इस सूत्र में वितर्कों के विषय में प्रतिपक्ष भावना का निर्देश है। वितर्कों में से हिंसा के विषय में इस प्रकार से समझना चाहिए कि हिंसा के तीन प्रकार हैं - कृत (= स्वयं की हुई), कारित (= अन्य से करवाई हुई) और अनुमोदित (= किसी के द्वारा की गई हिंसा को उचित मानना)। लोभ, क्रोध और मोह, ये हिंसा के तीन कारण हैं। लोभ से कृत, लोभ से कारित, लोभ से अनुमोदित। इसी प्रकार से क्रोध से कृत, कारित, अनुमोदित। मोह से कृत, कारित, अनुमोदित। ये ९ भेद हुए। कारणों के स्तर के भेद से हिंसा तीन प्रकार की होती है - अल्पलोभ से, मध्यम स्तर के लोभ से, अधिक लोभ से की हुई हिंसा। अल्प क्रोध से, मध्यम स्तर के क्रोध से और अधिक क्रोध से की गई हिंसा। अल्प मोह से, मध्यम स्तर के मोह से और अधिक मोह से की गई हिंसा। इस प्रकार से कारणों के भेद से कृत हिंसा के ९ भेद हो जायेंगे। इसी प्रकार कृत तथा कारित हिंसा के ९ - ९ होने पर २७ प्रकार की हिंसा हुई। पुनः इन के भी मृदु, मध्य, अधिमात्र भेद होने से हिंसा ८१ प्रकार की होती है। हिंसा करने वालों के विचार तीन प्रकार के हो सकते हैं। -
(१) नियम - एक ही प्राणी मछली की हिंसा करूँगा,
(२) विकल्प - मछली या बकरी, किसी एक की हिंसा करूँगा।
(३) समुच्चय - जो भी प्राणी मिले, उसकी हिंसा करूँगा।
इस प्रकार असंख्य प्राणी होने के कारण हिंसा असंख्य प्रकार की हो सकती है। इसी प्रकार से असत्य आदि के विषय में भी जानना चाहिये। योगाभ्यासी को इन वितर्कों के विषय में इस प्रकार से विचार करना चाहिये कि यदि मैं इन वितर्कों के अनुसार आचरण करूँगा तो इनका फल पशु, पक्षी, कीट, पतङ्ग आदि विविध योनियों में दीर्घकाल पर्यन्त अज्ञान में रहकर महादुःख भोगना पड़ेगा। इस प्रकार प्रतिपक्ष भावना के विचारों से हिंसादि दुष्ट कर्मों से योगी बच जाता है।
अहिंसादि कर्मों को शुभ और हिंसा आदि कर्मों को अशुभ कहा है। इसलिये अशुभ और शुभ कर्मों का निर्णय करना चाहिये। क्योंकि कोई व्यक्ति किसी कर्म को शुभ कहता है तो दूसरा व्यक्ति उसी कर्म को अशुभ कहता है। इस प्रकार से प्रमाणों से शुभाशुभ का निर्णय कर लेना चाहिये। इसके बिना अहिंसादि का पालन और हिंसादि का परित्याग नहीं हो सकता। जो कर्म प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्दप्रमाण से सब के लिये सुखप्रद सिद्ध होता है वह शुभ कर्म है और जो कर्म सबके लिये दुःखप्रद सिद्ध होता है वह अशुभ कर्म है। इसको यूँ भी कह सकते हैं कि जिस कार्य को करने का आदेश ईश्वर ने दिया है, वह शुभ कर्म है। और जिस कर्म का ईश्वर ने निषेध किया है, वह अशुभ कर्म है। ईश्वर का निर्णय अन्तिम इसलिये माना जाता है कि वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, आनन्दस्वरूप होने से अन्याय कभी भी नहीं करता।
ईश्वर ने वेद में उपदेश किया है कि सभी प्राणी परस्पर मित्रता का व्यवहार करें। असत्य का परित्याग और सत्य का आचरण करें। उपरोक्त कर्म सबके लिये हितकारी होने से शुभकर्म हैं। इसके विपरीत अशुभ कर्म हैं। जब व्यक्ति यह मान लेता है कि ईश्वर शुभ कर्मों का सुख फल और अशुभ कर्मों का दुःख फल अवश्य ही देता है। तब वह अशुभ कर्मों को छोड़कर शुभ कर्मों को अवश्य ही करता है। इस मान्यता के आधार पर हिंसा आदि अशुभ कर्मों का परित्याग करना सरल हो जाता है। जब व्यक्ति हिंसा आदि अशुभ कर्मों को छोड़कर अहिंसा आदि शुभकर्मों को करता है तो उन दोनों प्रकार के कर्मों का परिणाम अनुभव में आता है। उससे अशुभ कर्मों के करने की इच्छा समाप्त होती है और शुभ कर्मों को करने की इच्छा तीव्र हो जाती है। इस प्रकार से वितर्कों को रोकने में सहायता मिलती है।
कर्मों का फल विभिन्न कालों में मिलता है (१) तत्काल (२) कालान्तर में और (३) जन्मान्तर में। जन्मान्तर में मिलने वाला फल प्रत्यक्षरूप में ज्ञात नहीं होता इसलिये इस विषय में संशय होता है। इसका निवारण अनुमान प्रमाण और शब्द प्रमाण से होता है। शब्द प्रमाण में यह कहा है कि अशुभ कर्मों के करने से पशु आदि योनि और शुभ कर्मों के करने से मनुष्य योनि की प्राप्ति होती है। अनुमान प्रमाण से भी यह बात सिद्ध होती है। मनुष्य के शरीर में जैसे सुख और सुख के साधन हैं वैसे सुख और सुख के साधन पशु, पक्षी आदि योनियों में नहीं हैं। इससे सिद्ध होता है कि मनुष्य और पशु आदि योनियाँ भिन्न-भिन्न कर्मों का फल है। इस प्रकार से काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि पर विजय प्राप्त की जा सकती है॥३४॥