इस सूत्र में सन्तोष का फल बतलाया है। जब व्यक्ति पूर्ण पुरुषार्थ के पश्चात् अपने उपलब्ध साधनों से अधिक पदार्थों की इच्छा नहीं करता तो उसको अनुत्तम सुख की प्राप्ति होती है। जब वह संसार के प्रत्येक सुख को क्षणिक देखता है और उसमें परिणाम, ताप, संस्कार और गुणवृत्तिविरोध दुःख इन चार प्रकार के दुःखों को मिश्रित देखता है तो विषय भोगों में और उनके साधनों में तृष्णा नहीं रहती। तृष्णारहित अवस्था में जो सुख का अनुभव होता है वह इतना महान् होता है कि विषय भोगों का सुख उसके सोलहवें भाग के समान भी नहीं होता है। जब व्यक्ति इन्द्रियों के भोगों में आसक्त रहता है तो उसकी विषय भोग की तृष्णा बढ़ती जाती है और वह उस तृष्णा की पूर्ति के लिये प्रयासशील रहता है। प्रयास करने पर भी उसको विषय भोग की सामग्री नहीं मिलती तो उसको बहुत दुःख होता है। इस स्थिति को देखकर व्यक्ति विषयभोग की इच्छा का ही परित्याग कर देता है। इससे वह व्यक्ति दुःख से बच जाता है और सुख का अनुभव करता है। यह सन्तोष के पालन करने से मिलने वाला सात्त्विक सुख है और यह सत्त्वगुण से प्राप्त होता है।
सन्तोष के पालन करने का यह भी फल है कि विषय भोगों को छोड़कर व्यक्ति योगाभ्यास करता है तो मोक्ष की प्राप्ति होती है। मोक्ष का सुख अनुत्तम सुख है उसके साथ किसी भी सांसारिक सुख की वास्तविक तुलना नहीं हो सकती। सन्तोष का पालन करने से व्यवहार में भी सुख की प्राप्ति और दुःख की निवृत्ति होती है। जब कोई हानिकारक घटना घट जाती है तो सन्तोषी व्यक्ति को दुःख नहीं होता अथवा न्यून दुःख होता है। इसलिये सन्तोष का पालन योग सिद्धि के साथ व्यवहार की सिद्धि के लिए भी उपयोगी है॥४२॥