इस सूत्र को विशेष बतलाया है। में श्रुत और अनुमान से उत्पन्न हुई बुद्धियों से ऋतम्भरा प्रज्ञा (बुद्धि) पदार्थों का स्वरूप दो प्रकार से देखा जाता है, एक सामान्य और दूसरा विशेष। पदार्थ में कुछ ऐसे सामान्य धर्म होते हैं, जो अन्यों में भी रहते हैं और कुछ ऐसे विशेष धर्म होते हैं जो अन्यों में नहीं होते। जैसे एक गौ के चार पैर, दो सींग, एक पूँछ आदि धर्म हैं वैसे ही धर्म अन्य गौओं के भी होते हैं। परन्तु जिस आकार के पैर, सींग, पूँछ आदि एक गौ के हैं वैसे ही दूसरी गौ के नहीं होते, कुछ अन्तर होता है। वैसे ही मनुष्य, वृक्षादि में भी समझने चाहियें। श्रुतज्ञान और अनुमानज्ञान वस्तु के विशेष धर्मों का ज्ञान नहीं करवा सकते। परन्तु ऋतम्भरा प्रज्ञा (बुद्धि) प्रत्यक्ष के स्तर पर पदार्थ के विशेष धर्मों का ज्ञान करवाती है। यह इसमें विशेषता है। जैसे धूम को देखकर अनुमान से अग्नि का सामान्य ज्ञान होता है कि यहाँ पर अग्नि है। परन्तु वह कितने क्षेत्र में और उसकी ज्वाला कितनी लम्बी-चौड़ी है यह ज्ञान नहीं होता। जब व्यक्ति उसके समीप में जाकर प्रत्यक्ष देखता है तो विशेष रूप से अग्नि का ज्ञान होता है कि इसकी ज्वाला इतनी लम्बी, इतनी चौड़ी है।
शब्द प्रमाण में यह बात कही कि जीवात्मा एक चेतन पदार्थ है। यह शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदि का सञ्चालन करता है, ऐसा सुनने से जीवात्मा का सामान्य ज्ञान उत्पन्न होता है, विशेष नहीं। समाधि से उत्पन्न ऋतम्भरा बुद्धि से जीवात्मा का विशिष्ट ज्ञान होता है। यह दोनों बुद्धियों में भेद है। इसका यह अभिप्राय नहीं है कि शब्द प्रमाण से सुनी हुई बातें और अनुमान प्रमाण से प्राप्त ज्ञान योग का साधन नहीं है। यदि व्यक्ति सत्य शास्त्रों को पढ़कर, सुनकर और अनुमान प्रमाण से ज्ञान प्राप्त कर अपने आचरण में ले आता है तो समाधि के द्वारा ऋतम्भरा बुद्धि को प्राप्त कर लेता है। सांसारिक व्यक्ति पदार्थों का जो प्रत्यक्ष करते हैं, वह साधारण प्रत्यक्ष है। परन्तु ऋतम्भरा बुद्धि से योगी को जो प्रत्यक्ष होता है, वह उत्कृष्ट प्रत्यक्ष है॥४९॥