इस सूत्र में ईश्वर को पूर्ववर्ती गुरुओं का भी गुरु बतलाया है।सूत्रकथन से यह सिद्ध होता है कि वर्तमानकाल में जो गुरु हैं, उनका और भविष्यकाल में जो गुरु होंगे, उन गुरुओं का भी गुरु ईश्वर है। क्योंकि ईश्वरप्रदत्त विद्या के बिना कोई भी जीवात्मा केवल अपने स्वाभाविकज्ञान से व्यवहार की सिद्धि और मोक्ष की सिद्धि नहीं कर सकता। देहधारी गुरुओं से अथवा सृष्टि की रचना को देखकर व्यक्ति जिस ज्ञान को प्राप्त करता है। वह ज्ञान परम्परा से ईश्वर से ही आया है। वर्तमानकाल में भी जो मनुष्य ईश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं और विधिपूर्वक उसकी उपासना करते हैं, उनको भी ईश्वर ज्ञान देता है। जो भौतिक वैज्ञानिक विद्वान् बनते हैं, वे भी ईश्वर की सहायता से ही बनते हैं। परमेश्वर का ज्ञान उनको कई प्रकार से प्राप्त होता है
(१) परमेश्वर की बनाई सृष्टि और उनमें विद्यमान पदार्थों की रचना को देखने से ज्ञान होता है। उदाहरण के लिये - वैज्ञानिकों ने मनुष्य, पशु आदि के शरीरों का ज्ञान प्राप्त किया। उसी के आधार पर शरीर की चिकित्सा होती है।
(२) पक्षियों के शरीरों के आकार-प्रकार को देखकर उसी के अनुसार विमान का आकार बनाया। जो भी ज्ञान उन्होंने प्राप्त किया वह परमेश्वर के द्वारा बनाये शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि के द्वारा प्राप्त किया। इन सृष्टि के पदार्थों की रचना और इनके आकार प्रकार को देखे बिना और शरीर आदि साधनों के बिना न कोई वैज्ञानिक बन सकता है, न कोई आविष्कार कर सकता है, न ही किसी यन्त्र की रचना कर सकता है। इसलिए आत्मा, परमात्मा को जानने वाले आध्यात्मिक विद्वानों का और भौतिक वैज्ञानिकों का गुरु ईश्वर है। जो सत्य और असत्य का परिज्ञान करवाये, उसको 'गुरु' कहते हैं। जो देहधारी मनुष्य अन्य मनुष्यों को विद्या पढ़ाता है, वह 'गुरु' है। परन्तु उस गुरु को विद्या देने वाला ईश्वर परमगुरु है।
कुछ लोगों की मान्यता यह है कि देहधारी गुरु ईश्वर से बड़ा है क्योंकि वह ईश्वर प्राप्ति करवाता है। यदि वह न हो, तो साधक उस तक पहुँच नहीं सकता। यह ठीक नहीं है, क्योंकि देहधारी गुरु को ईश्वर शरीर, इन्द्रिय आदि साधन न दे और वेदों का ज्ञान न दे तो वह विद्वान् ही नहीं बन सकता। बिना विद्या के औरों का गुरु भी नहीं बन सकता। पूर्व में ईश्वर से विद्या पढ़कर अथवा जिन्होंने ईश्वर से विद्या पढ़ी है, उनसे विद्या पढ़कर पश्चात् दूसरों को पढ़ाता है। उसके पश्चात् उसकी गुरु संज्ञा होती है। इसलिये वह ईश्वर से छोटा होता है, बड़ा नहीं। गुरु का सम्मान करना उत्तम कार्य है। परन्तु उसको ईश्वर से बड़ा मानना अनुचित एवं हानिकारक है। क्योंकि इस मान्यता के अनुसार साधक ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता। बड़े को छोटा और छोटे को बड़ा मानना ईश्वर की आज्ञा के विरुद्ध है। उसकी आज्ञा भंग करने वाले साधक को ईश्वर अपना साक्षात्कार करवाने वाली विद्या नहीं देता। उसके न मिलने से योगाभ्यासी ईश्वर प्राप्ति करके मोक्ष का भागी नहीं बनता। केवल गुरु से विद्या लेने और ईश्वर से न लेने से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती। कभी भी देहधारी गुरु को ईश्वर से बड़ा और ईश्वर को उससे छोटा नहीं मानना चाहिये।
यहाँ एक जिज्ञासा होती है कि मोक्ष प्राप्ति के लिये शरीरधारी गुरु की आवश्यकता है वा नहीं ? आवश्यकता है।
प्रश्न = वैदिक धर्म में गुरु बनाने की परम्परा है या नहीं ?
उत्तर = वैदिक धर्म में गुरु बनाने की परम्परा है।
प्रश्न = गुरु किसको बनाया जाये ?
उत्तर = जिसको गुरु के रूप में स्वीकार किया जाये वह वास्तविक गुरु हो। अर्थात् वास्तविक गुरु में निम्नलिखित लक्षण होने चाहियें।
वास्तविक गुरु के लक्षण -
१. वेद और वेदानुकूल ऋषिकृत ग्रन्थों के पठन-पाठन को मुक्ति का साधन मानने वाला हो।
२. सत्यमानी, सत्यवादी, सत्यकारी हो।
३. पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा का त्यागी हो।
४. ईश्वर, जीव और प्रकृति को पृथक् पृथक् मानने वाला हो।
५. स्वयं अष्टाङ्गयोग का अनुष्ठान करने वाला हो।
६. सकाम कर्मों को छोड़कर निष्काम कर्म करने वाला हो।
७. अपनी उन्नति के तुल्य प्राणिमात्र की उन्नति चाहने वाला हो।
८. पक्षपातरहित न्यायकारी हो।
९. मद्य, मांसादि अभक्ष्य खान-पान करने वाला न हो।
१०. मोक्ष की प्राप्ति करने- करवाने को मानव जीवन का मुख्यलक्ष्य मानने वाला हो।
११. वेद, दर्शन, उपनिषद् आदि ग्रंथो में वर्णित योग विद्या का प्रचार-प्रसार करने वाला हो, इत्यादि।
किसी व्यक्ति में लम्बे काल तक इन गुणों का परीक्षण करना चाहिये। लम्बे परीक्षण के पश्चात् यदि उस व्यक्ति में उपर्युक्त गुण उपलब्ध हों, तभी उसे गुरु बनाना चाहिये॥२६॥