इस सूत्र में स्वप्नज्ञान और निद्राज्ञान के आलम्बन से चित्त को एकाग्र करने का उपाय बतलाया है।
जो साधक गुरुओं से योगविद्या पढ़ता है और सुनता है, उसके मन में वैसे ही संस्कार उत्पन्न होते हैं। उन योगविद्या के संस्कारों से स्वप्न भी वैसे ही आते हैं। स्वप्न अवस्था में उन संस्कारों के उभरने से बड़ा आनन्द आता है। स्वप्न देखकर आनन्द का अनुभव करने वाला व्यक्ति यह चाहता है कि मेरी यह स्थिति ऐसी ही बनी रहे, बिगड़े नहीं। जब उसकी स्वप्न अवस्था समाप्त हो जाती है तो स्वप्न के समय जो आनन्द का अनुभव हो रहा था, वह समाप्त हो जाता है। वह व्यक्ति यह चाहता है कि स्वप्नकाल में जो आनन्द की अनुभूति हो रही थी, उसको पुनः प्राप्त करना चाहिये। जब वह स्वप्नज्ञान को अपने चित्त का आलम्बन बनाता है तो उसका चित्त एकाग्र होता है।
इसी प्रकार से जब व्यक्ति को सात्विक निद्रा आती है तो सुख की अनुभूति होती है। गाढ़ निद्रा में सुख की अनुभूति से संस्कार उत्पन्न होते हैं। उन संस्कारों से स्मृति उत्पन्न होती है। जब व्यक्ति उस अनुभूति को स्मरण करता है तो पुनः उसी अवस्था को प्राप्त करना चाहता है। ऐसा करने से उसका चित्त एकाग्र होता है। जहाँ पर सुख और सुख के साधनों की प्राप्ति, दुःख और दुःख के साधनों की निवृत्ति होती है, वहाँ पर चित्त शीघ्र एकाग्र होता है। इससे किसी को ऐसा नहीं समझना चाहिये कि चित्त को एकाग्र करने के लिए स्वप्नावस्था तथा निद्रावस्था को उत्पन्न करना पड़ता है। क्योंकि स्वप्नावस्था एवं निद्रावस्था मन को एकाग्र करने वा ध्यान लगाने में बाधक है॥३८॥