Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 2/36

2/36
Sutra
सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वं ।। २.३६ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्॥३६॥

शब्दार्थ – (सत्य-प्रतिष्ठायाम्) मन, वाणी और शरीर से सत्य आचरण के परिपक्व हो जाने पर (क्रिया-फल-आश्रयत्वम्) योगी का कर्म उत्तम फल वाला होता है और उसके आचरण का प्रभाव अन्य प्राणियों पर भी यथायोग्य पड़ता है।

सूत्रार्थ मन, वाणी और शरीर से सत्य आचरण के परिपक्व हो जाने पर योगी का कर्म उत्तमफल वाला हो जाता है और उसके आचरण का प्रभाव अन्य प्राणियों पर भी यथायोग्य पड़ता है।

Vyas Bhashya

धार्मिको भूया इति भवति धार्मिकः। स्वर्गं प्राप्नुहीति स्वर्गं प्राप्नोति। अमोघास्य वाग्भवति॥३६॥

व्या० भा० अ० - "धार्मिक होओ" ऐसा कहने पर धार्मिक हो जाता है। "स्वर्ग (सुख) को प्राप्त करो" ऐसा कहने पर स्वर्ग (सुख) को प्राप्त करता है। इस योगी की वाणी निष्पाप यथार्थ सफल हो जाती है॥३६॥

Yog Prakash

इस सूत्र में सत्य आचरण के लाभ बतलाये हैं। जब योगाभ्यासी मन, वाणी और शरीर से सत्य पालन करते-करते परिपक्व अवस्था में पहुँच जाता है, तब उसके द्वारा की गई क्रिया सफल होती है। यहाँ पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि योगी परीक्षापूर्वक वही बात कहेगा जो सम्भव हो। जो बात असम्भव होगी, उसको योगी नहीं कहेगा और किसी के कहने मात्र से असम्भव कार्य हो भी नहीं सकता। कुछ लोगों की यह मान्यता है कि योगी जो कुछ भी कह देता है वह पूर्ण हो जाता है। जैसे कि योगी चलते हुए वायु को कह देवे कि हे वायु तू रुक जा, तो वायु रुक जायेगी। यदि अधिक वर्षा से बाढ़ आ गई हो और पुनरपि वर्षा हो रही हो तो योगी के कहने से वर्षा रुक जाती है। ये बातें असंगत हैं।

व्यास भाष्य में कहा है कि " तू धार्मिक बन जा " तो व्यक्ति धार्मिक बन जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि योगी उसी व्यक्ति को ऐसा कहेगा, जो कि धार्मिक बन सकता है। और जो कुसंस्कार व कुसंगति आदि के कारण धार्मिक बन ही नहीं सकता उसको योगी ऐसा नहीं कहेगा। वेदों में सत्यवादी और प्रेम से रहने का उपदेश ईश्वर ने किया है। ईश्वर सदा सत्य ही बोलता है। परन्तु उसको सुनने वाले सभी लोग न सत्यवादी बनते हैं और न सभी मनुष्य प्रेम से रहते हैं। यह बात तो ठीक है कि सत्यवादी व्यक्ति का प्रभाव दूसरों पर पड़ता है। परन्तु प्रत्येक व्यक्ति पर नहीं पड़ता।। ३६।। 

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