इस सूत्र में स्व-स्वामी के स्वरूप की उपलब्धि का कारण संयोग बतलाया है। 'स्व' शब्द से प्रकृति और उससे उत्पन्न पदार्थों का ग्रहण होता है। 'स्वामी' शब्द से जीवात्मा का ग्रहण होता है।
अज्ञानता के कारण व्यक्ति मन, इन्द्रियों, शरीर आदि के द्वारा विषय भोग में लिप्त होता है तो वह दृश्य की उपलब्धि है। उसका नाम 'भोग' है। जब शुद्ध ज्ञान, शुद्ध कर्म और शुद्धोपासना से अपना और ईश्वर का साक्षात्कार करता है तो वह पुरुष के स्वरूप की उपलब्धि है, उसका नाम 'मोक्ष' है। वास्तविक ज्ञान से अर्थात् प्रकृति, विकृति, आत्मा और परमात्मा के ज्ञान से संयोग का नाश होता है। इसलिये वास्तविक ज्ञान संयोग का नाशक माना जाता है। विशुद्ध ज्ञान अज्ञान का विरोधी है और अज्ञान संयोग का कारण है। जब शुद्ध ज्ञान से अज्ञान का नाश हो जाता है तब मोक्ष की सिद्धि हो जाती है। यहाँ पर ज्ञान का तात्पर्य प्रकृति, जीवात्मा और ईश्वर के स्वरूप का साक्षात्कार करना है अर्थात् व्यावहारिक रूप से जानना है, शाब्दिक रूप से नहीं। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि केवल ज्ञान से मुक्ति नहीं होती। शुद्ध निष्काम कर्म और शुद्धोपासना ये भी मुक्ति के अनिवार्य साधन हैं।
वेद में मुक्ति के तीन साधन माने हैं।
विद्याञ्चाविद्याञ्च यस्तद्वेदोभय्ँ सह।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते॥ यजुः ४० /१४॥
भावार्थ - जो मनुष्य विद्या और अविद्या के स्वरूप को साथ साथ ही जानता है वह अविद्या अर्थात् कर्मोपासना से मृत्यु को तरके विद्या अर्थात् यथार्थ ज्ञान से मोक्ष को प्राप्त होता है। (सत्यार्थप्रकाश नवम समुल्लास) शुद्ध ज्ञान-कर्म-उपासना से तीन पदार्थों का वास्तविक ज्ञान, उससे अशुद्ध ज्ञान-कर्म-उपासना की निवृत्ति और समस्त दुःखों का विनाश तथा नित्यानन्द की प्राप्ति होती है। यह मोक्ष का स्वरूप है। जीवात्मा केवल अपने स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करके मुक्त नहीं हो सकता। अज्ञान का नाश ईश्वरप्रदत्त ज्ञान से होता है, केवल जीवात्मा के अपने ज्ञान से नहीं। केवल ज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति ही मोक्ष नहीं है, किन्तु ज्ञान, आनन्द और स्वतन्त्रता की प्राप्ति मोक्ष है। मुक्ति का देने वाला ईश्वर है। जीवात्मा स्वयं मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता। जिस अज्ञान को बन्धन का कारण माना जाता है, उसके स्वरूप को जानना आवश्यक है। अज्ञान के स्वरूप को जानने के लिये अनेक विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से प्रयास किया है।
(१) जब सत्त्वादि गुण आत्मा के भोग और अपवर्ग को सिद्ध करने में प्रवृत्त रहते हैं, क्या इसका नाम 'अज्ञान' है ?
(२) द्रष्टा = स्वामी = आत्मा का जो देखने का विषय प्रधान चित्त है, उसकी उत्पत्ति का न होना अज्ञान है ? अर्थात् जिस चित्त के द्वारा आत्मा, प्रकृति और पुरुष का विवेक प्राप्त करता है, उसका उत्पन्न न होना 'अज्ञान' है।
(३) क्या सत्त्वादि गुणों की भोगापवर्गरूप प्रयोजनवत्ता 'अज्ञान' है ?
(४) क्या अपने चित्त के साथ निरुद्ध हुई अविद्या जो अपने चित्त की पुनः उत्पत्ति का कारण है वह 'अज्ञान' है ?
(५) क्या प्रलय की स्थिति समाप्त होने पर सृष्टि की स्थिति का बना रहना 'अज्ञान' है ? प्रकृति की दो अवस्थायें हैं। एक है साम्यावस्था - प्रलय। दूसरी है विषमावस्था सृष्टि। इन दोनों अवस्थाओं के होने से प्रकृति को सृष्टि का उपादान कारण माना जाता है।
(६) कुछ लोगों का यह मत है कि दर्शनशक्ति ही अज्ञान है। प्रधान की प्रवृत्ति अपने स्वरूप को जनाने के लिये होती है। उसकी प्रवृत्ति अर्थात् सृष्टि के बिना प्रकृति का स्वरूप जीवात्मा के द्वारा नहीं जाना जाता, इसका नाम 'अज्ञान' है।
(७) कुछ लोगों का यह मत है कि प्रकृति और जीवात्मा दोनों का ही धर्म 'अज्ञान' हैं।
(८) कुछ लोगों का यह मत है कि शब्दादि विषयों का ज्ञान ही 'अज्ञान' है।
इन आठ में से चौथी मान्यता में अज्ञान का स्वरूप स्पष्ट है और यही बन्धन का कारण है। योगदर्शनकार ने अगले २४ वें सूत्र में इसी को कहा है कि 'तस्य हेतुरविद्या' जिस संयोग से जीव का बन्धन होता है, उसका कारण 'अविद्या' है। बुद्धि आदि प्राकृतिक पदार्थों के साथ अज्ञानपूर्वक सम्बन्ध और उनका अनुचित प्रयोग बन्धन का कारण है, केवल विषय सुख अर्थात् भोग विलास के लिये प्रयोग करना, ‘अनुचित प्रयोग' कहा जाता है। ज्ञानपूर्वक सम्बन्ध और उचित प्रयोग मोक्ष का कारण है। ईश्वर साक्षात्कार करने करवाने के लिए प्रयोग करना 'उचित प्रयोग' कहा जाता है।
कुछ लोगों की यह मान्यता है कि बन्ध और मोक्ष प्रकृति के होते हैं, जीवात्मा के नहीं। यह मान्यता ठीक नहीं है। क्योंकि प्रकृति जड़ होने से बन्ध और मोक्ष का अनुभव नहीं कर सकती। जीवात्मा चेतन होने से बन्ध - मोक्ष का अनुभव कर सकता है। जीवात्मा प्रकृति से बने पदार्थों के साथ अज्ञानपूर्वक व्यवहार करता है तो बन्धन को प्राप्त होता है, प्रकृति नहीं।
रूपैः सप्तभिरात्मानं बध्नाति प्रधानं कोशकारवद्विमोचयत्येकेन रूपेण॥सांख्य० ३/७३॥
भावार्थ - प्रकृति जीवात्मा को सात प्रकार से बाँधती है, कोशकार (रेशम का कीड़ा) के समान और एक प्रकार ( तत्त्वज्ञान) से मुक्त करती है। यहाँ आत्मा शब्द से जीवात्मा का ग्रहण होता है, प्रकृति का नहीं।
(क) प्रकृति और पुरुष का संयोग दो प्रकार का होता है (१) अज्ञानपूर्वक (२) ज्ञानपूर्वक। इन संयोगों के कारण क्या हैं, यह जानना आवश्यक है। माता, पिता, आचार्य, समाज, राजा, शिक्षाप्रणाली, पूर्वजन्म के अशुभ संस्कार और केवल विषय भोगों को ही लक्ष्य बना करके चलना आदि अज्ञानपूर्वक संयोग के कारण हैं। इससे व्यक्ति बन्धन को प्राप्त होता है।
(ख) इन सबके ठीक होने से जीवात्मा का प्रकृति और प्राकृतिक पदार्थों के साथ ज्ञानपूर्वक संयोग होता है। इससे व्यक्ति मोक्ष का भागी बनता है।
(ग) अज्ञानयुक्त इस संयोग की परम्परा को दूर करके ज्ञानयुक्त परम्परा को सञ्चालित करना चाहिये।
'उपदेश्योपदेष्टृत्वात् तत्सिद्धिः, इतरथा ह्यन्धपरम्परा॥ सांख्यदर्शन सूत्र ३-७९, ८१॥
भावार्थ - उच्च कोटि के शिष्य तथा तत्त्ववेत्ता गुरु होते हैं तो प्रकृति पुरुष का संयोग ज्ञानपूर्वक होता है। अन्यथा भोग की अंधपरम्परा चलती रहती है॥२३॥