Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 1/4

1/4
Sutra
वृत्तिसारूप्यं इतरत्र ॥ १.४ ॥

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Inception

व्युत्थानचित्ते तु सति तथापि भवन्ती न तथा। कथं तर्हि ? दर्शितविषयत्वात् – 

अर्थ - चित्त की व्युत्थानावस्था में जीवात्मा अपरिवर्तनशील होता हुआ भी स्वयं को वैसा अनुभव नहीं करता। तो किस रूप का होता है ? बुद्धि के द्वारा दिखाये गये विषयों का प्रतिसंवेदी (अनुभवकर्त्ता) होने के कारण।

Word Meaning

वृत्तिसारूप्यमितरत्र॥४॥

शब्दार्थ (वृत्ति-सारूप्यम्) वृत्तियों के समान रूप वाला प्रतीत होता है जीवात्मा (इतरत्र ) निरुद्धावस्था और एकाग्रावस्था से भिन्नावस्था में अर्थात् व्युत्थान-अवस्था में। 

सुत्रार्थ - सूत्र निरुद्धावस्था और एकाग्रावस्था से भिन्नावस्था अर्थात् व्युत्थान- अवस्था में जीवात्मा वृत्तियों के समान रूप वाला प्रतीत होता है।

Vyas Bhashya

व्या० भा० - व्युत्थाने याश्चित्तवृत्तयस्तदविशिष्टवृत्तिः पुरुषः। तथा च सूत्रम् - 'एकमेव दर्शनं, ख्यातिरेव दर्शनम्' इति। चित्तमयस्कान्तमणिकल्पं संनिधिमात्रोपकारि दृश्यत्वेन स्वं भवति पुरुषस्य स्वामिनः। तस्माश्चित्तवृत्तिबोधे पुरुषस्यानादिः संबन्धो हेतुः॥४॥

व्या० भा० अ० - व्युत्थान की स्थिति में जिस प्रकार की चित्तवृत्तियाँ होती हैं पुरुष भी उसी प्रकार प्रतीत होता है। और वैसा सूत्र है - पुरुष और बुद्धि दोनों का दर्शन एक रूप में होता है। यह दर्शन बुद्धिवृत्तियों के रूप में होता है। चित्त अयस्कान्तमणि (चुम्बक) के सदृश है। सन्निधिमात्र से पुरुष का उपकार करता है। वह दृश्यत्व के रूप से स्वामी जीवात्मा का स्व (= धन) बन जाता है। इसलिए पुरुष को चित्त वृत्तियों का जो ज्ञान होता है, उसमें पुरुष और बुद्धि का (प्रवाह से) अनादि सम्बन्ध ही कारण है॥४॥ 

Yog Prakash

इस सूत्र में बताया गया है कि सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था से भिन्न अवस्था में अर्थात् सांसारिक जीवात्मा अपने को चित्तवृत्तियों के समान देखा है। 

चित्त और इन्द्रियों के माध्यम से जिन विषयों का ज्ञान जीवात्मा प्राप्त करता है, उस ज्ञान का नाम 'वृत्ति' है। चित्त में जब किसी विषय का चित्र उतरता है तब जीवात्मा उसको देखता है। जैसा वह चित्र है, वैसा स्वयं अपने को देखता है; उसमें भेद नहीं करता कि वह चित्र चित्तवृत्ति है और वह मुझसे भिन्न है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति ने उत्तम पदार्थ को खाया, उससे उसको सुख की प्राप्ति हुई; आत्मा उस सुख को अपना ही स्वरूप मान लेता है। एक अन्य उदाहरण -किसी व्यक्ति को क्रोध आया। उस क्रोध को वह अपना स्वरूप मान लेता है। जब कि क्रोध जीवात्मा का स्वरूप नहीं है। इसी प्रकार जीवात्मा अज्ञानावस्था में शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, भूमि, धन, पुत्र, पौत्र आदि को अपने से भिन्न नहीं जानता। उनको और अपने आपको एक जानता है। जीव मन और इन्द्रियों के द्वारा ऐसे अनेक कार्यों को करता है जो उसके लिए हानिकारक हैं। वह स्वयं मन, इन्द्रियों को प्रेरणा देकर कार्य करता हुआ भी यह मानता है कि ये मन, इन्द्रियाँ स्वयं अशुभ कर्म करते हैं। यह उसकी समाधि अवस्था से भिन्न सांसारिक अवस्था है। इससे यह सिद्ध होता है उस अवस्था में जीवात्मा स्वयं को और वृत्तियों को एकरूप में अर्थात् अभिन्न देखता है। यह सांसारिक लोगों की स्थिति है। जो नये साधक प्रारम्भ में समाधि को प्राप्त करते हैं, उनकी स्थिति भी ऐसी ही होती है। व्यवहारकाल में वे चित्तवृत्तियों को और स्वयं को एकरूप में देखते हैं। उनकी स्थिति जब दृढ़ होती है तब व्यवहार में उनकी यह स्थिति नहीं रहती; अर्थात् उनको अपना और वृत्तियों का स्वरूप पृथक्-पृथक् ज्ञात होता है।

यह हमने ऊपर कहा है कि नवीन योगाभ्यासियों की स्थिति व्यवहारकाल में यह होती है कि वे वृत्तियों को और अपने आप को पृथक्-पृथक् नहीं देख पाते, तथापि उनकी स्थिति सांसारिक लोगों से उन्नत होती है; व्यवहारकाल में भी वे शान्ति का अनुभव करते हैं। सांसारिक मनुष्यों की अपेक्षा उनको क्लेश न्यून सताते हैं। जब योगाभ्यासी दीर्घकाल तक अभ्यास करके समाधि की स्थिति को दृढ़ बना लेता है तब व्यवहारकाल में भी उसकी समाधि भङ्ग नहीं होती। उस स्थिति में वृत्तियों को और स्वयं को पृथक्-पृथक् जानता है। जिस प्रकार आसन लगाकर बैठा हुआ योगाभ्यासी समाधिकाल में शरीर को, वृत्तियों को, मन को और

इन्द्रियों को अपने से भिन्न जानता है उसी प्रकार व्यवहारकाल में भी जानता है। ईश्वरप्रणिधान के द्वारा व्यवहार में वह व्यक्ति आनन्द की प्राप्ति करता है। इससे यह सिद्ध होता है कि जिस प्रकार आसन पर बैठकर एक साधक, इन्द्रियों और मन आदि को अपने से भिन्न जानता है, ईश्वर के नित्य सुख का उपभोग करता है; उसी प्रकार समाधि की परिपक्वावस्था होने पर व्यवहार में भी यह स्थिति होती है। व्यासभाष्य में इस अवस्था का वर्णन है उसे नीचे दिया जाता है।

शय्यासनस्थोऽथ पथि व्रजन् वा, स्वस्थः परिक्षीणवितर्कजालः।
संसारबीजक्षयमीक्षमाणः, स्यान्नित्यमुक्तोऽमृतभोगभागी॥योगदर्शन २/३२॥

शय्या पर लेटा, आसन पर बैठा, मार्ग में चलता हुआ भी क्षीण वितर्क जाल वाला संसार के बीज के क्षय को देखने वाला मोक्ष सुख को अनुभव करने वाला योगी नित्यमुक्त होता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि योगी व्यवहार काल में समाधि के द्वारा ईश्वर के आनन्द का अनुभव करता है॥४॥

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