इस सूत्र में अज्ञानपूर्वक संयोग का कारण अविद्या को कहा है। विपरीत ज्ञान की जो वासना है, वह अविद्या है। सूत्रकार ने योगदर्शन २।५ में बतलाया है कि अनित्य को नित्य, अशुद्ध को शुद्ध, दुःख को सुख और अनात्मा को आत्मा जानना 'अविद्या' है। अज्ञान अवस्था में बुद्धि और आत्मा में अशुभ वासनाएँ उत्पन्न होती हैं। उन वासनाओं से बुद्धि अपवर्ग को सिद्ध नहीं करती। उन वासनाओं के कारण बुद्धि बार-बार पुनर्जन्म का कारण बनती है। विवेकख्याति उत्पन्न होने पर मिथ्याज्ञान की वासनायें दूर हो जाती हैं। उन वासनाओं के दूर होने से बुद्धि, भोग और अपवर्ग को सिद्ध करके रुक जाती है। अर्थात् आगामी जन्म का कारण नहीं बनती। विवेकख्याति मोक्ष का कारण मानी जाती है। मोक्ष प्राप्ति काल में वह नहीं रहती।
यहाँ पर शंका होती है कि मोक्षकाल में विवेकख्याति के न रहने से वह मोक्ष का उपाय क्यों मानी जाती है ? इसका समाधान यह है कि सम्प्रज्ञात समाधि से विवेकख्याति उत्पन्न होती है उससे परवैराग्य उत्पन्न होता है। उससे असम्प्रज्ञात समाधि उत्पन्न होती है। उससे मोक्ष की सिद्धि होती है। विवेकख्याति परम्परा से मोक्ष का कारण है, साक्षात् मोक्ष का कारण नहीं है। मोक्ष का अन्तरङ्ग साधन तो ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है। इसलिये विवेकख्याति परवैराग्य तक पहुँचाने में ही मोक्ष का उपाय है। अज्ञानावस्था में उत्पन्न मिथ्याज्ञान की वासना जन्म-जन्मान्तर में जीवात्मा के साथ रहती है। उससे अज्ञान, अज्ञान से अशुद्ध कर्म और अशुद्ध उपासना, उनसे पुनः मिथ्याज्ञान, उस (मिथ्याज्ञान) से आत्मा अशुभ कर्म और उपासना करता है। उसी के परिणामस्वरूप पशु, पक्षी आदि योनि के रूप में बन्धन की प्राप्ति होती है।
यहाँ पर यह जानना चाहिये कि अविद्या और उससे उत्पन्न वासना चाहे कितने जन्मों की क्यों न हो, उसको दूर किया जा सकता है। उदाहरण अज्ञान के कारण व्यक्ति यह मान लेता है कि “मन एक चेतन पदार्थ है। वह स्वयं चलता है।" इस मिथ्यावासना को शुद्ध ज्ञान के संस्कारों से दूर किया जाता है। मिथ्यावासना के कारण जब यह प्रतीति हो कि मन चेतन पदार्थ है, तब इसके विपरीत विचारना चाहिये कि " मन जड़ पदार्थ है। उसको मैं चलाता हूँ।" इससे मिथ्यावासना समाप्त हो जाती है। मिथ्याज्ञान के कारण मनुष्य शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि को चेतन मानता है, विषयभोगों में दु:खरहित सुख, अपने को ईश्वर का अंश, हिंसा आदि को शुभ कर्म, अपने को ईश्वर रचित पदार्थों का स्वामी मानता है। इत्यादि विषयों में विद्यमान मिथ्याज्ञान की वासना को भी मन के चेतन मानने स्वरूप मिथ्याज्ञान वासना को दूर करने के समान दूर किया जाता है। इसमें दीर्घकाल, निरन्तरता और सत्कारपूर्वक अभ्यास की आवश्यकता है॥२४॥