इस सूत्र में यह बतलाया है कि चित्त को एकाग्र करने के साधन जो योगदर्शन में वर्णित हैं, वेद और वेदानुकूल शास्त्रों में जिनका उल्लेख है उनमें से साधक को जो भी अनुकूल हो उसका अभ्यास करे। उसका अभ्यास करते-करते चित्त स्थिर हो जाता है। वहाँ पर स्थिर हो जाने से साधक अपनी इच्छा के अनुसार अपने चित्त को जहाँ भी स्थिर करना चाहे वहीं पर कर सकता है।
यहाँ पर यह ध्यान रखना चाहिए कि इस सूत्र से चाहे जिस किसी विषय को लेकर उसे चित्त एकाग्र करने का साधन नहीं बनाया जा सकता। इस सूत्र का अभिप्राय है कि जो-जो साधन योग अनुकूल हैं और जिनका कथन वेद तथा वेदानुकूल शास्त्रों में किया है साधक उनमें से जो अपने लिए अनुकूल हो उसका अभ्यास करके चित्त को एकाग्र करे।
कुछ लोग कहते हैं कि मन को खुला छोड़ दो, वह अपने आप रुक जायेगा। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि जिन-जिन विषयों को भोगने की इच्छा हो, उनको खुलकर भोगो। भोगते - भोगते चित्त ऊब जायेगा और उसके पश्चात् स्वयं रुक जायेगा। उसको रोकने की आवश्यकता नहीं होगी। कुछ लोगों का कहना है कि मन को एकाग्र करने से पूर्व कुछ समय खुलकर रोओ और कुछ समय खुलकर हँसो, इससे मन एकाग्र हो जाता है। उनकी ये मान्यतायें वेद और वेदानुकूल ऋषिकृत ग्रन्थ तथा प्रत्यक्ष अनुभव के विरुद्ध हैं। इस प्रकार के साधनों का प्रयोग करने वाला व्यक्ति कभी भी योगी बनकर ईश्वरसाक्षात्कार नहीं कर सकता है और न अन्यों को करवा सकता है। इसलिये योगाभ्यासियों को योगानुकूल साधनों से ही अपना मन एकाग्र करना चाहिये, विरुद्ध साधनों से नहीं॥३९॥