Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 2/39

2/39
Sutra
अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथंतासंबोधः ।। २.३९ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासम्बोधः॥३९॥

शब्दार्थ - (अ-परिग्रह-स्थैर्ये) जब योगी हानिकारक तथा अनावश्यक वस्तुओं को तथा हानिकारक एवं अनावश्यक विचारों को दृढ़तापूर्वक त्याग देता है तब (जन्म-कथन्ता-सम्बोधः) वर्त्तमान जन्म में क्या कर रहा हूँ ? शरीर क्या है ? इन्द्रियाँ क्या हैं ? मैं क्या हूँ ? आदि विषयक जिज्ञासा तथा ज्ञान हो जाता है। इसी प्रकार भूत तथा भावी जन्म से सम्बन्धित जिज्ञासा तथा सामान्य आनुमानिक ज्ञान हो जाता है।

सूत्रार्थ - अपरिग्रह की स्थिरता होने पर भूत, भविष्यत् तथा वर्त्तमान जन्म से सम्बन्धित जिज्ञासा और आनुमानिक ज्ञान हो जाता है।

Vyas Bhashya

अस्य भवति। कोऽहमासं, कथमहमासं, किंस्विदिदं कथंस्विदिदम्, के वा भविष्यामः, कथं वा भविष्याम इत्येवमस्य पूर्वान्तपरान्तमध्येष्वात्मभावजिज्ञासा स्वरूपेणोपावर्तते। एता यमस्थैर्ये सिद्धयः॥३९॥

व्या० भा० अ० इस योगी को (जन्मकथन्ता सम्बोध) होता है। मैं कौन था, मैं कैसा था, यह क्या है, यह कैसे हुआ है, हम कौन होंगे, कैसे होंगे ? इस प्रकार। इस योगी को पूर्वकाल परकाल और मध्यकाल की अपने जन्म विषयक जिज्ञासा स्वतः उदित हो जाती है। ये पूर्वलिखित सिद्धियाँ यम विषयक स्थिरता होने पर उदित होती हैं॥३९॥

Yog Prakash

इस सूत्र में अपरिग्रह पालन का फल बतलाया है। जब व्यक्ति सांसारिक विषय भोगों में उपार्जन दोष, रक्षण दोष, क्षय दोष, संग दोष और हिंसा दोष देखता है तो उसकी विषय भोग में रुचि नहीं रहती। ऐसी स्थिति में वह अपने जीवन के विषय में विचारना प्रारम्भ करता है कि मैं भूतकाल में कौन था और कैसे था ? यह जीवन क्या है और कैसा है ? आगे भविष्य में हम सभी कैसे होंगे ? भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान जीवन विषयक जिज्ञासा उत्पन्न होती है। इसका परिणाम यह होता है कि आत्मा क्या है, शरीर क्या है, इन्द्रियाँ क्या हैं और भूत, भविष्यत्, वर्त्तमान काल में इनकी क्या-क्या स्थिति रहती है। मेरा कल्याण कैसे हो सकता है और मैं दुःखों से कैसे छूट सकता हूँ इत्यादि विषयों को जानने का प्रयास करता है। विषय भोगों में विविध दुःख देखकर भोगमार्ग को छोड़कर योगमार्ग पर चलने लगता है। इस विषय में दो प्रकार की विचारधारायें हैं। कुछ लोग यह मानते हैं कि योगाभ्यासी व्यक्ति यह जान जाता है कि मेरा पूर्वजन्म में मनुष्य, पशु आदि योनियों में से कौन सा शरीर था। मेरे माता-पिता कौन थे, परिवार में कौन-कौन थे और कितने थे, परिवार किस नगर में था, इन सब बातों को यथावत् जान लेता है। दूसरी विचारधारा यह है कि योगाभ्यासी पूर्व जन्म की उक्त बातों को उक्त प्रकार से नहीं जान सकता।

पुनर्जन्मों की स्मृति होती है वा नहीं, यह अभी और परीक्षा की अपेक्षा रखता है। इस विषय में योगदर्शन ३।१८ के प्रसङ्ग में लिख दिया है, वहाँ पर देख लेवें। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने इस विषय में अपने विचार सत्यार्थप्रकाश के नवम समुल्लास एवं ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के पुनर्जन्म विषय में लिखे हैं। वे प्रमाण भी उसी सूत्र के व्याख्यान में लिख दिये हैं, वहीं देख लेवें॥३९॥

All Bhashya Sutras