Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 2/10

2/10
Sutra
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ।। २.१० ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

ते प्रतिप्रसवहेयाः : सूक्ष्माः॥१०॥

शब्दार्थ - (ते) वे अविद्यादि क्लेश (प्रतिप्रसव-हेयाः) अपने उत्पत्ति के कारणभूत चित्त के प्रकृति में लीन हो जाने पर समाप्त होने योग्य ( सूक्ष्माः) क्रियायोग और विवेकख्याति के द्वारा निर्बलता को प्राप्त होते-होते भुने बीज के समान हुए हुए।

सूत्रार्थ - वे अविद्यादि क्लेश क्रिया योग और विवेक ख्याति के द्वारा निर्बलता को प्राप्त होते होते भुने बीज के समान हुए हुए अपने उत्पत्ति के कारण चित्त के प्रकृति में लीन हो जाने पर समाप्त करने योग्य हैं।

Vyas Bhashya

ते पञ्च क्लेशा दग्धबीजकल्पा योगिनश्चरिताधिकारे चेतसि प्रलीने सह तेनैवास्तं गच्छन्ति॥१०॥

व्या० भा० अ० - योगी के कृतकार्य चित्त के ( प्रकृति में ) लीन होने पर उसी के साथ ये पाँच क्लेश विलीन हो जाते हैं॥१०॥

Yog Prakash

इस सूत्र  में सूक्ष्म किये क्लेशों को चित्त की लीनता के साथ लय करने योग्य बतलाया है।

पाँच क्लेशों से छूटकर जीवात्मा के मोक्ष तक पहुँचने के कतिपय साधन

प्रथम - साधक ईश्वर, जीव और प्रकृति - विकृति, इनके वास्तविक स्वरूप को जाने। 

दूसरा - निष्काम कर्म को व्यवहार में लावे।

तीसरा- अष्टाङ्ग योग का अनुष्ठान करे।

चौथा - योगाभ्यासी वेदवेत्ता सत्पुरुषों का सङ्ग करे।

इन साधनों के अनुष्ठान के पश्चात् सम्प्रज्ञात समाधि का अभ्यास करते-करते धर्ममेघ समाधि अर्थात् सम्प्रज्ञात समाधि की परिपक्व अवस्था की सिद्धि होती है। सम्प्रज्ञात समाधि से परवैराग्य उत्पन्न होता है। उससे असम्प्रज्ञात समाधि होती है। उसकी परिपक्व अवस्था होने पर चित्त पुरुष के लिये भोग और अपवर्ग को सिद्ध करके अधिकाररहित हो जाता है। अधिकाररहित होने पर अपने उपादान कारण प्रकृति में लीन हो जाता है अर्थात् प्रलय को प्राप्त हो जाता है। उस चित्त के साथ ही ये पाँच क्लेश भी प्रकृति में लीन हो जाते हैं। इस अवस्था में जीवात्मा समस्त क्लेशों से छूटकर ईश्वर के नित्य आनन्द को प्राप्त करता है। यह है मनुष्य जीवन की कृतकृत्यता। जो मनुष्य इस अवस्था को प्राप्त नहीं करता, उसका जीवन विफल हो जाता है। इस विषय में उपनिषद् में कहा गया है -

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः॥ केनोपनिषद् २/५॥ 

भावार्थ - यदि तूने ईश्वर को यहाँ इस जन्म में जान लिया तो ठीक है अर्थात् तू सफल है यदि इस जन्म में नहीं जाना तो तेरा महाविनाश है।

सूत्र में 'प्रतिप्रसव' शब्द पढ़ा है, इसको ऐसा समझना चाहिये। पाँच क्लेशों का उत्पादक कारण प्रकृति है, उसी से क्लेशों का प्रसव अर्थात् उत्पत्ति होती है। जब चित्त के द्वारा भोग और अपवर्ग सिद्ध हो जाते हैं तो उसकी आवश्यकता नहीं रहती। अतः उसका प्रतिप्रसव हो जाता है अर्थात् वह अपने उपादान कारण में लीन हो जाता है॥१०॥

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