इस सूत्र में यह बतलाया है कि यमनियमादि योग के आठ अङ्गों का अनुष्ठान करने से अशुद्धि का नाश होने पर ज्ञान की प्रवृद्धि विवेकख्यातिपर्यन्त होती है।
योग के आठ अङ्ग आगे कहे जायेंगे। उन आठ अङ्गों का मन, वचन और शरीर से अनुष्ठान करने से पाँच प्रकार की अविद्या का नाश हो जाता है, और विशुद्ध ज्ञान की अभिव्यक्ति हो जाती है। इस ज्ञान की वृद्धि का आधार ईश्वर और अपने (विद्या के) संस्कार हैं। जीवात्मा ईश्वर की आज्ञा का पालन करता है तो ईश्वर उसको विद्या प्रदान करता है। जितने स्तर पर योगाभ्यासी अङ्गों का अनुष्ठान करता है उतने स्तर पर अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि होती जाती है। यह ज्ञान की विवृद्धि विवेकख्यातिपर्यन्त पहुँचती है। जिस स्थिति में योगी जीवात्मा, बुद्धि, मन, शरीरादि जड़ पदार्थों का पृथक्-पृथक् स्पष्ट रूप से अनुभव करता है और वह प्राकृतिक पदार्थों की उपासना का परित्याग करके ईश्वर की उपासना करता है, उस स्थिति को विवेकख्याति कहते हैं। व्यासभाष्य में नव प्रकार के कारण गिनाये गये हैं। परन्तु योगाङ्गानुष्ठान दो प्रकार का ही कारण है। यह अशुद्ध अर्थात् अविद्या, अधर्मादि का नाश करता है और विद्या धर्म की प्राप्ति करवाता है।
(१) उत्पत्ति कारण - मन, ज्ञान की उत्पत्ति का कारण है। आत्मा मन के द्वारा ज्ञान की उत्पत्ति करता है।
(२) स्थिति कारण - स्थिति का कारण आहार है। मन की स्थिति का कारण भोग और अपवर्ग है। जैसा शरीर की जब तक भोग और अपवर्ग सिद्ध नहीं होते, तब तक मन विद्यमान रहता है। उनके सिद्ध होने पर प्रलय को प्राप्त हो जाता है। जैसे कि शरीर को आहार मिलने से विद्यमान रहता है और न मिलने पर नष्ट हो जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि जैसे शरीर की स्थिति का कारण आहार है वैसे ही मन की स्थिति का कारण भोगापवर्ग है।
(३) अभिव्यक्ति कारण - प्रकाश पदार्थ के रूप की अभिव्यक्ति का कारण है। वैसे ही रूपज्ञान भी अभिव्यक्ति का कारण है।
(४) विकार कारण - मन के विकार का कारण वे अन्य विषय हैं जिन के कारण वह ज्ञेय विषय को छोड़ देता है जैसे अग्नि चावलादि के पकाने में कारण है। अर्थात् पकाये जाने वाले पदार्थ के विकार का कारण है।
(५) प्रत्यय कारण - धूमज्ञान, अग्निज्ञान का कारण है।
(६) प्राप्ति कारण - योगाङ्गानुष्ठान, विवेकख्याति की प्राप्ति का कारण है।
(७) वियोग कारण - योगाङ्गानुष्ठान, अशुद्धि के वियोग का कारण है।
(८) अन्यत्व कारण - सुवर्णकार, सुवर्ण के अन्यत्व का कारण है। अर्थात् सुवर्णकार कुण्डल रुचकादि विविध आभूषणों को बनाकर सुवर्ण में अन्यत्व को उत्पन्न कर देता है। इसी प्रकार एक सुन्दर व्यक्ति के विषय में अविद्या मूढत्व में, द्वेष दुःखत्व में, राग सुखत्व में और तत्त्वज्ञान उदासीनता में कारण है।
(९) धृतिकारण - शरीर, इन्द्रियों के धारण का कारण है और इन्द्रियाँ, शरीर के धारण का कारण हैं। इसी प्रकार से मनुष्य, पशु, पक्षी, औषधी आदि परस्पर एक दूसरे के धारण के कारण हैं। इस प्रकार से नव प्रकार के कारण हैं। इनको यथास्थान समझ लेना चाहिये। अर्थात् जो कारण जहाँ पर सार्थक सिद्ध होता हो, उसको वहाँ पर कारणरूप में मानना चाहिये। योगाङ्गानुष्ठान तो दो प्रकार का ही कारण है अन्य प्रकार का नहीं।
इससे यह जानना चाहिये कि अविद्या, अधर्म आदि अशुद्धि को योग के आठ अङ्गों के अनुष्ठान से ही दूर किया जा सकता है, अन्य प्रकार से नहीं। विवेकख्याति की प्राप्ति भी इन्हीं अङ्गों के आचरण से हो सकती है। अष्टाङ्गयोग के आचरण से व्यक्ति, परिवार, समाज, देश और विश्व की लौकिक उन्नति भी होती है और मोक्ष की प्राप्ति भी होती है। इसलिये इन आठ योगाङ्गों का सभी को पालन करना चाहिये।
शंका- कुछ लोग योग के छः अंग मानते हैं।
समाधान - 'वेदेषु चाष्टगुणिनं योगमाहुर्मनीषिणः "।। महाभारत शान्तिपर्व ३१७/७॥अर्थात् मनीषिगण वेदों में योग को अष्टगुणी (अष्टाङ्ग = आठ अङ्गों वाला) कहते हैं॥२८॥