अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्॥३७॥
शब्दार्थ - (अस्तेय-प्रतिष्ठायाम्) जब योगी मन-वाणी - शरीर से अच्छे प्रकार से चोरी का परित्याग कर देता है तब (सर्व - रत्न - उपस्थानम् ) सब उत्तम पदार्थों की प्राप्ति होती है।
अर्थात् जो-जो उत्तम पुरुषार्थ करता है उसका उत्तम फल उसको मिलता है और उसके चोरी के परित्याग करने से अन्य मनुष्य उसको उत्तम पदार्थ देते हैं। ईश्वर की ओर से भी ज्ञान, बल और सुख की प्राप्ति होती है।
सूत्रार्थ - जब योगी मन-वाणी-शरीर से अच्छे प्रकार से चोरी का परित्याग कर देता है तब सब उत्तम पदार्थों की प्राप्ति होती है। अर्थात् उत्तम पुरुषार्थ के अनुकूल फल प्राप्ति, अन्यों से सहायता तथा ईश्वर से ज्ञान, बल और सुख की प्राप्ति होती है।