Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 2/32

2/32
Sutra
शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ।। २.३२ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः॥३२॥

शब्दार्थ - (शौच-सन्तोष- तपः - स्वाध्याय - ईश्वरप्रणिधानानि ) शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान (नियमाः) ये नियम हैं।

सूत्रार्थ - शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान ये पाँच नियम कहलाते हैं।

Vyas Bhashya

तत्र शौचं मृज्जलादिजनितं मेध्याभ्यवहरणादि च बाह्यम्। आभ्यन्तरं चित्तमलानामाक्षालनम्। संतोषः संनिहितसाधनादधिकस्यानुपादित्सा। तपो द्वन्द्वसहनम्। द्वन्द्वश्च जिघत्सापिपासे, शीतोष्णे, स्थानासने, काष्ठमौनाकारमौने च। व्रतानि चैषां यथायोगं कृच्छ्रचान्द्रायणसान्तपनादीनि। स्वाध्यायो मोक्षशास्त्राणामध्ययनं प्रणवजपो वा। ईश्वरप्रणिधानं तस्मिन् परमगुरौ सर्वकर्मार्पणम्।शय्यासनस्थोऽथ पथि व्रजन्वा स्वस्थः परिक्षीणवितर्कजालः। संसारबीजक्षयमीक्षमाणः स्यान्नित्यमुक्तोऽमृतभोगभागी॥ यत्रेदमुक्तं-ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च (१।२९ ) इति॥३२॥

व्या० भा० अ० - उनमें से 'शौच' मिट्टी, जल आदि से होने वाला और पवित्र भोजन आदि बाह्य (शौच) है। चित्त के मलों को दूर करना आभ्यन्तर ( शौच ) है। 'सन्तोष' - अपने पास में विद्यमान साधन से अधिक (साधन) को ग्रहण करने की अनिच्छा। 'तप' - द्वन्द्वों को सहना। और द्वन्द्व भूख प्यास, शीतोष्ण, खड़ा होना बैठना, काष्ठ मौन (लकड़ी के समान मौन)

आकार मौन (मुख से कुछ न बोलना) और अनुकूलता के अनुसार व्रत कृच्छ्र, चान्द्रायण, सान्तपनादि' तप कहलाते हैं। 'स्वाध्याय' - मोक्ष (के उपदेश करने वाले) शास्त्रों का अध्ययन और प्रणव (ओम्) का जप। 'ईश्वरप्रणिधान' सब कर्मों को उस परमगुरु (परमेश्वर) में अर्पित करना। शय्या वा आसन पर स्थित अथवा मार्ग पर चलता हुआ आत्मनिष्ठ, वितर्क जाल से रहित, संसार के बीजरूपी अविद्या के क्षय को देखता हुआ नित्यमुक्त, अमृत भोगने वाला होता है। जिसके प्रसङ्ग में यह कहा गया है कि "उस (ईश्वरप्रणिधान) से जीवात्मा के स्वरूप का ज्ञान, ईश्वरसाक्षात्कार और अन्तरायों का अभाव होता है"॥३२॥

Yog Prakash

इस सूत्र में पाँच नियमों का कथन किया है। शौच - शौच अर्थात् शुद्धि। शुद्धि दो प्रकार की है। एक बाह्य और दूसरी आन्तरिक। शरीर, वस्त्र, स्थान, पात्र, भोजन आदि को शुद्ध रखना और धन, सम्पत्ति को न्यायपूर्वक उपार्जित करना बाहर की शुद्धि है। अविद्या, मिथ्याभिमान, राग, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि को दूर करना आन्तरिक शुद्धि है। बाहर की शुद्धि न्यून परिश्रम साध्य है और आन्तरिक शुद्धि अधिक परिश्रम साध्य है। बाहर की शुद्धि की अपेक्षा आन्तरिक शुद्धि करने में अधिक प्रयत्न करना चाहिये। 

सन्तोष - सम्पूर्ण पुरुषार्थ के पश्चात् जो भी उपलब्धि हो, उसी में सन्तुष्ट रहना, उससे अधिक की इच्छा न करना, सन्तोष है।

तप - धर्माचरण करते हुवे हानि-लाभ, सुख-दुःख, मान-अपमान, सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास आदि को शान्त चित्त से सहन करना, तप है। जिन उत्तम कार्यों के करने से स्वयं का और अन्यों का दुःख दूर होता है और सुख की प्राप्ति होती है उनको करते रहना और न छोड़ना, धर्माचरण है।

स्वाध्याय वेद और वेदानुकूल मोक्ष के स्वरूप को एवं उसके साधन, बाधकों को बतलाने वाले ग्रन्थों को पढ़ना-पढ़ाना और ईश्वर के स्वरूप को प्रकाशित करने वाले मन्त्रों एवं प्रणव आदि का अर्थसहित जप करना, स्वाध्याय है। -

ईश्वरप्रणिधान - समस्त विद्याओं को देने वाले परमगुरु ईश्वर में समस्त कर्मों को समर्पित कर देना, उसकी भक्ति करना, व्यवहार में उसके आदेशों का पालन करना, शरीर आदि पदार्थों को उसके मानकर धर्माचरण करना, कर्मों का लौकिक फल न चाहना, ईश्वरसाक्षात्कार को ही लक्ष्य बनाकर कार्यों को करना, ईश्वरप्रणिधान है। मोक्षप्राप्ति का ईश्वरप्रणिधान विशेष साधन है। इसका पहले उल्लेख कर दिया है। ईश्वरप्रणिधान को अच्छे प्रकार से जानकर तदनुसार आचरण करने से ईश्वर सहायता देता है। जिससे शीघ्र ही समाधि की सिद्धि और विघ्नों का निराकरण हो जाता है। योगदर्शनकार ने प्रथम पाद के २८ वें सूत्र ( ततः प्रत्यक्चेतना..... ) में ईश्वरप्रणिधान का फल बतलाया है कि इससे ईश्वर एवं जीवात्मा के स्वरूप का साक्षात्कार और विघ्न तथा उपविघ्नों का नाश होता है॥३२॥

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