Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 1/51

1/51
Sutra
 तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः ॥ १.५१ ॥

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Inception

अव० - किञ्चास्य भवति -

अर्थ - इस प्रज्ञा से उत्पन्न संस्कारसमुदाय का क्या होता है ?

Word Meaning

तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः॥५१॥

शब्दार्थ – (तस्य) उस ऋतम्भरा प्रज्ञा जनित संस्कार के (अपि) भी (निरोधे) रोक दिये जाने पर (सर्व-निरोधात् ) सब चित्तवृत्तियों का निरोध हो जाने से (निर्बीजः) निर्बीज (समाधिः) समाधि होती है।

सूत्रार्थ - उस ऋतम्भरा प्रज्ञा जनित संस्कार के रोक दिये जाने पर सब चित्तवृत्तियों के रुक जाने से 'निर्बीज समाधि' होती है।

Vyas Bhashya

स न केवलं समाधिप्रज्ञाविरोधी, प्रज्ञाकृतानां संस्काराणामपि प्रतिबन्धी भवति। कस्मात् ? निरोधजः संस्कारः समाधिजान्संस्कारान्बाधत इति। निरोधस्थितिकालक्रमानुभवेन निरोधचित्तकृतसंस्कारास्तित्वमनुमेयम्। व्युत्थाननिरोधसमाधिप्रभवैः सह कैवल्यभागीयैः संस्कारैश्चित्तं स्वस्यां प्रकृताववस्थितायां प्रविलीयते, तस्मात्ते संस्काराश्चित्तस्याधिकारविरोधिनो न स्थितिहेतवो, यस्मादवसिताधिकारं सह कैवल्यभागीयैः संस्कारैश्चित्तं विनिवर्तते, तस्मिन्निवृत्ते पुरुषः स्वरूपमात्रप्रतिष्ठोऽतः शुद्धः केवलो मुक्त इत्युच्यत इति॥५१॥

व्या० भा० अ० - वह 'निर्बीज समाधि' न केवल 'समाधि प्रज्ञा' की विरोधिनी है अपितु समाधि प्रज्ञाजन्य संस्कारों को भी बाधित करती है। क्यों ? निरोधजन्य संस्कार समाधिजन्य संस्कारों को बाधित करता है। निरोध स्थिति के कालक्रम के अनुभव के द्वारा निरोध चित्त जनित संस्कारों का अस्तित्व अनुमान से जानने योग्य है। व्युत्थान संस्कार (क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र स्थिति में उत्पन्न संस्कार) निरोध समाधि से उत्पन्न संस्कार जो कैवल्य के साधन हैं, उनके साथ चित्त अवस्थित अपनी प्रकृति में प्रविलीन (प्रलय को प्राप्त) हो जाता है। इसलिए वे संस्कार जन्मादि देने वाले चित्त के विरोधी हैं, (चित्त की) स्थिति के हेतु नहीं। क्योंकि समाप्त-अधिकार चित्त कैवल्य भागीय संस्कारों के साथ निवृत्त होता है। उसके निवृत्त होने पर पुरुष स्वरूपमात्र में प्रतिष्ठित शुद्ध केवल मुक्त कहा जाता है॥५१॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया है कि निर्बीज समाधि कब होती है। यहाँ पर निर्बीज समाधि का क्रम बतलाकर जीवात्मा की मोक्ष अवस्था का वर्णन किया है।  निर्बीज (निरालंबन) समाधि, सम्प्रज्ञात समाधि से उत्पन्न प्रज्ञा को और उससे उत्पन्न संस्कारों को रोक देती है। निरोध स्थिति काल के अनुभव के द्वारा निरोध चित्त कृत संस्कारों का अस्तित्व अनुमान से जानने योग्य है। सांसारिक अवस्था में वृत्तियों से जो संस्कार उत्पन्न होते हैं, उनको 'व्युत्थान संस्कार' कहते हैं। निरोध अवस्था अर्थात् निर्बीज समाधि की अपेक्षा से सम्प्रज्ञात समाधि के संस्कारों को भी 'व्युत्थान संस्कार' कहते हैं। निरोधज संस्कार चित्त के कार्य के विरोधी होते हैं अर्थात् भोग और अपवर्ग को सिद्ध करना चित्त का कार्य है। वे संस्कार इसका विरोध करने वाले होते हैं।समाप्ताधिकार चित्त कैवल्य प्रदान करने वाले निरोध संस्कारों सहित निवृत्त हो जाता है अर्थात् समाप्त हो जाता है। उस अवस्था में जीवात्मा अपने और ईश्वर के स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है। उस समय उसको शुद्ध, केवल, मुक्त कहा जाता है। यह देहावसान के पश्चात् जीवात्मा की मोक्षावस्था का वर्णन है। शरीर के रहते हुए जो आत्मा मोक्ष का अधिकारी बन जाता है उसको जीवनमुक्त कहते हैं। शरीरावसान के पश्चात् वह ईश्वर की व्यवस्थानुसार (सम्पूर्ण अवधि पर्यन्त) मोक्ष में रहता है, उसको विदेहमुक्त कहते हैं। इससे यह नहीं समझना चाहिए कि निर्बीज समाधि को प्राप्त करके प्रकृति-विकृति एवं अपने स्वरूप को यथावत् जानने एवं चित्त के व्युत्थान एवं असम्प्रज्ञात समाधिजन्य संस्कारों सहित प्रकृति में लीन होने पर जीवात्मा मुक्त हो जाता है। वेद के अनुसार जीवात्मा ईश्वर को यथावत् जानकर ही मुक्त हो सकता है, बिना जाने नहीं।

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।

तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥यजु० ३१।१८॥

भावार्थ - एतं = इस, महान्तम् = महान्, आदित्यवर्णम् = आदित्य स्वरूप; तमसः परस्तात् = अज्ञानान्धकार से पृथक् वर्त्तमान, पुरुषम् = सर्वत्र व्याप्त परमात्मा को; अहं वेद = मैं जानता हूँ वा जानूँ; तम् एव उसको ही, विदित्वा जानकर, मृत्युम् अति एति = मरणादि अगाधदुःख सागर से पृथक् होता है, अयनाय = मुक्ति के लिए, अन्यः पन्थाः = दूसरा मार्ग, न विद्यते नहीं है।

अकामो धीरो अमृतः स्वयम्भू रसेन तृप्तो न कुतश्चनोनः। 

तमेव विद्वान्न बिभाय मृत्योरात्मानं धीरमजरं युवानम्॥अथर्व ० १० ८ ४४॥

भावार्थ - स्वयम्भूः स्वयं सत्ता वाला (स्वतः सिद्ध) परमेश्वर; अकामः = सांसारिक पदार्थों = की कामना से रहित; धीरः = ज्ञान स्वरूप; अमृतः = अविनाशी; रसेन तृप्तः = आनन्द रस से तृप्त; कुतश्चन = किसी प्रकार, कहीं से, न ऊनः = न्यून नहीं; तम् = उस; धीरम् अजरम् युवानम् आत्मानम् = ज्ञानी जराहीन युवा आत्मा को; एव ही; विद्वान् = जानने वाला; मृत्योः =  मृत्यु आदि दुःखों से; न बिभाय = नहीं डरता। इसलिए मुक्ति को प्राप्त करने के लिए ईश्वर को जानना अनिवार्य है।

मुक्ति के विषय में एक प्रश्न उठता है कि विदेह मुक्त आत्मा संसार में पुनर्जन्म लेता है वा नहीं ? इसका समाधान यह है कि मोक्ष सुख भोगने की एक अवधि है, उस अवधि पर्यन्त सुख भोग कर जीवात्मा अपने तुल्य पाप-पुण्य के आधार पर संसार में मनुष्य जन्म लेता है। मोक्ष सुख को एक सीमा पर्यन्त भोगना इसलिये उचित माना जाता है कि जिन शुद्ध ज्ञान, शुद्ध कर्म, शुद्ध उपासना से मुक्ति मिलती है वे सीमित हैं, उनका फल भी सीमित होना चाहिए। छत्तीस सहस्र बार सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय का जो समय होता है, उतने समय तक जीवात्मा मुक्ति में रहता है ऐसा ऋषियों ने माना है। उसको इकत्तीस नील, दस खरब और चालीस अरब ( ३१,१०,४०,००,००,००,०००) वर्ष कहा जाता है। आदि शंकराचार्य जी ने भी मुक्ति से पुनरावृत्ति को स्वीकारते हुए निम्न बातें अपने भाष्य में लिखी हैं

(१) यावद् ब्रह्मलोकस्थितिः तावत्तत्रैव तिष्ठति, प्राक्ततो नावर्त्तत इत्यर्थः। शंकराचार्यभाष्य छान्दोग्य उपनिषद् ८ / १५/१॥

भावार्थ - जब तक ब्रह्मलोक में स्थिति है तब तक जीव वहीं रहता है अर्थात् अवधि की समाप्ति से पूर्व नहीं लौटता।

(२) यदि हि नावर्त्तन्त एवमिह ग्रहणमनर्थकमेव स्यात्। तस्मादस्मात्कल्पादूर्ध्वमावृत्तिर्गम्यते। -॥शंकराचार्यभाष्य बृहदारण्यक उपनिषद् ६/२/१५॥

भावार्थ - यदि मुक्तात्मा का कभी न लौटना अभिप्रेत हो तो 'इह' पद का प्रयोग व्यर्थ हो जाये इसलिए इस कल्प के अनन्तर पुनरावृत्ति जानी जाती है।

शंका = महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के अतिरिक्त अन्य किसी ऋषि ने जीव का मुक्ति से लौटना स्वीकार किया हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता।

समाधान = महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने ब्रह्मा से लेकर जैमिनि तक सभी ऋषियों की मान्यताओं को स्वीकार किया है। कोई अपनी नई मान्यता स्थापित नहीं की। इससे सिद्ध होता है कि अन्य ऋषियों और महर्षि दयानन्द सरस्वती जी की मान्यताएँ एक ही हैं, भिन्नभिन्न नहीं। जब महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने मुक्ति से लौटना स्वीकार किया है, तो सिद्ध हुआ कि अन्य सब ऋषि भी जीव का मुक्ति से लौटना मानते हैं।

इस विषय में अन्य ऋषियों के प्रमाण भी उपलब्ध हैं। जैसे कि महर्षि व्यास जी ने वेदान्त सूत्र ३/३/३२ में कहा है - " यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम्" अर्थात् "जब तक मोक्ष के अधिकारी जीवात्माओं का मुक्ति में रहने का अधिकार (समय) होता है, तब तक वे मोक्ष में रहते हैं।" महर्षि कपिल जी ने सांख्य दर्शन के सूत्र १ / १५९ में मुक्ति से जीवों का लौटना माना है। "इदानीमिव सर्वत्र नात्यन्तोच्छेदः " अर्थात् " जैसे इस समय सृष्टि चल रही है, वैसे ही सदा सृष्टि चलती रहती है, कभी भी सृष्टि सदा के लिये समाप्त नहीं होती।" यदि मुक्ति से जीव लौटता ही नहीं, तो जब सारे जीव एक-एक करके मुक्त हो

जाएँगे, तब सृष्टि बनेगी ही नहीं। जो कि कपिल मुनि जी नहीं मानते। इसका अर्थ यह हुआ कि जीव मुक्ति से लौटते हैं, तभी तो सदा सृष्टि चलती है।

जीवात्मा की मुक्ति से पुनरावृत्ति न मानने में दोष -

(१) मुक्ति ज्ञान, कर्म, उपासना का फल है। ये सीमित होते हैं। इनका फल मोक्ष सीमित होना चाहिए, असीमित नहीं।

(२) यदि इनका फल ईश्वर असीमित देता है तो ईश्वर का न्याय भङ्ग होता है। (३) यदि बिना निमित्त ईश्वर फल देता है तो अन्यायकारी जीवों को भी मुक्ति में भेजना चाहिए, पश्वादि योनियों में नहीं।

(४) यदि जीव अनन्त काल तक मुक्ति में ही रहें तो संसार नहीं रहेगा, क्योंकि जीवों की संख्या निश्चित है। एक एक करके सब जीव मुक्त हो जायेंगे और संसार बनना बन्द हो जायेगा।

(५) यदि सीमित कर्मों से मुक्ति अनन्त काल के लिये मानी जाये, तो सीमित कर्मों से बन्धन भी अनन्त काल के लिये मानना होगा। जो कि अनुचित है। इसलिए मुक्ति से पुनरावृत्ति मानना ही ठीक है॥५१॥ इति प्रथमः समाधिपादः॥१॥

Footnote

॥ इति प्रथमः समाधिपादः॥१॥

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