इस सूत्र में वीतराग योगियों के चित्त का आलम्बन करने वाला चित्त स्थिरहो जाता है, यह कहा गया है। जिन योगियों ने शुद्ध ज्ञान, शुद्ध कर्म और शुद्ध उपासना से अपने चित्त को रागरहित बना लिया है उनके सत्संग से, उनके खान-पान आदि व्यवहार से व्यक्ति प्रभावित होता है और श्रद्धा से उन्हीं जैसा आचरण करने का प्रयास करता है तो जैसा योगियों का चित्त रागरहित होता है, वैसा ही उनका सत्संग करने वाले योगजिज्ञासुओं का चित्त भी रागरहित, एकाग्र होने लगता है। जो योगाभ्यासी सत्पुरुषों का संग करते हैं और उनके वचनों पर श्रद्धा रखते हैं तथा उन्हीं जैसा बनना चाहते हैं वे शीघ्र ही अपने जीवन को योगियों जैसा बना लेते हैं। जो योगजिज्ञासु साक्षात् योगियों का संग करके, उनके जीवनचरित्र को पढ़कर अथवा सुनकर उन्हीं जैसा बनने का प्रयास करते हैं तो उनका चित्त एकाग्र होने लगता है। इसलिये योगाभ्यासियों को रागरहित योगियों के सत्संग में रहकर, उनके आचरण को देखकर उन जैसा बनने का यत्न करना चाहिए। इससे चित्त को एकाग्र करने में सफलता मिलती है।
यह वीतराग, तत्त्ववेत्ता, योगविद्या में निपुण व्यक्तियों के चित्त के आलम्बन से ही सम्भव है। जो इस प्रकार के नहीं हैं उनके चित्त के आलम्बन करने से लाभ नहीं होता है। वीतराग योगियों के सम्पर्क में रहकर भी उनके जीवन के समान आचरण न करने, उनके आहार-विहार के समान अपना आहारविहार न बनाकर मात्र उनके चित्रों को अपने पास रखने तथा उनके ही नाम का जप आदि करने से भी साधक का चित्त स्थिरता को प्राप्त नहीं होता। इसलिए सत्पुरुषों के समान आचरण न करने वाला साधक योग मार्ग में भी प्रवृत्त नहीं हो सकता अपितु योगमार्ग से भटक जाता है॥३७॥