इस सूत्र में यह बतलाया गया है कि साधक अभ्यास करते-करते चित्त को पूर्णरूपेण अपने अधिकार में कर लेता है। छोटे से छोटे पदार्थ में और बड़े से बड़े पदार्थ में अपनी इच्छानुसार जितनी देर तक रोकना चाहता है रोक लेता है।
जिन पदार्थों में चित्त को एकाग्र करने का विधान किया है वे प्राकृतिक हैं। जैसे कि सूक्ष्म पदार्थों में तन्मात्रादि और स्थूल पदार्थों में पर्वतादि। यहाँ पर परमाणु शब्द से प्रकृति का ग्रहण नहीं किया जाता। जब सूक्ष्म से सूक्ष्म और स्थूल से स्थूल दोनों कोटियों में चित्त को स्थिर कर लिया जाता है तब अन्य साधनों से एकाग्र करने की आवश्यकता नहीं रहती। यह चित्त का उत्कृष्ट वशीकार है।
यदि योगाभ्यासी इस स्थिति को प्राप्त करके आलस्य-प्रमाद करता है तो चित्त में विक्षेप पुन: उत्पन्न होने लगते हैं। इसलिये मन पर वश्यता होने पर भी सदा उसको उसी स्थिति में रखने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। जो भोगों के संस्कार मन की एकाग्रता के समय में अभिभूत हो जाते हैं, वे साधक का प्रयास शिथिल होने पर पुनः उद्बुद्ध हो जाते हैं। उससे चित्त की एकाग्रता भंग हो जाती है। इसलिये साधक को अत्यन्त सावधान होकर सदा प्रयत्नशील रहना चाहिये॥४०॥