इस सूत्र में आगामी दुःख को छोड़ने योग्य माना है। जो दुःख भूतकाल में भोग लिया है वह छोड़ने योग्य नहीं है क्योंकि वह अब भोक्ता के समीप नहीं है। और जो दुःख वर्त्तमान क्षण में भोगा जा रहा है, वह आगामी क्षण में समाप्त हो जायेगा, उसका भी त्याग नहीं हो सकता, इसलिये जो भविष्यत् काल में आने वाला दुःख है, वही छोड़ने योग्य है। बाधा, पीड़ा, अशान्ति, बन्धन, पराधीनता का नाम दुःख है। अथवा जिससे पीड़ित होकर प्राणी उसका नाश करने का प्रयत्न करते हैं, वह दु:ख है। इसलिये दुःख एक वस्तु है, अभाव का नाम दुःख नहीं है। यदि अभाव का नाम दुःख होता तो उसके त्याग का विधान करना व्यर्थ हो जाता। इसलिये दुःख एक गुण है और वह प्राकृतिक पदार्थों में रहता है। जब प्राकृतिक पदार्थों से जीवात्मा का सम्बन्ध होता है तब दुःख की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति अनागत दुःख को और दुःख के कारण को जान जाता है, वही दुःख से छूट सकता है।
दुःख के अनेक कारण हैं- अविद्या, अन्याय, अशुभ उपासना, कुसंस्कार, कुसंग, आलस्यादि। जो व्यक्ति यह जानता है कि अविद्या दुःख का कारण है। वह अपनी अविद्या का नाश करने का पूर्ण प्रयास करता है। क्योंकि कारण के होने से कार्य की उत्पत्ति होती है अन्यथा नहीं। इसी प्रकार प्रत्येक दुःख के कारण को अच्छे प्रकार जानकर उसको दूर करने का प्रयास करना चाहिये। बुद्धिमान व्यक्ति यह विचार करता है कि मनुष्य और पशु, पक्षी आदि के शरीर में अन्तर क्या है ? परीक्षा करने से परिज्ञात होता है कि मनुष्य शरीर में जो सुख सुविधायें हैं वे पशु, पक्षी आदि के शरीर में नहीं हैं। इसलिये मनुष्य शरीर सुखप्रद और पशु आदि का शरीर दुःखप्रद है।
मनुष्य शरीर की प्राप्ति किस कारण से होती है, इस विषय में विचार करने से यह ज्ञात होता है कि धर्माचरण से होती है। मनुष्य को ऐसा विचारना चाहिए "यदि मैं धर्माचरण करूँगा तो मनुष्य योनि मिलेगी और अधर्माचरण करूँगा तो पशु पक्षी आदि की योनि मिलेगी। यदि मुझे पशु आदि योनि मिलेगी तो बहुत दुःख भोगना पड़ेगा " ऐसा विचारकर अधर्माचरण को छोड़ देने से दुःख का निवारण हो सकता है। मनुष्य शरीर मिलने पर क्या सुख ही मिलता है अथवा दुःख भी ? इसका परीक्षण करने से ज्ञात होता है कि मनुष्य शरीर मिलने पर जो सुख मिलता है वह क्षणिक और दुःख मिश्रित होता है। इसलिये मनुष्य शरीर मिलने पर भी अनागत दुःख से मुक्ति नहीं हो सकती। इसलिये अनागत दुःख से नितान्त छूटने का उपाय जानना चाहिये।
अनागत दुःख को दूर करने वाला व्यक्ति अत्यन्त सावधान रहता है। वह चार बातों को जानने का प्रयास करता है कि दुःख क्या है ? दुःख का कारण क्या है ? सुख क्या है ? और सुख का कारण क्या है ? इन चार विषयों के परिज्ञान से और उसके लिये आवश्यक कर्त्तव्य से अनागत दुःख दूर किया जा सकता है। प्रत्येक प्राणी जो भी मन, वाणी और शरीर से क्रिया करता है उस क्रिया के करने से पूर्व परीक्षा करनी चाहिये कि इस क्रिया का परिणाम क्या होगा ? यदि सुख परिणाम दिखाई देता है तो उसको करना चाहिये और दुःख परिणाम सिद्ध होता है तो तत्काल छोड़ देना चाहिये। प्रायः व्यक्ति क्रिया के परिणामों को बिना जाने क्रिया करता है और उसके दुःखद परिणाम होने पर पश्चाताप करता है। इसका कारण - हेयं दुःखमनागतम् को न जानना ही है।
दैनिक जीवन में ऐसी मानसिक क्रियायें बहुत होती हैं जिनका फल दुःख होता है। यदि मनुष्य उन मानसिक क्रियाओं से होने वाले अनागत दुःखों को जान लेता है तो उनको बन्द कर देता है। आलस्य और प्रमाद अनागत दुःख को दूर करने में बाधक होते हैं। यदि व्यक्ति आलस्य और प्रमाद को दूर कर देता है तो भविष्य में होने वाली अनेक हानियों से बच जाता है। आलसी व्यक्ति न शारीरिक परिश्रम करता है, न विद्या पढ़ता है, न सत्पुरुषों का संग करता है। इसलिये भविष्यकाल में उसको विविध दुःख भोगने पड़ते हैं।
वेद में अनागत दुःख को दूर करने के लिये मनुष्य को चेतावनी दी है कि -
अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता।
गोभाजइत् किलासथ यत्सनवथ पूरुषम्॥ यजु० १२/७९, ३५/४॥
भावार्थ - हे मनुष्यों ! (अश्वत्थे) कल तक रहेगा वा नहीं रहेगा विश्वास नहीं है ऐसे शरीर में (वः) तुम्हारा (निषदनम् ) निवास है। (ईश्वर ने ) (व:) तुम्हारा ( वसतिः) निवास (पर्णे) चलायमान संसार में किया है। इसलिये (यत्) जिस ( पूरुषम् किल ) परमात्मा को ही (सनवथ) सेवन करो इसके साथ (गोभाजः) पृथिवी का सेवन करने वाले ( इत्) ही तुम लोग धर्म में स्थिर (असथ) होओ॥१६॥