इस सूत्र को रोक देता है। में यह कहा है कि ऋतम्भरा प्रज्ञा से उत्पन्न संस्कार अन्य संस्कारों समाधि के समय योगी को जो अनुभव होता है उससे संस्कार उत्पन्न होते हैं। वे संस्कार व्युत्थान संस्कारों से बलवान् होने के कारण उनको रोक देते हैं। समाधि अवस्था में व्युत्थानसंस्कारों के रुक जाने से, उनसे उत्पन्न होने वाली वृत्तियाँ रुक जाती हैं। उन वृत्तियों के रुक जाने से समाधि की सिद्धि होती है। समाधि से समाधिजा प्रज्ञा उत्पन्न होती है। उसके अनुभवों से नया-नया संस्कार समुदाय उत्पन्न होता है।
यहाँ पर शंका उत्पन्न होती है कि वह समाधिकाल में उत्पन्न हुआ संस्कारों का समुदाय चित्त को भोग के सामर्थ्य से युक्त क्यों नहीं करता ? अर्थात् उस समय चित्त में भोग को उत्पन्न करने वाली प्रवृत्तियों को उत्पन्न क्यों नहीं करता ? इसका समाधान यह है कि वे प्रज्ञाकृत संस्कार क्लेशों का नाश करने वाले होने से चित्त को भोग प्रवृत्ति वाला नहीं बनाते, किन्तु इस कार्य से रोकते हैं। यहाँ पर यह कहा गया है कि ऋतम्भरा बुद्धि से उत्पन्न हुआ संस्कार सांसारिक संस्कारों को बाधित करता है।
इस विषय में यह संशय उत्पन्न होता है कि क्या इन सांसारिक संस्कारों को रोकने में संस्कार ही कारण हैं अथवा अन्य भी कोई कारण है ? इसका उत्तर यह है कि संस्कार को उठाने वाला, उसको बलवान् बनाने वाला जीवात्मा है। जीवात्मा जिस संस्कार को उठाना चाहता है, वह संस्कार उभर जाता है। जिस संस्कार को सहयोग देता है, वह बलवान् बन जाता है। इसी प्रकार जिस संस्कार को जीवात्मा रोकना चाहता है, वह रुक जाता है और जिसको हटाना चाहता है वह हट जाता है। कोई भी संस्कार स्वयं किसी भी शुभ-अशुभ कार्य में आत्मा को प्रवृत्त नहीं कर सकता। इसलिये साधक को सदा यह समझना चाहिये कि किसी भी संस्कार को उठाना वा बाधित करना मेरे आधीन है। शुभ संस्कारों को उत्पन्न करना अशुभ संस्कारों को समाप्त करना आत्मा के आधीन है, मन के नहीं। कभी-कभी व्यक्ति यह मानता है कि मेरे संस्कार अच्छे नहीं हैं इसलिये मैं उत्तम कार्यों को नहीं कर सकता। ऐसा मानना उचित नहीं है। क्योंकि ऐसा समझने पर व्यक्ति अशुभ संस्कारों के आधीन होकर अशुभ कर्म करता रहता है और शुभ संस्कारों को उत्पन्न करने का प्रयास करना छोड़ देता है। इसमें यह भी दोष है कि साधक निराशावादी बन जाता है।
कुछ लोग यह मानते हैं कि मन, इन्द्रियाँ और शरीर कर्मों को करते और सुख-दुःख भोगते हैं, जीवात्मा न कर्म करता है और न सुखदुःख भोगता है। ऐसा मानना उचित नहीं है। क्योंकि ये मन आदि सब पदार्थ जड़ हैं। ये न स्वयं कर्म कर सकते हैं और न सुखदुःख भोग सकते हैं। इसलिये संस्कारों को उभारने वाला, मन-इन्द्रियों और शरीर से शुभ-अशुभ कार्य करने वाला तथा उनका फल भोगने वाला जीवात्मा है। इससे यह सिद्ध हुआ कि ज्ञानपूर्वक अभ्यास करने से सफलता मिलती है, अज्ञानपूर्वक नहीं॥५०॥