इस सूत्र में यह बतलाया है कि निर्विचार समाधि के वैशारद्य (परिपक्व निर्मलता) की सिद्धि होने पर योगी को उत्कृष्ट ज्ञान की प्राप्ति होती है।
समाधि का अभ्यास करते - करते योगी की बुद्धि अविद्या आदि मलों से रहित हो जाती है। अतः रजोगुण, तमोगुण से प्रभावित नहीं होती। विवेक, वैराग्य और अभ्यास का सतत सावधानी से प्रयोग करने के कारण योगी की बाधारहित समाधि बनी रहती है। इस स्थिति में उस योगी का ज्ञान उत्कर्ष को प्राप्त होता है। उससे वह पदार्थ के यथार्थ स्वरूप को जानता है।
यहाँ यह शंका हो सकती है कि इस विशिष्ट ज्ञान का स्रोत क्या है ? यह ज्ञान ईश्वर प्रदत्त है। जीवात्मा अपने ज्ञान, कर्म और उपासना को जितना ईश्वराज्ञानुसार बना लेता है ईश्वर उसको उतना ज्ञान देता है। जीवात्मा का अपना स्वाभाविक ज्ञान अल्प है। उससे जीवात्मा को पदार्थों का परिज्ञान नहीं हो सकता। प्रकृति जड़ पदार्थ है, वह ज्ञान का आधार नहीं बन सकती। इसलिए जहाँ-जहाँ जीवात्मा विशिष्ट ज्ञानयुक्त होता है, वहाँ-वहाँ वह ज्ञान ईश्वर प्रदत्त है। यहाँ पर यह बतलाया गया कि समाधि अवस्था में रजोगुण, तमोगुण से बुद्धि अभिभूत नहीं होती। क्योंकि योगी अपने पुरुषार्थ के बल पर इनको उभरने नहीं देता और इनको दूर करने के लिए श्रद्धापूर्वक ईश्वरोपासना करता है। समाधि की इस स्थिति को प्राप्त करने के लिये वह मोक्षशास्त्रों को पढ़ता है, योगाभ्यासी सत्पुरुषों का संग करता है। इन्हीं कारणों से निर्विचार समाधि की निर्मलता होती है।
यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि समाधि प्राप्त योगी को उस अवस्था में क्या अनुभव होता है। इस विषय में कहा है कि निर्विचार समाधि की निर्मलता सिद्ध होने पर योगी ज्ञान के ऊँचे स्तर को प्राप्त करके स्वयं को अविद्या आदि क्लेशों से रहित और सांसारिक मनुष्यों को क्लेशों से पीड़ित देखता है। उस योगी की वैसी ही स्थिति होती है जैसे कि किसी पर्वत के शिखर से नीचे रहने वाले मनुष्यों को देखने वाले की होती है। इस स्थिति को प्राप्त करके वह समस्त संसार के प्राणियों को इन क्लेशों से छुड़ाकर सुख प्राप्त कराना चाहता है और स्वयं इस अवस्था को छोड़ना नहीं चाहता॥४७॥