इस सूत्र में जीवात्मा का स्वरूप बतलाया है। जीवात्मा द्रष्टा है अर्थात् जानने वाला है और वह बुद्धि की वृत्तियों के अनुसार देखता है। आत्मा को दृशिमात्र कहा है। इसका अभिप्राय यह है कि जीवात्मा चेतन पदार्थ है, जड़ नहीं। आत्मा में ज्ञानगुण स्वाभाविक है। और बल, इच्छादि भी उसके स्वाभाविक गुण हैं। मन, इन्द्रियों के द्वारा पदार्थों के जो आकार-प्रकार बुद्धि में उतरते हैं, उसी के अनुसार जीवात्मा देखता है। आत्मा बुद्धि के साथ कुछ समानता रखता है और कुछ असमानता। बुद्धि के समक्ष जो पदार्थ उपस्थित होते हैं, उनका वह चित्र उतारती है और जो पदार्थ उसके समक्ष नहीं होते, उनका चित्र नहीं उतारती। जिनका चित्र उतरता है वे ज्ञात हैं और जिनका चित्र नहीं उतरता वे अज्ञात हैं अर्थात् चित्र वाले पदार्थों को आत्मा जानता है अन्यों को नहीं। यह पदार्थों का ज्ञात और अज्ञात रहना बुद्धि के परिणामित्व को सिद्ध करता है। बुद्धि में पदार्थों का जो भी आकार प्रकार उतरता है, उसको जीवात्मा सदा जानता है। कभी भी ऐसा नहीं होता कि बुद्धि में कोई चित्र उतरे और उसको जीवात्मा न जाने। इसी कारण से जीवात्मा अपरिणामी है। इसका अभिप्राय यह है कि बुद्धि परिवर्तनशील है, आत्मा नहीं। बुद्धि सत्त्वादि तीन गुणों का संघातरूप होकर कार्यों को सिद्ध करती है। इसलिये वह परार्थ है। अर्थात् आत्मा के लिये है। जैसे भवन आदि पदार्थ संघातरूप में होकर जीव के प्रयोजन की सिद्धि करते हैं, बुद्धि भी वैसे ही करती है। इसलिये परार्थ-दूसरे के लिये कही जाती है। आत्मा दूसरे के लिये नहीं। अतः वह स्वार्थ कहा जाता है।।
बुद्धि सत्त्वादि तीन गुणों से बनी है। इसलिये वह जड़ है। जीवात्मा तीन गुणों का भोक्ता है अतः वह चेतन है। यही बुद्धि और आत्मा की असमानरूपता कही जाती है। बुद्धि और आत्मा की समानरूपता यह है कि बुद्धि में जो विविध पदार्थों के आकार-प्रकार उतरते हैं उनको उसी रूप में देखता हुआ आत्मा अज्ञानता के कारण उनको और स्वयं को एक समझता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि प्राकृतिक पदार्थों के गुण हैं। परन्तु अज्ञानता के कारण जीवात्मा इनको अपने से भिन्न नहीं समझता। बुद्धि और जीवात्मा का निकटतम सम्बन्ध है।
अज्ञानता के कारण कभी-कभी जीवात्मा बुद्धि जैसा जड़ पदार्थ दिखता है और कभी जीव के सम्बन्ध से बुद्धि चेतनवत् दिखाई देती है। वास्तव में ये दोनों भिन्न-भिन्न हैं। बुद्धि जड़ पदार्थ है और जीवात्मा चेतन पदार्थ। जब आत्मा बुद्धिवृत्तियों को स्वयं से पृथक् नहीं जानता तब अस्मिता क्लेश की उत्पत्ति होती है। जब व्यक्ति अपने स्वरूप को ठीक प्रकार से जान जाता है तो यह भ्रान्ति दूर हो जाती है कि मैं और बुद्धि एक हैं। आत्मा के स्वरूप को ठीक प्रकार से जानने से व्यक्ति बुद्धि, मन, इन्द्रियों के आधीन नहीं होता। इनको अपने वश में करके मोक्ष की सिद्धि करता है। अपने स्वरूप को समझने पर ईश्वर का स्वरूप भी शीघ्र ज्ञात हो जाता है। जो व्यक्ति अपने स्वरूप को नहीं जानता, वह ईश्वर के स्वरूप को भी नहीं जान सकता।
संसार में अनेक लोग यह मानते हैं कि जीवात्मा ईश्वर का ही एक अंश है। कुछ लोग कहते हैं कि यह आत्मा प्रकृति के अंशों से बना है, इत्यादि अनेक मान्यतायें हैं। यदि जीवात्मा के स्वरूप को ठीक प्रकार से जान लिया जाय तो ये सब भ्रान्तियाँ दूर हो जाती हैं। प्रायः व्यक्ति यह समझते हैं कि मन विषयों में स्वयं चला जाता है। इस भ्रान्ति का कारण यही है कि वे जीवात्मा के स्वरूप को नहीं जानते। यदि व्यक्ति शान्त वातावरण में राग, द्वेष से रहित होकर निरीक्षण, परीक्षण करे तो यह परिज्ञान हो जायेगा कि मन आदि सभी उपकरणों को मैं चलाता हूँ। उपनिषत्कार ने इस विषय में कहा है कि -
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥॥ कठोपनिषद्।। ३/३-४॥
अर्थ - (आत्मानं रथिनं विद्धि) आत्मा को रथ का स्वामी जानो ( शरीरं तु रथम् एव) शरीर को तो रथ ही जानो (बुद्धि तु सारथिं विद्धि) बुद्धि को सारथि जानो (च मनः प्रग्रहम् एव) और मन को लगाम ही जानो (इन्द्रियाणि हयान् आहुः) इन्द्रियों को घोड़े कहते हैं ( तेषु विषयान् गोचरान्) विषयों को उनमें गोचर = भूमि = मार्ग कहते हैं। ( मनीषिणः) मनीषी = विद्वान् (इन्द्रियमनोयुक्तम् आत्मा) इन्द्रियों एवं मन से युक्त आत्मा को (भोक्ता इति आहुः) भोक्ता है, यह कहते हैं॥२०॥