Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 1/45

1/45
Sutra
सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् ॥ १.४५ ॥

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम्॥४५॥

शब्दार्थ - (सूक्ष्म-विषयत्वम्) सूक्ष्म विषयता = जड़ पदार्थों की सूक्ष्मता () और (अलिङ्ग-पर्यवसानम्) प्रकृति पर्यन्त रहती है। 

सूत्रार्थ - जड़ पदार्थों की सूक्ष्मता प्रकृतिपर्यन्त रहती है।

Vyas Bhashya

पार्थिवस्याणोर्गन्धतन्मात्रं सूक्ष्मो विषयः, आप्यस्य रसतन्मात्रम्, तैजसस्य रूपतन्मात्रम्, वायवीयस्य स्पर्शतन्मात्रम्, आकाशस्य शब्दतन्मात्रमिति। तेषामहंकारः। अस्यापि लिङ्गमात्रं सूक्ष्मो विषयः। लिङ्गमात्रस्याप्यलिङ्गं सूक्ष्मो विषयः। न चालिङ्गात्परं सूक्ष्ममस्ति।

नन्वस्ति पुरुषः सूक्ष्म इति ? सत्यम्। यथा लिङ्गात्परमलिङ्गस्य सौक्ष्म्यं न चैवं पुरुषस्य। किंतु लिङ्गस्यान्वयिकारणं पुरुषो न भवति, हेतुस्तु भवतीति। अतः प्रधाने सौक्ष्म्यं निरतिशयं व्याख्यातम्॥४५॥

व्या० भा० अ० - पार्थिव अणु का सूक्ष्मविषय गन्धतन्मात्रा है, जलीय अणु का सूक्ष्मविषय रसतन्मात्रा है, तैजस अणु का सूक्ष्मविषय रूपतन्मात्रा है, वायवीय अणु का सूक्ष्मविषय स्पर्शतन्मात्रा है और आकाशीय अणु का सूक्ष्मविषय शब्दतन्मात्रा है। उन (तन्मात्राओं) का सूक्ष्मविषय अहंकार है। इस (अहंकार) का भी सूक्ष्मविषय लिङ्गमात्र (महत्तत्त्व) है। लिङ्गमात्र का भी सूक्ष्मविषय अलिङ्ग (प्रकृति) है। और अलिङ्ग से परे सूक्ष्मविषय नहीं है।

इस पर शङ्का है कि (अलिङ्ग से परे) सूक्ष्मविषय पुरुष है ? यह सत्य है। जिस प्रकार लिङ्ग से परे अलिङ्ग की सूक्ष्मता है उस प्रकार पुरुष की सूक्ष्मता नहीं है। पुरुष लिङ्ग का उपादानकारण नहीं होता परन्तु निमित्तकारण होता है। इसलिये प्रधान (प्रकृति) में निरतिशय सूक्ष्मता का व्याख्यान किया गया है।। ४५॥

Yog Prakash

इस सूत्र में जड़ पदार्थों की सूक्ष्मता की सीमा का उल्लेख है। जिन सूक्ष्म अणुओं से पृथिवी की उत्पत्ति होती है उनका उपादानकारण तन्मात्रा सूक्ष्मभूत हैं अर्थात् भूमि के अवयव जो सूक्ष्म अणु हैं उनका उपादानकारण तन्मात्रायें हैं। तन्मात्राओं का उपादानकारण अहंकार है। वह तन्मात्राओं से सूक्ष्म है। अहंकार का उपादानकारण महत्तत्त्व है, वह अहंकार से सूक्ष्म है। महत्तत्त्व का उपादानकारण प्रकृति है। वह महत्तत्त्व से सूक्ष्म है। प्रकृति का कोई उपादानकारण नहीं है। जड़ पदार्थों में प्रकृति से सूक्ष्म कोई पदार्थ नहीं है। यद्यपि जीवात्मा और परमात्मा प्रकृति से भी सूक्ष्म पदार्थ हैं। परन्तु वे किसी जड़ पदार्थ का उपादानकारण नहीं हैं। व्यासभाष्य में पुरुष को महत्तत्त्व आदि पदार्थों का निमित्त कारण माना है, उपादानकारण नहीं। इससे ईश्वर को संसार का उपादानकारण मानने का पक्ष खण्डित हो जाता है। ईश्वर को महत्तत्त्व आदि पदार्थों का निमित्तकारण स्वीकार करने से यह बात भी सिद्ध हो गई कि सृष्टि की रचना ईश्वर करता है।

इस वर्णन से साधक को जहाँ यह परिज्ञान होता है कि किस जड़ पदार्थ का उपादानकारण क्या है और सृष्टि की रचना कैसे होती है तथा वहाँ यह भी ज्ञात होता है कि इस सृष्टि का रचयिता ईश्वर है और यह सृष्टि स्वयं ही उत्पन्न नहीं होती। जब योगाभ्यासी ईश्वर को सृष्टि का कर्त्ता मान लेता है तो ईश्वर के प्रति भावना दृढ़ हो जाती है॥४५॥

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