इस सूत्र में यह बतलाया है कि विधिपूर्वक ओमादि का जप और ईश्वर के स्वरूप का चिन्तन करने से योगी को जीवात्मा, परमात्मा का साक्षात्कार होता है और अन्तरायों का अभाव होता है।सूत्र में पठित 'प्रत्यक्चेतना' शब्द से ईश्वर और जीवात्मा का ग्रहण होता है। यहाँ पर एक शंका उभरती है कि ईश्वरप्रणिधान से जीवात्मा के स्वरूप का ज्ञान कैसे होता है इस शंका का समाधान यह है कि जब जीवात्मा व्यवहार में ईश्वर की आज्ञा का पालन करता है और उसकी उपासना भी करता है तो ईश्वर उसको अपना ज्ञान देकर योग्य बना देता है। इसी कारण से जीवात्मा दोनों को जानने में समर्थ हो जाता है। ईश्वर के सत्संग से आगे के सूत्रों में बतलाये विघ्न और उपविघ्नों का भी निराकरण होता है। यहाँ पर यह जानना चाहिये कि जीवात्मा विघ्नों को दूर करने में स्वयं पूर्ण पुरुषार्थ करता है, तो उस पुरुषार्थ के पश्चात् ईश्वर उसको सहायता देता है। पुरुषार्थहीन व्यक्ति को वह सहायता नहीं देता। बिना उसकी सहायता के विघ्न-उपविघ्न दूर नहीं होते। इसलिये प्रत्येक साधक को व्याधि आदि बाधाओं को दूर करने का यथाशक्ति प्रयास करना चाहिये। ईश्वरप्रणिधान के प्रसंग में अनेक साधनों और बाधकों के परित्याग करने से ईश्वर सहायता करता है।
इस विषय में एक प्रश्न उठता है कि परिश्रम करने के पश्चात् ही ईश्वर सहायता क्यों करता है ? इसका समाधान यह है कि उसने कुछ सामर्थ्य जीव को पूर्व से दे रखा है। उसका प्रथम प्रयोग करना चाहिये। इसके पश्चात् भी लक्ष्य की सिद्धि न हो तो तब ईश्वर से याचना करनी चाहिये। ईश्वर न्यायकारी है। उसके न्यायानुसार आचरण करके साधकों को अपनी उन्नति करनी चाहिये। कुछ लोगों की यह मान्यता है कि ईश्वर भक्ति से न कुछ मिलता है और न दोष दूर होते हैं। यह मान्यता ठीक नहीं है क्योंकि इसका प्रत्यक्षादि प्रमाणों से खण्डन हो जाता है। ईश्वरभक्ति के द्वारा सभी मनुष्य अनेक समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। ईश्वरभक्ति का अनुष्ठान करने से प्रत्यक्ष होगा कि क्या लाभ होता है और किन दोषों की निवृत्ति होती है।
ईश्वरभक्ति से उपासक को प्राप्त होने वाले कुछ लाभ -
१. पर्वत के समान कष्ट आने पर भी नहीं डरता, सबको सहन कर जाता है।
२. प्रमाणों से सिद्ध सत्य को ग्रहण करने के लिए उद्यत रहता है। दुराग्रह नहीं करता है
३. उसे ऐसा सामर्थ्य प्राप्त होता है कि वह सदा सत्य ही बोलता है, असत्य नहीं।
४. अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहता है और संगठन की स्थापना करता है, विघटन को दूर करता है।
५.अन्याय को छोड़, सदा न्यायाचरण करने का सामर्थ्य प्राप्त होता है।
६. उसे ऐसी पवित्रता प्राप्त होती है कि वह मद्यमांसादि का सेवन नहीं करता। सदा सात्विक एवं न्यायोपार्जित भोजन को ही स्वीकार करता है।
७. उसे ऐसा ज्ञान प्राप्त होता है कि वह समस्त प्राणियों को आत्मवत् देखता है अर्थात् उनके सुखदुःख, हानिलाभ को अपने सुखदुःख, हानिलाभ के समान समझता है।
८.मानापमान से सुखी - दुःखी नहीं होता है।
९. न्यायकारियों का सहयोग करता है और अन्यायकारी चक्रवर्ती राजा से भी नहीं डरता है ।
१०. ईश्वर के सान्निध्य से आनन्द का उपभोग करता है अतः तन-मन-धन से प्राणिमात्र के उपकार में तल्लीन रहता है।
११. उसे ऐसा सामर्थ्य प्राप्त होता है कि वह सबके साथ प्रीति से व्यवहार करता है, किसी से भी द्वेष नहीं करता है।
१२. सदा निष्काम कर्म करता है सकाम नहीं।
१३. योगी मन और इन्द्रियों पर वश्यता प्राप्त करता है।
१४. समस्त क्लेशों से, बन्धनों से मुक्त होता है। ईश्वर के नित्यानन्द का अनुभव करता है।
१५. अविद्या का नाश और विद्या की प्राप्ति करता है।। २९॥