इस सूत्र में यह कहा है कि उस जीवात्मा के लिये ही 'दृश्य का आत्मा' है। दृश्य के स्वरूप का वर्णन॥ २ / १८॥में कर दिया है। इस सूत्र में विशेष निर्णय किया है कि सत्त्व आदि तीन गुणों से, महत्तत्त्व से लेकर पृथिवी आदि स्थूलभूतों तक की रचना जीवात्मा के लिये होती है।ईश्वर पूर्णकाम है। उसको अपने लिये किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं है। प्रकृति जड़ होने से न सृष्टि की रचना कर सकती और न उससे बने पदार्थों का भोग कर सकती है। जीवात्मा चेतन पदार्थ है और उसमें बल भी है। परन्तु आत्मा में आनन्द नहीं है अतः वह आनन्दस्वरूप नहीं है। जो प्रकृति से बने पदार्थों में सुख है वह भी जीव में नहीं है। सृष्टि की रचना के बिना न जीवात्मा कर्म कर सकता है और न कर्मों का फल भोग सकता है। महत्तत्व से लेकर शरीरपर्यन्त सृष्टि की रचना हो जाने पर जीव कर्म करने में, भोग भोगने में तथा मोक्ष प्राप्ति में समर्थ होता है।
कुछ लोग कहते हैं कि जीवात्मा आनन्दस्वरूप है। यदि आनन्दस्वरूप होता तो योगदर्शनकार महर्षि पतञ्जलि जी यह न कहते कि जीवात्मा के लिये ही सृष्टि की रचना हुई है। दूसरी बात यह है कि आत्मा आनन्दस्वरूप होता तो वह दुःखमिश्रित सांसारिक भोगों में क्यों पड़ता ? यदि जीव का आनन्द गुण स्वाभाविक है तो ईश्वर के आनन्द की प्राप्ति के लिये ऋषियों ने योगाभ्यास का विधान क्यों किया ? इसलिये आत्मा आनन्दस्वरूप नहीं है॥२१॥