इस सूत्र में यमनियमादि योग के आठ अङ्गों के नाम बतलाये हैं। इन आठ अङ्गों में समाधि को भी योग का अङ्ग बतलाया है। इसका कारण यह है कि योगदर्शन के तीसरे पाद में धारणा, ध्यान और समाधि को सम्प्रज्ञात समाधि का अन्तरङ्ग साधन बतलाया है। इसलिये इस सूत्र में उक्त समाधि, सम्प्रज्ञातसमाधि का अङ्ग है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार ये पाँच सम्प्रज्ञात समाधि के बहिरङ्ग और धारणा, ध्यान और समाधि अन्तरङ्ग साधन हैं। परन्तु धारणा ध्यान समाधि भी निर्बीज समाधि के बहिरङ्ग हैं। जिस सम्प्रज्ञात समाधि के ये तीन अन्तरङ्ग साधन हैं। तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य।। योग० ३/८॥वह सम्प्रज्ञात समाधि भी निर्बीज समाधि का बहिरङ्ग है। निर्बीज समाधि का अन्तरङ्ग साधन परवैराग्य है। इस प्रकार बहिरङ्ग, अन्तरङ्ग को समझना चाहिये।
योगजिज्ञासुओं को इन आठ अङ्गों का मन, वचन और शरीर से श्रद्धापूर्वक पालन करना चाहिये। इनमें से प्रथम अङ्ग यम का परिवार, समाज, देश और विश्व से अधिक सम्बन्ध रहता है और व्यक्ति से कुछ न्यून सम्बन्ध रहता है। अर्थात् अन्य प्राणियों के साथ इसका विस्तृत व्यवहार होता है और अपने साथ कुछ न्यून व्यवहार होता है। दूसरे अङ्ग नियम का व्यक्ति से अधिक सम्बन्ध रहता है और अन्य प्राणियों से न्यून सम्बन्ध। जैसे - वैरभाव को छोड़कर प्रेम से रहना, इसका सम्बन्ध अन्य प्राणियों से अधिक है और स्वयं से अपेक्षाकृत न्यून है। शरीर, मन आदि की शुद्धि का सम्बन्ध व्यक्ति से अधिक है और अन्य प्राणियों से न्यून। यमों का पालन करना अधिक परिश्रमसाध्य है। नियमों का पालन करना न्यून परिश्रमसाध्य है।
यमनियमों का पालन करना नैतिकता है। इनके पालन करने से व्यक्ति और समाज दोनों का निर्माण होता है। इनका पालन न करने से व्यक्ति और समाज दोनों का चरित्र अशुद्ध हो जाता है। इसलिये व्यवहार को शुद्ध करने के लिये और ईश्वरप्राप्ति के लिये इनका श्रद्धापूर्वक आचरण करना चाहिये। आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि का सम्बन्ध व्यक्ति से अधिक है और समाज से न्यून। यमनियमों के पालन करने से अन्य अङ्गों का पालन करना सरल होता है। अन्य अङ्गों का पालन करने से यमनियमों का पालन सरल होता है। शुद्ध व्यवहार से उपासना की शुद्धि होती है और शुद्ध उपासना से व्यवहार की शुद्धि होती है। जो व्यक्ति इन दोनों में से किसी एक का ही आचरण करता है उसको सफलता नहीं मिलती।
कुछ लोगों का यह विचार है कि पहले योग के आसनादि छः ही अङ्ग थे। पश्चात् उनमें यम-नियमों को मिलाकर आठ बनाये गये हैं। यह ठीक नहीं है। प्राचीन काल से ही यमनियम योग के अङ्ग रहे हैं। इसमें कुछ प्रमाण प्रस्तुत करते हैं -
(१) उपयामगृहीतोऽसि ध्रुवोऽसि ध्रुवक्षितिर्ध्रुवाणां ध्रुवतमोऽच्युतानामच्युतक्षित्तम एष ते योनिर्वैश्वानराय त्वा। ध्रुवं ध्रुवेण मनसा वाचा सोममव नयामि। अथा न ऽ इन्द्र ऽ इद्विषोऽसपत्नाः समनसस्करत्॥यजु० ७ / २५।।
उपयामगृहीतः यमानां समूहो यामम्, उपगतं च तद्यामं चोपयामम्, उपयामेन गृहीतः उपयामगृहीतः परमेश्वरः असि। हे परमेश्वर ! आप यम और नियमों से ग्रहण करने के योग्य हो। महर्षि दयानन्द कृत वेदभाष्य -
(२) यमान् सेवेत सततं न नियमान् केवलान् बुधैः।
यमान् पतत्यकुर्वाणो नियमान् केवलान् भजन्॥ मनु० ४/२०४॥
यमों का सेवन नित्य करे, केवल नियमों का नहीं क्योंकि यमों को न करता हुआ और केवल नियमों का सेवन करता हुआ भी अपने कर्त्तव्य से पतित हो जाता है। इसलिये यम सेवन पूर्वक नियम सेवन नित्य किया करे।- महर्षि दयानन्द कृत संस्कारविधि
(३) तदर्थं यमनियमाभ्यामात्मसंस्कारो योगाच्चाध्यात्मविध्युपायैः॥न्याय० ४ / २ / ४६॥
उस अपवर्ग की सिद्धि के लिये यमनियमों के द्वारा आत्म संस्कार अर्थात् अधर्म को दूर करना एवं धर्म का आचरण करना चाहिये। योगशास्त्र से अध्यात्मविधि जाननी चाहिये॥२९॥