकार से नहीं जान सकता। और जो जो जहाँ जहाँ भूगोलों वा पुस्तकों अथवा मन से सत्यज्ञान प्रकाशित हुआ है और होगा, वह सब वेदों में से ही हुआ है। क्योंकि जो जो सत्यविज्ञान है, सो सो ईश्वर ने वेदों में धर रखा है। इसी के द्वारा अन्य स्थानों में भी प्रकाश होता है। और विद्या के बिना पुरुष अन्धे के समान होता है। इससे सम्पूर्ण विद्याओं के मूल वेदों को बिना पढ़े किसी मनुष्य को यथावत् ज्ञान नहीं हो सकता। इसलिये सब मनुष्यों को वेदादि शास्त्र अर्थ ज्ञान सहित अवश्य पढ़ने चाहिये। - ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, पठन-पाठन विषय वेद विद्या को न जानने वाला व्यक्ति, ईश्वर प्राप्ति नहीं कर सकता॥४४॥