नासिकाग्रे धारयतोऽस्य या दिव्यगन्धसंवित्सा गन्धप्रवृत्तिः। जिह्वाग्रे रससंवित्। तालुनि रूपसंवित्। जिह्वामध्ये स्पर्शसंवित्। जिह्वामूले शब्दसंविदित्येता वृत्तय उत्पन्नाश्चित्तं स्थितौ निबध्नन्ति, संशयं विधमन्ति, समाधिप्रज्ञायां च द्वारीभवन्तीति। एतेन चन्द्रादित्यग्रहमणिप्रदीपरश्म्यादिषु प्रवृत्तिरुत्पन्ना विषयवत्येव वेदितव्या।
यद्यपि हि तत्तच्छास्त्रानुमानाचार्योपदेशैरवगतमर्थतत्त्वं सद्भूतमेव भवति, एतेषां यथाभूतार्थप्रतिपादनसामर्थ्यात्, तथापि यावदेकदेशोऽपि कश्चिन्न स्वकरणसंवेद्यो भवति तावत्सर्वं परोक्षमिवापवर्गादिषु सूक्ष्मेष्वर्थेषु न दृढां बुद्धिमुत्पादयति। तस्माच्छास्त्रानुमानाचार्योपदेशो-पोवलनार्थमेवावश्यं कश्चिदर्थविशेषः प्रत्यक्षीकर्तव्यः। तत्र तदुपदिष्टार्थैकदेशप्रत्यक्षत्वे सति सर्वं सुसूक्ष्मविषयमप्यापवर्गाच्छ्रद्धीयते। एतदर्थमेवेदं चित्तपरिकर्म निर्दिश्यते। अनियतासु वृत्तिषु तद्विषयायां वशीकारसंज्ञायामुपजातायां चित्तं समर्थं स्यात्तस्य तस्यार्थस्य प्रत्यक्षीकरणायेति। तथा च सति श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधयोऽस्याप्रतिबन्धेन भविष्यन्तीति॥३५॥
व्या० भा० अ० - नासिका के अग्रभाग में धारणा करने वाले इस साधक को जो दिव्यगन्ध का साक्षात्कार होता है वह 'गन्धप्रवृत्ति' है। जिह्वा के अग्रभाग में धारणा करने से दिव्यरस का साक्षात्कार होता है वह 'रसप्रवृत्ति' है। तालु में धारणा करने से दिव्यरूप का साक्षात्कार होता है वह 'रूपप्रवृत्ति' है। जिह्वामध्य में धारणा करने से दिव्यस्पर्श का साक्षात्कार होता है वह 'स्पर्शप्रवृत्ति' है। जिह्वामूल में धारणा करने से दिव्यशब्द का साक्षात्कार होता है वह 'शब्दप्रवृत्ति' है। ये इतनी प्रवृत्तियाँ उत्पन्न होकर चित्त को स्थिर करती है और समाधिप्रज्ञा में माध्यम बनती हैं। इससे चन्द्र, सूर्य, ग्रह, मणि, प्रदीप और रश्मि आदि में उत्पन्न प्रवृत्ति विषयवती ही जाननी चाहिए।
यद्यपि उन-उन शास्त्रों, अनुमानप्रमाण तथा आचार्यों के उपदेश से ज्ञात बातें यथार्थ ही होती है क्योंकि इनमें यथार्थ बतलाने का सामर्थ्य होता है फिर भी जब तक इनमें से कोई एक देश अपने उपकरणों (मन-इन्द्रियों) द्वारा नहीं जाना जाता तब तक परोक्ष के समान रहने वाला अपवर्गपर्यन्त सारा विषय सूक्ष्मतत्त्वों के प्रति दृढ़विश्वास को उत्पन्न नहीं करता। इसलिये शास्त्र, अनुमान और आचार्यों के उपदेश की पुष्टि के लिए अवश्य ही किसी विशिष्ट अंश को प्रत्यक्ष कर लेना चाहिए। उन उपदिष्ट सब विषयों में एक विषय का प्रत्यक्ष होने पर अपवर्गपर्यन्त समस्त सूक्ष्म विषयों में श्रद्धा उत्पन्न होती है। इसलिए इस चित्त परिकर्म का निर्देश किया जाता है। अस्थिर गन्धादि वृत्तियों के विषय में वशीकार स्थिति अर्थात् अपरवैराग्य के उत्पन्न होने पर चित्त ज्ञातव्य विषयों
के प्रत्यक्ष करने में समर्थ हो जाता है और वैसा होने पर इस योगी की श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि अबाधरूप से सिद्ध हो जायेंगी॥३५॥