इस सूत्र में योग के उपविघ्नों का वर्णन है। व्याधि आदि विघ्नों के होने पर ये उपविघ्न होते हैं और उनके न होने पर नहीं होते। उपविघ्नों में से एक दुःख है जिससे पीड़ित हुए हुए प्राणी उसके नाश के लिये प्रयत्न करते हैं, उसको दुःख कहते हैं। वह आध्यात्मिक, अधिभौतिक और आधिदैविक तीन प्रकार का है। जो अपने कारण से होता है, वह आध्यात्मिक है। जो दूसरे प्राणियों के कारण से होता है, वह आधिभौतिक है और जो पृथिवी आदि भूतों के कारण से होता है, वह आधिदैविक है।
कुछ लोग कहते हैं कि दुःख और सुख, ये कोई पदार्थ नहीं हैं। यह एक कल्पनामात्र है। लोगों की यह मान्यता ठीक नहीं है क्योंकि दुःख और सुख प्रत्यक्षादि प्रमाणों से अनुभव में आते हैं और इन दोनों का प्रभाव मनुष्य के जीवन पर पड़ता है। जब व्यक्ति दुःखी होता है तो उस पर भिन्न प्रकार का प्रभाव पड़ता है। वह अप्रसन्न, बाधित दिखाई देता है और उस अवस्था से छूटने के लिये विविध प्रयास करता है। जब व्यक्ति सुखी होता है तो उस पर भिन्न प्रकार का प्रभाव पड़ता है। वह प्रसन्न और बाधारहित दिखाई देता है। वह उस स्थिति को छोड़ना नहीं चाहता। इसलिये दुःख एक पदार्थ है और वह योग का विरोधी है। अपनी इच्छा की पूर्ति न होने से व्यक्ति खिन्न हो जाता है। उससे मन की स्थिरता भंग हो जाती है। इसलिये यह योग का बाधक है।
उपासना-काल में अङ्गों में कम्पन होने से चित्त की एकाग्रता भंग होती है। यह कम्पन किसी रोग के कारण होता है अथवा व्यक्ति ने अपने अङ्गों को हिलाने का अभ्यास कर लिया हो, इस कारण से होता है। जब श्वास-प्रश्वास साधक के अधिकार से बाहर हो जाते हैं तो वह विधिपूर्वक प्राणायाम नहीं कर सकता और मन्त्रोचारण में भी कठिनाई होती है। इसलिये ये दोनों भी योग के उपविघ्न हैं।
इस प्रसङ्ग में यह बात ध्यान देने योग्य है कि ईश्वरप्रणिधान से शारीरिकरोग एक सीमा तक दूर होते हैं। अतितीव्र रोग दूर नहीं हो सकता। परन्तु उन रोगों को सहने की शक्ति ईश्वर से मिलती है। जिससे योगी बड़े-बड़े दुःखों को भी सह लेता है।
कुछ लोग यह कहते हैं कि योगी की समाधि अवस्था में उसके हाथादि काट दिये जाएं तो उसको कुछ भी पता नहीं चलता और उसकी समाधि भंग नहीं होती। यह कथन ठीक नहीं है। क्योंकि भाष्यकार महर्षि व्यासजी के अनुसार धातु, रस और करण वैषम्य को व्याधि कहा जाता है। शरीर के अङ्गों को काटने पर शरीर में रक्तधातु का परिमाण न्यून होता है। यह 'व्याधि' है। यह योग में बाधक है अर्थात् इसके रहते हुए योग नहीं हो सकता। 'तप' के विषय में उन्होंने लिखा है कि अबाधमानमनेनासेव्यमिति अर्थात् तप वही है जो साधक को बाधा न पहुँचावे। दुःख योग में बाधक है। इसलिये इस मान्यता में वास्तविकता नहीं है। क्योंकि शरीर के हाथादि अङ्गों के काट देने पर समाधि भंग हो जाती है। इसीलिये व्याधि को योग का शत्रु बतलाया है।
कुछ लोगों की यह मान्यता है कि योगी देह के न रहने पर भी बहुत कालपर्यन्त मन्वन्तरों तक समाधिस्थ रहते हैं। जब अत्यन्त आघात से वा मादकपदार्थ (नशीलेपदार्थ) के सेवन से शरीर मूर्छित हो जाता है। तब उस समय आत्मा को किसी प्रकार का ज्ञान ही नहीं रहता है तो शरीररहित जीवात्मा कैसे समाधिस्थ रह सकता है ? अतः उक्त मान्यता ठीक नहीं है॥३१॥