क्षीणवृत्तेरिति प्रत्यस्तमितप्रत्ययस्येत्यर्थः। अभिजातस्येव मणेरिति दृष्टान्तोपादानम्। यथा स्फटिक उपाश्रयभेदात्तत्तद्रूपोपरक्त उपाश्रयरूपाकारेण निर्भासते तथा ग्राह्यालम्बनोपरक्तं चित्तं ग्राह्यसमापन्नं ग्राह्यस्वरूपाकारेण निर्भासते। तथा भूतसूक्ष्मोपरक्तं भूतसूक्ष्मसमापन्नं भूतसूक्ष्मस्वरूपाभासं भवति। तथा स्थूलालम्बनोपरक्तं स्थूलरूपसमापन्नं स्थूलरूपाभासं भवति। तथा विश्वभेदोपरक्तं विश्वभेदसमापन्नं विश्वरूपाभासं भवति।
तथा ग्रहणेष्वपीन्द्रियेषु द्रष्टव्यम्। ग्रहणालम्बनोपरक्तं ग्रहणसमापन्नं ग्रहणस्वरूपाकारेण निर्भासते। तथा ग्रहीतृपुरुषालम्बनोपरक्तं ग्रहीतृपुरुषसमापन्नं ग्रहीतृपुरुषस्वरूपाकारेण निर्भासते। तथा मुक्तपुरुषालम्बनोपरक्तं मुक्तपुरुषसमापन्नं मुक्तपुरुषस्वरूपाकारेण निर्भासत इति। तदेवमभिजातमणिकल्पस्य चेतसो ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु पुरुषेन्द्रियभूतेषु या तत्स्थतदञ्जनता तेषु स्थितस्य तदाकारापत्तिः सासमापत्तिरित्युच्यते॥४१॥
व्या० भा० अ० - 'क्षीणवृत्ति' का अर्थ है - (अभ्यास के द्वारा) शान्त हो गयी हैं (राजस् तामस्) वृत्तियाँ जिस चित्त की। स्वच्छ स्फटिक मणि के समान यह दृष्टान्त का ग्रहण किया है। जिस प्रकार स्फटिक मणि निकटवर्ती भिन्न भिन्न पदार्थों के कारण उनके आकारों से उपरक्त भासित होता है उसी प्रकार ग्राह्य आलम्बन से उपरक्त चित्त ग्राह्य आकार को प्राप्त होकर ग्राह्य के स्वरूप के आकार का भासित होता है एवं सूक्ष्मभूतों से उपरक्त, सूक्ष्मभूत आकार को प्राप्त हुआ सूक्ष्मभूत आकार का भासित होता है। इसी प्रकार स्थूलभूतों से उपरक्त स्थूलभूत आकार को प्राप्त हुआ स्थूलभूत आकार का भासित होता है। वैसे ही विविध मनुष्य आदि चेतन प्राणी, घटपटादि अचेतन पदार्थों से उपरक्त विविध आकारों को प्राप्त हुआ विविध आकारों का भासित होता है।
स्वरूप इसी प्रकार ग्रहण जो इन्द्रियाँ हैं, उनमें जानना चाहिए। ग्रहण आलम्बन से उपरक्त ग्रहण के आकार को प्राप्त होकर ग्रहण के स्वरूप के आकार का भासित होता है। तथा ग्रहीतृपुरुष जीवात्मा आलम्बन से उपरक्त ग्रहीतृ के आकार को प्राप्त होकर ग्रहीतृ के स्वरूप के आकार का भासित होता है। वैसे मुक्तपुरुष के आलम्बन से उपरक्त मुक्तपुरुष के आकार को प्राप्त होकर मुक्तपुरूष के के आकार का भासित होता है। इस प्रकार अभिजात (नवीन शुद्ध) मणि (बिल्लोर पत्थर) के समान चित्त की ग्रहीतृ, ग्रहण, ग्राह्यों में पुरुष, इन्द्रियाँ और स्थूल, सूक्ष्म भूत उनमें स्थित होकर जो उनके आकार को ग्रहण करना है; वह चित्त की तदाकारपत्ति है, वह 'समापत्ति' कहलाती है॥४१॥