इस सूत्र में ‘विपर्यय वृत्ति का स्वरूप' बतलाया गया है। योगसिद्धि के लिए विपर्यय वृत्ति का जानना और उसका अवरोध करना अनिवार्य है।
योगी बनने के लिए शुद्ध ज्ञान, शुद्ध कर्म और शुद्ध उपासना का होना आवश्यक है। ज्ञान के प्रमुख विषय - तीन हैं एक ईश्वर, दूसरा जीव और तीसरा प्रकृति। जो व्यक्ति इन तीनों के स्वरूप को अच्छे प्रकार से नहीं जानता वह योगी कभी नहीं बन सकता। ईश्वर एवं जीव के परस्पर माता-पुत्र, पिता-पुत्र, आचार्य-शिष्य, उपास्य-उपासक, राजा-प्रजा और व्याप्य-व्यापक आदि अनेक सम्बन्ध हैं। व्यक्ति इन सम्बन्धों को यथावत् जाने और ईश्वर के साथ उचित व्यवहार करे इससे उसको ज्ञान, बल, आनन्द आदि की विशेष सहायता मिलती है। उस सहायता से ईश्वर साक्षात्कार होता है।
योग का मुख्य प्रयोजन ईश्वर - साक्षात्कार है। उसी से मानव समस्त दुःखों से मुक्त होता है और नित्यानन्द की प्राप्ति करता है। विपर्यय के कारण वह ईश्वर, जीव एवं प्रकृति के स्वरूप को यथावत् नहीं जानता अथवा मिथ्या जानता है, शरीर, इन्द्रिय, मन, भूमि, धन, पुत्र, पौत्रों को अपना स्वरूप मान लेता है। ऐसी स्थिति में वह शरीर, इन्द्रिय और मन को वश में नहीं कर सकता। यदि उसको ईश्वर, जीव एवं प्रकृति-विकृति अर्थात् शरीर, इन्द्रिय, मन आदि के विषय में वास्तविक ज्ञान होता है कि प्रकृति एवं
प्रकृति से बने शरीर आदि सब पदार्थ जड़ हैं, और मैं चेतन हूँ, इनका सञ्चालक हूँ, तो वह इनको अपने वश में करके योग मार्ग पर चलता है, इनके आधीन नहीं होता।
विपर्यय का दूसरा नाम 'अविद्या' है। अविद्या के चार क्षेत्र समझने चाहिए (१) अनित्य पदार्थों को नित्य, नित्य पदार्थों को अनित्य, (२) अशुद्ध को शुद्ध, शुद्ध को अशुद्ध, (३) दु:ख को सुख, सुख को दुःख और (४) अनात्मा को आत्मा, आत्मा को अनात्मा समझना, अविद्या है। प्रत्येक साधक को अविद्या के स्वरूप को जानकर उसका निवारण करना चाहिए।अविद्या के उत्पादक कारणों को और उनको दूर करने के उपायों को जानना आवश्यक है। क्योंकि कारण को हटाये बिना कार्य को नहीं हटाया जा सकता। अविद्यायुक्त ग्रन्थों के पठन-पाठन से, असत्पुरुषों के सङ्ग से, कुसंस्कारों से, मादक पदार्थों के खानपान से, अन्यायाचरण से, विशुद्ध ईश्वर को न जानने से, उसकी आज्ञा का पालन न करने से, तमोगुण आदि कारणों से अविद्या उत्पन्न होती है। इन कारणों के विपरीत कारणों से अविद्या का नाश होता है। विद्यायुक्त ग्रन्थों के पठनपाठन से, सत्पुरुषों के सङ्ग से, सुसंस्कारों से, सात्त्विक पदार्थों के खानपान से, न्यायाचरण से, योग के अङ्गों के पालन से, विशुद्ध ईश्वर के जानने, मानने और उसकी आज्ञा का पालन करने से वास्तविक ज्ञान उत्पन्न होता है, और उससे विपर्यय वृत्ति का नाश होता है॥८॥