Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 2/24

2/24
Sutra
तस्य हेतुरविद्या ।। २.२४ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Inception

अव० - यस्तु प्रत्यक्चेतनस्य स्वबुद्धिसंयोगः –

अर्थ - जीव का अपनी बुद्धि के साथ जो संयोग है (उसका कारण सूत्र से बताया जाता है) 

Word Meaning

तस्य हेतुरविद्या॥२४॥

शब्दार्थ (तस्य) उस संयोग का ( हेतु:) कारण (अविद्या) मिथ्याज्ञान है। 

सूत्रार्थ - उस संयोग का कारण 'अविद्या' है।

Vyas Bhashya

विपर्ययज्ञानवासनेत्यर्थः। विपर्ययज्ञानवासनावासिता च न कार्यनिष्ठं पुरुषख्यातिं बुद्धिः प्राप्नोति, साधिकारा पुनरावर्तते। सा तु पुरुषख्यातिपर्यवसाना कार्यनिष्ठां प्राप्नोति, चरिताधिकारा निवृत्तादर्शना बन्धकारणाभावान्न पुनरावर्तते।

अत्र कश्चित्षण्डकोपाख्यानेनोद्घाटयति-मुग्धया भार्ययाभिधीयते षण्डकः। आर्यपुत्र ! अपत्यवती मे भगिनी किमर्थं नाहमिति। स तामाह - मृतस्तेऽहमपत्यमुत्पादयिष्यामीति। तथेदं विद्यमानं ज्ञानं चित्तनिवृत्तिं न करोति, विनष्टं करिष्यतीति का प्रत्याशा।

तत्राचार्यदेशीयो वक्ति-ननु बुद्धिनिवृत्तिरेव मोक्षः, अदर्शनकारणाभावाद् बुद्धिनिवृत्तिः। तच्चादर्शनं बन्धकारणं दर्शनान्निवर्तते। तत्र चित्तनिवृत्तिरेव मोक्षः। किमर्थमस्थान एवास्य मतिविभ्रमः॥२४॥

व्या० भा० अ० अविद्या का अर्थ 'मिथ्याज्ञान की वासना' है। मिथ्याज्ञान की वासना से भरी हुई बुद्धि विवेकख्याति रूप कार्य की परिसमाप्ति को प्राप्त नहीं करती। अधिकार (पुरुष के लिए भोगापवर्ग को सम्पादित करने की क्षमता) के कारण पुनः भोगापवर्ग के लिए प्रवृत्त होती है। और वह (बुद्धि) विवेकख्याति पर्यन्त रहने वाली होने के कारण कार्य को परिसमाप्त कर लेती है। तब समाप्तधिकार अर्थात् कार्य को सम्पन्न कर चुके होने से मिथ्याज्ञान से मुक्त हुई बन्धन के कारण के अभाव के कारण पुन: प्रवृत्त नहीं होती।

इस विषय में कोई (पूर्वपक्षी) नपुंसक के उपाख्यान के द्वारा आक्षेप करता है। कोई भोली पत्नी नपुंसक पति से कहती है कि "आर्यपुत्र ! मेरी बहिन सन्तान वाली है, मैं क्यों नहीं ?" वह उस पत्नी से कहता है कि “मर कर मैं तेरी सन्तान को उत्पन्न करूँगा”। इसी प्रकार यह विद्यमान विवेकज्ञान चित्त की निवृत्ति को नहीं करता है विनष्ट होकर (चित्तनिवृत्ति को) करेगा, यह आशा कैसे की जा सकती है ?

कोई आचार्य सदृश व्यक्ति समाधान करता है कि "बुद्धिनिवृत्ति ही मोक्ष है"। अदर्शन रूपी कारण के अभाव होने पर बुद्धिनिवृत्ति होती है। और वह अदर्शन बन्ध का कारण ( है वह) दर्शन (ज्ञान) से निवृत्त होता है। सारांश यह है कि चित्तनिवृत्ति ही 'मोक्ष' है। (इसलिए) पूर्वपक्षी को इस सन्दर्भ में भ्रान्त होने का कोई अवसर नहीं है॥२४॥

Yog Prakash

इस सूत्र में अज्ञानपूर्वक संयोग का कारण अविद्या को कहा है। विपरीत ज्ञान की जो वासना है, वह अविद्या है। सूत्रकार ने योगदर्शन २।५ में बतलाया है कि अनित्य को नित्य, अशुद्ध को शुद्ध, दुःख को सुख और अनात्मा को आत्मा जानना 'अविद्या' है। अज्ञान अवस्था में बुद्धि और आत्मा में अशुभ वासनाएँ उत्पन्न होती हैं। उन वासनाओं से बुद्धि अपवर्ग को सिद्ध नहीं करती। उन वासनाओं के कारण बुद्धि बार-बार पुनर्जन्म का कारण बनती है। विवेकख्याति उत्पन्न होने पर मिथ्याज्ञान की वासनायें दूर हो जाती हैं। उन वासनाओं के दूर होने से बुद्धि, भोग और अपवर्ग को सिद्ध करके रुक जाती है। अर्थात् आगामी जन्म का कारण नहीं बनती। विवेकख्याति मोक्ष का कारण मानी जाती है। मोक्ष प्राप्ति काल में वह नहीं रहती।

यहाँ पर शंका होती है कि मोक्षकाल में विवेकख्याति के न रहने से वह मोक्ष का उपाय क्यों मानी जाती है ? इसका समाधान यह है कि सम्प्रज्ञात समाधि से विवेकख्याति उत्पन्न होती है उससे परवैराग्य उत्पन्न होता है। उससे असम्प्रज्ञात समाधि उत्पन्न होती है। उससे मोक्ष की सिद्धि होती है। विवेकख्याति परम्परा से मोक्ष का कारण है, साक्षात् मोक्ष का कारण नहीं है। मोक्ष का अन्तरङ्ग साधन तो ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है। इसलिये विवेकख्याति परवैराग्य तक पहुँचाने में ही मोक्ष का उपाय है। अज्ञानावस्था में उत्पन्न मिथ्याज्ञान की वासना जन्म-जन्मान्तर में जीवात्मा के साथ रहती है। उससे अज्ञान, अज्ञान से अशुद्ध कर्म और अशुद्ध उपासना, उनसे पुनः मिथ्याज्ञान, उस (मिथ्याज्ञान) से आत्मा अशुभ कर्म और उपासना करता है। उसी के परिणामस्वरूप पशु, पक्षी आदि योनि के रूप में बन्धन की प्राप्ति होती है।

यहाँ पर यह जानना चाहिये कि अविद्या और उससे उत्पन्न वासना चाहे कितने जन्मों की क्यों न हो, उसको दूर किया जा सकता है। उदाहरण अज्ञान के कारण व्यक्ति यह मान लेता है कि “मन एक चेतन पदार्थ है। वह स्वयं चलता है।" इस मिथ्यावासना को शुद्ध ज्ञान के संस्कारों से दूर किया जाता है। मिथ्यावासना के कारण जब यह प्रतीति हो कि मन चेतन पदार्थ है, तब इसके विपरीत विचारना चाहिये कि " मन जड़ पदार्थ है। उसको मैं चलाता हूँ।" इससे मिथ्यावासना समाप्त हो जाती है। मिथ्याज्ञान के कारण मनुष्य शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि को चेतन मानता है, विषयभोगों में दु:खरहित सुख, अपने को ईश्वर का अंश, हिंसा आदि को शुभ कर्म, अपने को ईश्वर रचित पदार्थों का स्वामी मानता है। इत्यादि विषयों में विद्यमान मिथ्याज्ञान की वासना को भी मन के चेतन मानने स्वरूप मिथ्याज्ञान वासना को दूर करने के समान दूर किया जाता है। इसमें दीर्घकाल, निरन्तरता और सत्कारपूर्वक अभ्यास की आवश्यकता है॥२४॥

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