प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनीत्यनुवर्तते। हृदयपुण्डरीके धारयतो या बुद्धिसंवित्, बुद्धिसत्त्वं हि भास्वरमाकाशकल्पं, तत्र स्थितिवैशारद्यात्प्रवृत्तिः सूर्येन्दुग्रहमणिप्रभारूपाकारेण विकल्पते। तथाऽस्मितायां समापन्नं चित्तं निस्तरङ्गमहोदधिकल्पं शान्तमनन्तमस्मितामात्रं भवति। यत्रेदमुक्तम्-तमणुमात्रमात्मानमनुविद्यास्मीत्येवं तावत्संप्रजानीत इति। एषा द्वयी विशोका विषयवती, अस्मितामात्रा च प्रवृत्तिर्ज्योतिष्मतीत्युच्यते यया योगिनश्चित्तं स्थितिपदं लभत इति॥३६॥
व्या० भा० अ० - 'प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनी', यह अंश पूर्वसूत्र से आता है। हृदयपुण्डरीक में धारणा करने वाले योगी को बुद्धि का जो साक्षात्कार होता है - बुद्धिसत्त्व प्रकाशरूप आकाश के समान होता है उसमें एकाग्रताजन्य निर्मलता के कारण प्रवृत्ति (उत्कृष्ट ज्ञान) सूर्य, चन्द्र, ग्रह, मणि की कान्ति के सदृशरूप वाली उत्पन्न होती है। उसी प्रकार अस्मिता में एकाग्रचित्त तरङ्गों से रहित महान् समुद्र के समान शान्त, महान् अस्मितामात्र होता है। जिसके विषय में कहा गया है कि "उस अणुमात्र आत्मा को जानकर 'मैं हूँ' इस प्रकार जानता है।" विशोका ज्योतिष्मती नामक यह प्रवृत्ति दो प्रकार की है- एक 'विशोका विषयवती ज्योतिष्मती प्रवृत्ति', दूसरी 'विशोका अस्मितामात्र ज्योतिष्मती प्रवृत्ति'। जिस साक्षात्कारात्मक प्रवृत्ति के द्वारा योगी का चित्त स्थिति पद को प्राप्त करता है।। ३६।।