इस सूत्र में 'प्रणव' को ईश्वर का वाचक बतलाया है। ईश्वर वाच्य है और प्रणव उसका वाचक है। 'प्र' उपसर्गपूर्वक 'णु' (स्तुतौ) धातु से 'अप्' प्रत्यय करने पर 'प्रणव' शब्द सिद्ध होता है। ( प्रकर्षेण नूयते स्तूयते अनेन इति प्रणवः )। जिस शब्द के द्वारा उत्कृष्ट रूप से स्तुति की जाती है वह 'प्रणव' कहाता है। प्रणव शब्द से यहाँ पर 'ओम्' शब्द अभिप्रेत है। यजुर्वेद १८/२५ का भाष्य करते हुए महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने लिखा है कि “प्रणवैः ओङ्कारैः”। इससे स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ 'प्रणव' शब्द के द्वारा 'ओंकार' कहा गया है। 'अवतीति ओम्' 'अव' धातु से 'ओम्' शब्द निष्पन्न होता है। इसका अर्थ रक्षक है।
ओम् का और ईश्वर का पिता-पुत्र जैसा सम्बन्ध है। यहाँ सम्बन्ध प्रवाह से अनादि है, स्वरूप से नहीं क्योंकि शब्द आकाश का गुण है। सांख्यदर्शन में तन्मात्राओं से आकाश की उत्पत्ति बताई गई है। इसलिये ओम् शब्द भी अनित्य है। प्रत्येक सृष्टि के आदि में ईश्वर जीवों को वेदों का ज्ञान देता है। उसी काल में जीवों को यह ज्ञान भी देता है कि ओम् शब्द मेरा वाचक है और मैं उसका वाच्य हूँ। हम दोनों का वाच्य - वाचक सम्बन्ध है।
'ओम्' यह परमेश्वर का मुख्य नाम है। क्योंकि इस शब्द से उसके स्वरूप का विस्तार से वर्णन होता है। उसका ध्यान करते समय छोटा शब्द होने से ओम् का उच्चारण करना सरल है। ईश्वर में विद्यमान गुणों के द्वारा की जाने वाली स्तुति, प्रार्थना आदि 'सगुण' हैं और अविद्यमान गुणों के द्वारा की जाने वाली 'निर्गुण' हैं। दर्शनकार ने ईश्वरप्राप्ति के इच्छुक योगाभ्यासियों को उसके स्वरूप का वर्णन 'निर्गुण' और 'सगुण' रूप से किया है, जिससे उनको ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना करने में कठिनता न हो। क्योंकि जब साधक सगुण और निर्गुण दोनों प्रकार से ईश्वर को जान लेता है तो उसके लिए सगुण, निर्गुण स्तुति, प्रार्थना, उपासना सरल हो जाती है। यहाँ यह ध्यान में रखें कि 'सगुण' का अर्थ 'साकार' और 'निर्गुण' का अर्थ निराकार नहीं है॥। २७॥