Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 2/20

2/20
Sutra
द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ।। २.२० ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Inception

अव० व्याख्यातं दृश्यमथ द्रष्टुः स्वरूपावधारणार्थभिदमारभ्यते।

अर्थ दृश्य का व्याख्यान हो गया है। अब द्रष्टा के स्वरूप के निश्चय के लिये यह सूत्र लिखा जाता है।

Word Meaning

द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः॥२०॥

शब्दार्थ. (द्रष्टा) देखने वाला (दृशिमात्रः) ज्ञान स्वरूप जीवात्मा (शुद्धः) प्राकृतिक पदार्थों के सम्मिश्रण से रहित तथा अज्ञान, अधर्म, विकार आदि दोषों से स्वभावतः रहित होता हुआ (अपि) भी ( प्रत्यय - अनुपश्य:) चित्त की वृत्तियों के अनुसार देखने वाला है। 

सूत्रार्थ - प्राकृतिक पदार्थों के सम्मिश्रण तथा अज्ञान, अधर्म, विकारादि दोषों से रहितहोता हुआ भी चित्त की वृत्तियों के अनुसार देखने वाला चेतन पदार्थ 'जीवात्मा' है।

Vyas Bhashya

दृशिमात्र इति दृक्शक्तिरेव विशेषणापरामृष्टेत्यर्थः। स पुरुषो बुद्धेः प्रतिसंवेदी। स बुद्धेर्न सरूपो नात्यन्तं विरूप इति। न तावत्सरूपः। कस्मात् ? ज्ञाताज्ञातविषयत्वात्परिणामिनी हि बुद्धिः, तस्याश्च विषयो गवादिर्घटादिर्वा ज्ञातश्चाज्ञातश्चेति परिणामित्वं दर्शयति।

सदा ज्ञातविषयत्वं तु पुरुषस्यापरिणामित्वं परिदीपयति। कस्मात् ? न हि बुद्धिश्च नाम पुरुषविषयश्च स्याद् गृहीताऽगृहीता चेति सिद्धं पुरुषस्य सदा ज्ञातविषयत्वं ततश्चापरिणामित्वमिति। किं च परार्था बुद्धिः संहत्यकारित्वात्, स्वार्थः पुरुष इति। तथा सर्वार्थाध्यवसायकत्वात्रिगुणा बुद्धिस्त्रिगुणत्वादचेतनेति। गुणानां तूपद्रष्टा पुरुष इति। अतो न सरूपः।

अस्तु तर्हि विरूप इति। नात्यन्तं विरूपः। कस्मात् ? शुद्धोऽप्यसौ प्रत्ययानुपश्यः यतः प्रत्ययं बौद्धमनुपश्यति। तमनुपश्यन्नतदात्मापि तदात्मक इव प्रत्यवभासते। तथा चोक्तम्-अपरिणामिनी हि भोक्तृशक्तिरप्रतिसंक्रमा च परिणामिन्यर्थे प्रतिसंक्रान्तेव तद्वृत्तिमनुपतति, तस्याश्च प्राप्तचैतन्योपग्रहरूपाया बुद्धिवृत्तेरनुकारमात्रतया बुद्धिवृत्त्यविशिष्टा हि ज्ञानवृत्तिरित्याख्यायते॥२०॥

व्या० भा० अ० - 'दृशिमात्र' का अर्थ विशेषणों से रहित ज्ञान स्वरूप ही है। वह पुरुष बुद्धि वृत्ति को जानने वाला है। वह न बुद्धि के समानरूप वाला है न ही अत्यन्त विरुद्धरूप वाला है। समानरूप वाला नहीं है। क्यों ? विषयों के जानने न जानने वाली होने से बुद्धि परिणाम वाली है। और उसके गौ आदि वा घट आदि विषय ज्ञात-अज्ञात होते हैं, (ये बुद्धि के) परिणाम को दिखाते हैं।

सदा ज्ञात विषय वाला होना तो पुरुष के अपरिणामित्व को प्रकट करता है। क्यों ? बुद्धि जो पुरुष का विषय है वह कभी ज्ञात-अज्ञात नहीं होती। उस से पुरुष सदा ज्ञात विषय वाला है यह और पुरुष का परिणामरहित होना सिद्ध है। और क्या ( हेतु है कहते हैं) बुद्धि (तीन गुणों का) संघात रूप होकर कार्य करने के कारण परार्थ (पुरुषार्थ) है जबकि पुरुष स्वार्थ है। उसी प्रकार सब विषयों का ज्ञान कराने वाली होने से बुद्धि त्रिगुण वाली है, तीन गुणों से युक्त होने के कारण अचेतन है। पुरुष गुणों को निकटता से जानने वाला है अतः बुद्धि के समानरूप वाला नहीं है।

तो फिर (पुरुष को बुद्धि से) विरुद्ध स्वरूप वाला मान लिया जाय ? पूर्ण रूप से विरुद्ध स्वरूप वाला नहीं है। क्यों ? शुद्ध होने पर भी वह बुद्धिवृत्ति के अनुसार जानता है। क्योंकि वह बुद्धिवृत्ति के अनुसार देखता है। उसको देखता हुआ बुद्धिवृत्ति स्वरूप न होने पर भी उस स्वरूप वाला प्रतीत होता है। और वैसा ही कहा है - भोक्ता परिणाम धर्म से रहित है और बुद्धि एवं बुद्धि से सम्बद्ध विषयों में घुलता मिलता नहीं है, परिणामिनी बुद्धि में घुले मिले के समान उस (बुद्धिवृत्ति) का अनुकरण करता है। चेतन के सम्बन्ध से चेतनता को प्राप्त करने वाली उस बुद्धिवृत्ति का अनुकरण करने के कारण ज्ञानवृत्ति बुद्धिवृत्ति के समान ही कही जाती है॥२०॥

Yog Prakash

इस सूत्र में जीवात्मा का स्वरूप बतलाया है। जीवात्मा द्रष्टा है अर्थात् जानने वाला है और वह बुद्धि की वृत्तियों के अनुसार देखता है। आत्मा को दृशिमात्र कहा है। इसका अभिप्राय यह है कि जीवात्मा चेतन पदार्थ है, जड़ नहीं। आत्मा में ज्ञानगुण स्वाभाविक है। और बल, इच्छादि भी उसके स्वाभाविक गुण हैं। मन, इन्द्रियों के द्वारा पदार्थों के जो आकार-प्रकार बुद्धि में उतरते हैं, उसी के अनुसार जीवात्मा देखता है। आत्मा बुद्धि के साथ कुछ समानता रखता है और कुछ असमानता। बुद्धि के समक्ष जो पदार्थ उपस्थित होते हैं, उनका वह चित्र उतारती है और जो पदार्थ उसके समक्ष नहीं होते, उनका चित्र नहीं उतारती। जिनका चित्र उतरता है वे ज्ञात हैं और जिनका चित्र नहीं उतरता वे अज्ञात हैं अर्थात् चित्र वाले पदार्थों को आत्मा जानता है अन्यों को नहीं। यह पदार्थों का ज्ञात और अज्ञात रहना बुद्धि के परिणामित्व को सिद्ध करता है। बुद्धि में पदार्थों का जो भी आकार प्रकार उतरता है, उसको जीवात्मा सदा जानता है। कभी भी ऐसा नहीं होता कि बुद्धि में कोई चित्र उतरे और उसको जीवात्मा न जाने। इसी कारण से जीवात्मा अपरिणामी है। इसका अभिप्राय यह है कि बुद्धि परिवर्तनशील है, आत्मा नहीं। बुद्धि सत्त्वादि तीन गुणों का संघातरूप होकर कार्यों को सिद्ध करती है। इसलिये वह परार्थ है। अर्थात् आत्मा के लिये है। जैसे भवन आदि पदार्थ संघातरूप में होकर जीव के प्रयोजन की सिद्धि करते हैं, बुद्धि भी वैसे ही करती है। इसलिये परार्थ-दूसरे के लिये कही जाती है। आत्मा दूसरे के लिये नहीं। अतः वह स्वार्थ कहा जाता है।।

बुद्धि सत्त्वादि तीन गुणों से बनी है। इसलिये वह जड़ है। जीवात्मा तीन गुणों का भोक्ता है अतः वह चेतन है। यही बुद्धि और आत्मा की असमानरूपता कही जाती है। बुद्धि और आत्मा की समानरूपता यह है कि बुद्धि में जो विविध पदार्थों के आकार-प्रकार उतरते हैं उनको उसी रूप में देखता हुआ आत्मा अज्ञानता के कारण उनको और स्वयं को एक समझता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि प्राकृतिक पदार्थों के गुण हैं। परन्तु अज्ञानता के कारण जीवात्मा इनको अपने से भिन्न नहीं समझता। बुद्धि और जीवात्मा का निकटतम सम्बन्ध है।

अज्ञानता के कारण कभी-कभी जीवात्मा बुद्धि जैसा जड़ पदार्थ दिखता है और कभी जीव के सम्बन्ध से बुद्धि चेतनवत् दिखाई देती है। वास्तव में ये दोनों भिन्न-भिन्न हैं। बुद्धि जड़ पदार्थ है और जीवात्मा चेतन पदार्थ। जब आत्मा बुद्धिवृत्तियों को स्वयं से पृथक् नहीं जानता तब अस्मिता क्लेश की उत्पत्ति होती है। जब व्यक्ति अपने स्वरूप को ठीक प्रकार से जान जाता है तो यह भ्रान्ति दूर हो जाती है कि मैं और बुद्धि एक हैं। आत्मा के स्वरूप को ठीक प्रकार से जानने से व्यक्ति बुद्धि, मन, इन्द्रियों के आधीन नहीं होता। इनको अपने वश में करके मोक्ष की सिद्धि करता है। अपने स्वरूप को समझने पर ईश्वर का स्वरूप भी शीघ्र ज्ञात हो जाता है। जो व्यक्ति अपने स्वरूप को नहीं जानता, वह ईश्वर के स्वरूप को भी नहीं जान सकता।

संसार में अनेक लोग यह मानते हैं कि जीवात्मा ईश्वर का ही एक अंश है। कुछ लोग कहते हैं कि यह आत्मा प्रकृति के अंशों से बना है, इत्यादि अनेक मान्यतायें हैं। यदि जीवात्मा के स्वरूप को ठीक प्रकार से जान लिया जाय तो ये सब भ्रान्तियाँ दूर हो जाती हैं। प्रायः व्यक्ति यह समझते हैं कि मन विषयों में स्वयं चला जाता है। इस भ्रान्ति का कारण यही है कि वे जीवात्मा के स्वरूप को नहीं जानते। यदि व्यक्ति शान्त वातावरण में राग, द्वेष से रहित होकर निरीक्षण, परीक्षण करे तो यह परिज्ञान हो जायेगा कि मन आदि सभी उपकरणों को मैं चलाता हूँ। उपनिषत्कार ने इस विषय में कहा है कि -

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥

इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥॥ कठोपनिषद्।। ३/३-४॥ 

अर्थ - (आत्मानं रथिनं विद्धि) आत्मा को रथ का स्वामी जानो ( शरीरं तु रथम् एव) शरीर को तो रथ ही जानो (बुद्धि तु सारथिं विद्धि) बुद्धि को सारथि जानो (च मनः प्रग्रहम् एव) और मन को लगाम ही जानो (इन्द्रियाणि हयान् आहुः) इन्द्रियों को घोड़े कहते हैं ( तेषु विषयान् गोचरान्) विषयों को उनमें गोचर = भूमि = मार्ग कहते हैं। ( मनीषिणः) मनीषी = विद्वान् (इन्द्रियमनोयुक्तम् आत्मा) इन्द्रियों एवं मन से युक्त आत्मा को (भोक्ता इति आहुः) भोक्ता है, यह कहते हैं॥२०॥

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