Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 2/34

2/34
Sutra
वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वकामृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इतिप्रतिपक्षभावनं ।। २.३४ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रादुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम्॥३४॥

शब्दार्थ - (वितर्का:) वितर्क हैं (हिंसा-आदयः) हिंसा आदि [यम-नियमों के विरोधी भाव] (कृत-कारित-अनुमोदिता:) स्वयं किये हुये, दूसरों से करवाये हुये और समर्थन किये हुये (लोभ-क्रोध-मोहपूर्वकाः) लोभ-क्रोध-मोह कारण वाले (मृदु-मध्य-अधिमात्रा) मंद, मध्य और तीव्र भेद वाले (दुःख-अज्ञान-अनन्तफलाः) अत्यधिक दुःख और अत्यधिक अज्ञान फल वाले (इति) इस प्रकार (प्रतिपक्ष - भावनम् ) प्रतिपक्ष का विचार करे अर्थात् दूर रहने का प्रयत्न करे।

सूत्रार्थ - यम-नियम के विरोधी भाव 'वितर्क' कहलाते हैं जो कि स्वयं किये हुये, दूसरों से करवाये हुये और अनुमोदन किये हुये तीन प्रकार के होते हैं। ये तीनों ही लोभ, क्रोध और मोह कारण वाले होते हैं। मृदु, मध्य और अधिमात्र भेद वाले होते हैं। इनका फल अत्यधिक दुःख और अत्यधिक अज्ञान होता है। इस प्रकार प्रतिपक्ष का विचार कर इनको दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये।

Vyas Bhashya

तत्र हिंसा तावत् - कृतकारितानुमोदितेति त्रिधा। एकैका पुनस्त्रिधा लोभेन मांसचर्मार्थेन, क्रोधेनापकृतमनेनेति, मोहेन धर्मो मे भविष्यतीति। लोभक्रोधमोहाः पुनस्त्रिविधा मृदुमध्याधिमात्रा इति। एवं सप्तविंशतिर्भेदा भवन्ति हिंसायाः। मृदुमध्याधिमात्राः पुनस्त्रिविधाःमृदुमृदुर्मध्यमृदुस्तीव्रमृदुरिति। तथा मृदुमध्यो मध्यमध्यस्तीव्रमध्य इति। तथा मृदुतीव्रो मध्यतीव्रोऽधिमात्रतीव्र इति। एवमेकाशीतिभेदा हिंसा भवति। सा पुनर्नियमविकल्पसमुच्चयभेदादसंख्येया प्राणभृद्भेदस्यापरिसंख्येयत्वादिति। एवमनृतादिष्वपि योज्यम्। ते खल्वमी वितर्का दुःखाज्ञानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम्, दुःखमज्ञानं चानन्तं फलं येषामिति प्रतिपक्षभावनम्। तथा च हिंसकस्तावत्प्रथमं वध्यस्य वीर्यमाक्षिपति, ततश्च शस्त्रादिनिपातेन दुःखयति, ततो जीवितादपि मोचयति। ततो वीर्याक्षेपादस्य चेतनाचेतनमुपकरणं क्षीणवीर्यं भवति, दुःखोत्पादान्नरकतिर्यक्प्रेतादिषु दुःखमनुभवति, जीवितव्यपरोपणात्प्रतिक्षणं च जीवितात्यये वर्तमानो मरणमिच्छन्नपि दुःखविपाकस्य नियतविपाकवेदनीयत्वात्कथञ्चिदेवोच्छ्वसिति। यदि च कथञ्चित्पुण्यावापगता हिंसा भवेत्तत्र सुखप्राप्तौ भवेदल्पायुरिति। एवमनृतादिष्वपि योज्यं यथासंभवम्। एवं वितर्काणां चामुमेवानुगतं विपाकमनिष्टं भावयन् न वितर्केषु मनः प्रणिदधीत॥३४॥

व्या० भा० अ० - उन में से हिंसा की गई, करवायी गई और अनुमोदित की गई इस प्रकार त्रिविध है। इन में से एक एक फिर तीन प्रकार की है। जैसे कि मांस चर्म के लिए की हुई (हिंसा अर्थात्) लोभ से। इसने अपकार किया (इस भावना से की हुई हिंसा) अर्थात् क्रोध से। (इस हिंसा से) मुझे धर्म (पुण्य) मिलेगा (ऐसी भावना से की हुयी हिंसा) अर्थात् मोह से। लोभ, क्रोध, मोह भी मृदु (मन्द), मध्य (पहले से अधिक), अधिमात्र (सबसे अधिक) ऐसे तीनतीन प्रकार के होते हैं। इस प्रकार हिंसा के सत्ताईस भेद होते हैं। ये मृदु, मध्य, अधिमात्र फिर तीन-तीन प्रकार के होते हैं जैसे कि मृदुमृदु, मध्यमृदु, तीव्रमृदु। इसी प्रकार मृदुमध्य, मध्यमध्य, तीव्र मध्य (और) मृदुतीव्र, मध्यतीव्र, अधिमात्रतीव्र। इस प्रकार हिंसा इक्यासी भेद वाली होती है। फिर वह (हिंसा) नियम, विकल्प, समुच्चय भेद से प्राणधारियों के प्रकार अगणित होने के कारण असङ्ख्य भेद वाली होती है। इस प्रकार असत्यादि वितर्कों में भी (भेदों को) समझ लेना चाहिए।

"वे ये वितर्क दुःख, अज्ञानरूपी अनन्त फल वाले होते हैं", इस प्रकार जानकर (वितर्क विरोधी) भावना करनी चाहिए। दुःख और अज्ञानरूपी अनन्त फल हैं जिन-जिन हिंसादि वितर्कों के (ऐसा समझकर) वितर्कों के विरुद्ध (अहिंसा आदि) प्रतिपक्षों की भावना करनी चाहिए। और (अब वितर्कों के विरुद्ध प्रतिपक्ष भावना के स्वरूप को बतलाते हैं) जैसे कि - और उसी प्रकार हिंसक प्रथम वध्य (प्राणी) के बल को अवरुद्ध करता है। पश्चात् शस्त्रादि के प्रहार के द्वारा दु:खी करता है। आगे जीवन से भी वियुक्त कर देता है। उस (पशु) के बल के अवरुद्ध करने से (हिंसक) के चेतन-अचेतन साधन निर्बल हो जाते हैं। दुःख उत्पन्न करने से हिंसक नरक दुःखदायी (पशु, पक्षी आदि), तिर्यक् = (कीड़े, मकोड़े आदि) के तथा मृतक शरीरों में (कीट के रूप में जन्म लेकर) दुःख - अनुभव करता है। जीवन से वियुक्त करने से क्षण-क्षण जीवन की मरणासन्न अवस्था में वर्तमान, मरण को चाहता हुआ भी दुःखफल निश्चितरूप से भोग्य होने के कारण केवल किसी प्रकार श्वास लेता है। और यदि वह हिंसा (हिंसक के) पुण्य के साथ मिलकर फल देवे, तो उस हिंसक को सुख प्राप्ति होने पर वह (हिंसक) अल्पायु होता है। इसी प्रकार असत्य आदि में भी यथा सम्भव योजना कर लेनी चाहिए। इस प्रकार (हिंसादि) वितर्कों का अनुगमन करने वाले अनिष्ट फल को जानता हुआ वितर्कों में मन को न लगावे।।३४॥

Yog Prakash

इस सूत्र में वितर्कों के विषय में प्रतिपक्ष भावना का निर्देश है। वितर्कों में से हिंसा के विषय में इस प्रकार से समझना चाहिए कि हिंसा के तीन प्रकार हैं - कृत (= स्वयं की हुई), कारित (= अन्य से करवाई हुई) और अनुमोदित (= किसी के द्वारा की गई हिंसा को उचित मानना)। लोभ, क्रोध और मोह, ये हिंसा के तीन कारण हैं। लोभ से कृत, लोभ से कारित, लोभ से अनुमोदित। इसी प्रकार से क्रोध से कृत, कारित, अनुमोदित। मोह से कृत, कारित, अनुमोदित। ये ९ भेद हुए। कारणों के स्तर के भेद से हिंसा तीन प्रकार की होती है - अल्पलोभ से, मध्यम स्तर के लोभ से, अधिक लोभ से की हुई हिंसा। अल्प क्रोध से, मध्यम स्तर के क्रोध से और अधिक क्रोध से की गई हिंसा। अल्प मोह से, मध्यम स्तर के मोह से और अधिक मोह से की गई हिंसा। इस प्रकार से कारणों के भेद से कृत हिंसा के ९ भेद हो जायेंगे। इसी प्रकार कृत तथा कारित हिंसा के ९ - ९ होने पर २७ प्रकार की हिंसा हुई। पुनः इन के भी मृदु, मध्य, अधिमात्र भेद होने से हिंसा ८१ प्रकार की होती है। हिंसा करने वालों के विचार तीन प्रकार के हो सकते हैं। -

(१) नियम - एक ही प्राणी मछली की हिंसा करूँगा,

(२) विकल्प - मछली या बकरी, किसी एक की हिंसा करूँगा।

(३) समुच्चय - जो भी प्राणी मिले, उसकी हिंसा करूँगा।

इस प्रकार असंख्य प्राणी होने के कारण हिंसा असंख्य प्रकार की हो सकती है। इसी प्रकार से असत्य आदि के विषय में भी जानना चाहिये। योगाभ्यासी को इन वितर्कों के विषय में इस प्रकार से विचार करना चाहिये कि यदि मैं इन वितर्कों के अनुसार आचरण करूँगा तो इनका फल पशु, पक्षी, कीट, पतङ्ग आदि विविध योनियों में दीर्घकाल पर्यन्त अज्ञान में रहकर महादुःख भोगना पड़ेगा। इस प्रकार प्रतिपक्ष भावना के विचारों से हिंसादि दुष्ट कर्मों से योगी बच जाता है।

अहिंसादि कर्मों को शुभ और हिंसा आदि कर्मों को अशुभ कहा है। इसलिये अशुभ और शुभ कर्मों का निर्णय करना चाहिये। क्योंकि कोई व्यक्ति किसी कर्म को शुभ कहता है तो दूसरा व्यक्ति उसी कर्म को अशुभ कहता है। इस प्रकार से प्रमाणों से शुभाशुभ का निर्णय कर लेना चाहिये। इसके बिना अहिंसादि का पालन और हिंसादि का परित्याग नहीं हो सकता। जो कर्म प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्दप्रमाण से सब के लिये सुखप्रद सिद्ध होता है वह शुभ कर्म है और जो कर्म सबके लिये दुःखप्रद सिद्ध होता है वह अशुभ कर्म है। इसको यूँ भी कह सकते हैं कि जिस कार्य को करने का आदेश ईश्वर ने दिया है, वह शुभ कर्म है। और जिस कर्म का ईश्वर ने निषेध किया है, वह अशुभ कर्म है। ईश्वर का निर्णय अन्तिम इसलिये माना जाता है कि वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, आनन्दस्वरूप होने से अन्याय कभी भी नहीं करता।

ईश्वर ने वेद में उपदेश किया है कि सभी प्राणी परस्पर मित्रता का व्यवहार करें। असत्य का परित्याग और सत्य का आचरण करें। उपरोक्त कर्म सबके लिये हितकारी होने से शुभकर्म हैं। इसके विपरीत अशुभ कर्म हैं। जब व्यक्ति यह मान लेता है कि ईश्वर शुभ कर्मों का सुख फल और अशुभ कर्मों का दुःख फल अवश्य ही देता है। तब वह अशुभ कर्मों को छोड़कर शुभ कर्मों को अवश्य ही करता है। इस मान्यता के आधार पर हिंसा आदि अशुभ कर्मों का परित्याग करना सरल हो जाता है। जब व्यक्ति हिंसा आदि अशुभ कर्मों को छोड़कर अहिंसा आदि शुभकर्मों को करता है तो उन दोनों प्रकार के कर्मों का परिणाम अनुभव में आता है। उससे अशुभ कर्मों के करने की इच्छा समाप्त होती है और शुभ कर्मों को करने की इच्छा तीव्र हो जाती है। इस प्रकार से वितर्कों को रोकने में सहायता मिलती है।

कर्मों का फल विभिन्न कालों में मिलता है (१) तत्काल (२) कालान्तर में और (३) जन्मान्तर में। जन्मान्तर में मिलने वाला फल प्रत्यक्षरूप में ज्ञात नहीं होता इसलिये इस विषय में संशय होता है। इसका निवारण अनुमान प्रमाण और शब्द प्रमाण से होता है। शब्द प्रमाण में यह कहा है कि अशुभ कर्मों के करने से पशु आदि योनि और शुभ कर्मों के करने से मनुष्य योनि की प्राप्ति होती है। अनुमान प्रमाण से भी यह बात सिद्ध होती है। मनुष्य के शरीर में जैसे सुख और सुख के साधन हैं वैसे सुख और सुख के साधन पशु, पक्षी आदि योनियों में नहीं हैं। इससे सिद्ध होता है कि मनुष्य और पशु आदि योनियाँ भिन्न-भिन्न कर्मों का फल है। इस प्रकार से काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि पर विजय प्राप्त की जा सकती है॥३४॥

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