Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 1/24

1/24
Sutra
क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ १.२४ ॥

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Inception

अव० अर्थ - अथ प्रधानपुरुषव्यतिरिक्तः कोऽयमीश्वरो नामेति ?

अब प्रधान और पुरुष (इन दोनों तत्त्वों) से पृथक् यह ईश्वर कौन है ?

Word Meaning

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः॥२४॥

शब्दार्थ - (क्लेश-कर्म विपाक-आशयैः) अविद्यादि पाँच क्लेश, शुभाशुभ मिश्रित कर्म, कर्मों के फल = सुख-दुःख, उनके भोगों के संस्कार = वासनायें, इन सबसे (अपरामृष्टः) सम्बन्धरहित (पुरुषविशेष :) जीवों से भिन्न स्वभाववाला चेतनविशेष (ईश्वरः) ईश्वर है। 

सूत्रार्थ - अविद्यादि पाँचों क्लेश, शुभाशुभमिश्रित त्रिविध कर्म, कर्मों के फल सुखदुःख, इनके भोगों के संस्कार = वासनायें, इन सबके सम्बन्ध से रहित जीवों से भिन्न स्वभाव वाला चेतनविशेष 'ईश्वर' है।

Vyas Bhashya

अविद्यादयः क्लेशाः, कुशलाकुशलानि कर्माणि, तत्फलं विपाकः, तदनुगुणा वासना आशयाः। ते च मनसि वर्तमानाः पुरुषे व्यपदिश्यन्ते, स हि तत्फलस्य भोक्तेति। यथा जय: पराजयो वा योद्धृषु वर्तमानः स्वामिनि व्यपदिश्यते। यो ह्यनेन भोगेनापरामृष्टः स पुरुषविशेष ईश्वरः। कैवल्यं प्राप्तास्तर्हि सन्ति च बहवः केवलिनः, ते हि त्रीणि बन्धनानि च्छित्त्वा कैवल्यं प्राप्ताः। ईश्वरस्य च तत्संबन्धो न भूतो न भावी। यथा मुक्तस्य पूर्वा बन्धकोटिः प्रज्ञायते नैवमीश्वरस्य। यथा वा प्रकृतिलीनस्योत्तरा बन्धकोटि: सम्भाव्यते, नैवमीश्वरस्य। स तु सदैव मुक्तः सदैवेश्वर इति। योऽसौ प्रकृष्टसत्त्वोपादानादीश्वरस्य शाश्वतिक उत्कर्षः स किं सनिमित्त आहोस्विन्निर्निमित्त इति ? तस्य शास्त्रं निमित्तम्। शास्त्रं पुनः किंनिमित्तम् ? प्रकृष्टसत्त्वनिमित्तम्।

एतयोः शास्त्रोत्कर्षयोरीश्वरसत्त्वे वर्तमानयोरनादिः संबन्धः। एतस्मादेतद्भवति सदैवेश्वरः सदैव मुक्त इति। तच्च तस्यैश्वर्यं साम्यातिशयविनिर्मुक्तम्, न तावदैश्वर्यान्तरेण तदतिशय्यते। यदेवातिशयि स्यात्तदेव तत्स्यात्। तस्माद्यत्र काष्ठाप्राप्तिरैश्वर्यस्य स ईश्वरः। न च तत्समानमैश्वर्यमस्ति, कस्मात्, द्वयोस्तुल्ययोरेकस्मिन्युगपत्कामितेऽर्थे नवमिदमस्तु पुराणमिदमस्त्वित्येकस्य सिद्धावितरस्य प्रकाम्यविघातादूनत्वं प्रसक्तम्। द्वयोश्च तुल्ययोर्युगपत्कामितार्थप्राप्तिर्नास्ति, अर्थस्य विरुद्धत्वात्। तस्माद्यस्य साम्यातिशयैर्विनिर्मुक्तमैश्वर्यं स एवेश्वरः। स च पुरुषविशेष इति॥२४॥

व्या० भा० अ० - अविद्यादि पाँच 'क्लेश' हैं। पुण्यापुण्य 'कर्म' हैं। उनका फल 'विपाक' है। फलभोगानुसार बनने वाले संस्कार 'आशय' हैं। मन में वर्तमान वे (क्लेशादि) पुरुष में कहे जाते हैं ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि पुरुष ही उस फल का भोक्ता है। जैसे योद्धाओं में वर्त्तमान जय वा पराजय राजा में कही जाती है। जो इस भोग से रहित है वह पुरुषविशेष 'ईश्वर' है।

कैवल्य को प्राप्त हुए अनेक केवली है। वे आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक नामक तीन बन्धनों को दूर करके कैवल्य को प्राप्त हुए हैं। ईश्वर का उन बन्धनों से सम्बन्ध न हुआ न होगा। जिस प्रकार मुक्तपुरुष का मुक्ति से पूर्व बन्धन होता है, उस प्रकार ईश्वर का बन्धन कभी नहीं होता। जैसे प्रकृतिलीन योगी का समाधि भङ्ग होने पर बन्धन होता है वैसे ईश्वर का बन्धन नहीं होता। वह सदा ही मुक्त है और सदैव ईश्वर है।

सूत्र में जो उत्कृष्ट गुण-कर्म-स्वभाव वाले ईश्वर का ग्रहण है उसका वह शाश्वतिक उत्कर्ष प्रामाणिक है वा अप्रामाणिक ? उसमें शास्त्र प्रमाण है। शास्त्र में क्या प्रमाण है? उसमें प्रमाण है उत्कृष्ट गुण, कर्म, स्वभाव वाला ईश्वर।

ईश्वर में विद्यमान उत्कृष्ट गुण, कर्म, स्वभाव एवं शास्त्र इन दोनों का अनादि सम्बन्ध है। इससे यह सिद्ध होता है कि वह सदा ही ईश्वर है और सदा ही मुक्त है। और उसका वह ऐश्वर्य (किसी अन्य के ऐश्वर्य की) समानता या अधिकता से रहित है। किसी अन्य के ऐश्वर्य से वह (ईश्वर का ऐश्वर्य) उल्लंघित नहीं होता। जो ही ऐश्वर्य अतिशयी होवे वह ही वह (ईश्वर का ऐश्वर्य) है। इसलिये जिसमें ऐश्वर्य की पराकाष्ठा होती है, वह ईश्वर है। उसके समान ऐश्वर्य नहीं है। किस कारण ? समान कोटि के दो ऐश्वर्यवालों के होने पर, दोनों ऐश्वर्यवालों को अभीष्ट किसी एक पदार्थ के विषय में एक ही काल में "यह नवीन हो यह पुरातन हो।" इस प्रकार के विरुद्ध सङ्कल्प के होने पर, एक ही सङ्कल्पसिद्धि होने में दूसरे के अभीष्ट का खण्डन हो जाने से दूसरे ऐश्वर्य में न्यूनता आ जायेगी। क्योंकि 'नवीनता और पुराणता' इन दोनों के एक-दूसरे के सर्वथा विरुद्ध होने के कारण उस पदार्थ में एक ही समय में दोनों का अभीष्ट सङ्कल्प एक साथ सिद्ध हो नहीं सकता। इसलिए जिसका ऐश्वर्य समानता एवं अतिशय से मुक्त है, वह ही ईश्वर है और वह पुरुषविशेष है॥२४॥

Yog Prakash

इस सूत्र में ईश्वर के स्वरूप का वर्णन है।

पुरुष शब्द से ईश्वर और जीवात्मा दोनों का ग्रहण होता है। यहाँ पर ईश्वर को पुरुषविशेष कहा है। इससे पूर्व सूत्र में ईश्वरप्रणिधान से समाधि की शीघ्र प्राप्ति बतलाई है। परन्तु जब तक साधक ईश्वर के स्वरूप को शब्दप्रमाण अथवा अनुमानप्रमाण से अच्छी प्रकार से नहीं जानता तब तक ईश्वरप्रणिधान नहीं कर सकता। इसलिये सूत्रकार ने उसका लक्षण बतलाया है।

जो क्लेशों से रहित है, वह ईश्वर है। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ये पाँच क्लेश हैं। जो जीवों को दुःख देते हैं वे क्लेश कहे जाते हैं। संसार में जितने भी मनुष्य, पशु आदि देहधारी प्राणी हैं, उन सबके दुःख का कारण मुख्यरूपेण ये क्लेश हैं। जब जीवात्मा योगाभ्यास से मोक्ष प्राप्त कर लेता है, तब एक सीमितकाल पर्यन्त इन क्लेशों से छूट जाता है। परन्तु मोक्ष की

अवधि समाप्त होने पर पुनः मुक्ति की प्राप्ति से पूर्व सञ्चित अपने शेष कर्म तुल्य पाप पुण्य के आधार पर ईश्वर की व्यवस्था से संसार में जन्म लेता है। जन्म लेने पर पुनः क्लेश दुःख देने लगते हैं। इस प्रकार से जीवात्मा कभी क्लेशयुक्त और कभी क्लेशमुक्त होता रहता है। परन्तु ईश्वर कभी भी क्लेशयुक्त नहीं होता। ऐसा ईश्वर जीवों से पृथक् पुरुषविशेष है। चेष्टा विशेष का नाम कर्म है। कर्म दो प्रकार के हैं - सकाम और निष्काम। सकाम कर्म के तीन भेद हैं- शुभ, अशुभ और मिश्रित।

जीवात्मा शुभ, अशुभ और मिश्रित कर्म करता रहता है। जो सकाम शुभ, अशुभ और मिश्रित कर्म कभी भी नहीं करता, सदा निष्कामकर्म ही करता है, वह ईश्वर है। सूत्र में कर्म शब्द के प्रयोग से यह नहीं समझना चाहिये के ईश्वर कोई भी कर्म नहीं करता। ईश्वर कर्म करता है और सदा शुभकर्म ही करता है किन्तु कभी अशुभ कर्म नहीं करता। यदि ईश्वर कर्म न करे तो सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और जीवों को कर्मानुसार फल देना आदि कार्य सिद्ध नहीं हो सकते।

कर्मों के फल को 'विपाक' कहते हैं। जीवात्माएँ शुभाशुभ और मिश्रित कर्मों के फलों को सुख-दुःख रूप में भोगती हैं। जो कर्मों के सुख-दुःख फल को कभी नहीं भोगता, वह ईश्वर है। इसलिये वह पुरुषविशेष है।

शुभाशुभ और मिश्रित कर्मों के सुख, दुःख फल को भोगने से जो संस्कार उत्पन्न होते हैं उनको 'आशय' कहते हैं। जीवात्माएँ सुख-दुःख फलों को भोगती हैं, अतः संस्कारयुक्त होती हैं। ईश्वर सुख-दुःख का भोग कभी नहीं करता अतः उसमें ऐसे संस्कार भी नहीं बनते।

ईश्वर में अनन्तज्ञान, अनन्तबल, अनन्त आनन्द, अनन्तक्रिया है। यह उसका ऐश्वर्य है। जैसा उसका ऐश्वर्य है वैसा ऐश्वर्य न जीवों का, न प्रकृति का और न विकृति का है। जब समान ऐश्वर्य नहीं है तो उससे अधिक तो हो ही नहीं सकता। ईश्वर के अनन्त ऐश्वर्य की सिद्धि अनुमान प्रमाण से भी होती है। इस सृष्टि की रचना को देखने से यह ज्ञात होता है कि इसके रचयिता में अनन्तज्ञान, अनन्तबल और अनन्तक्रिया है क्योंकि उस प्रकार के सामर्थ्य के बिना संसार की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और जीवों के कर्मफल की व्यवस्था नहीं हो सकती।

कोई यह कह सकता है कि यह सृष्टि अनादिकाल से जैसी की तैसी चली आ रही है इसका बनाने वाला कोई नहीं है। इसका समाधान यह है कि जो वस्तु तोड़ने से टूट जाती है, वह अनादि नहीं हो सकती। जैसे - शरीर, वृक्षादि तोड़ने से टूट जाते हैं, वैसे ही पृथिवी भी तोड़ने से टूट जाती है। जैसे शरीर, वृक्षादि पदार्थ उत्पन्न होते हैं और नष्ट होते हैं वैसे ही सृष्टि उत्पन्न और नष्ट होती है। यह न अनादिकाल से जैसी की तैसी चली आ रही है और न ऐसी ही रहेगी। इसलिए इस संसार का बनाने वाला अनन्त ऐश्वर्यवान् ईश्वर है।

कोई यह भी कह सकता है कि इस सृष्टि का एक उपादानकारण है, उसको सांख्यदर्शन की भाषा में प्रकृति अर्थात् सत्त्व-रजस्-तमस् नामक सूक्ष्म पदार्थ कहते हैं। उन्हीं सूक्ष्म पदार्थों सेसृष्टि की रचना होती है। उन में सृष्टि बनाने का स्वभाव है, उनसे इस सृष्टि की उत्पत्ति हो जाती है। अतः अनन्त ऐश्वर्य वाले ईश्वर के मानने की आवश्यकता नहीं है। इसका समाधान यह है कि जिन सूक्ष्मपदार्थों से यह सृष्टि बनी है, वे जड़ पदार्थ हैं अर्थात् ज्ञानरहित हैं। ज्ञानरहित होने से विचारपूर्वक वे सब मिलकर जीवों के प्रयोजनों को जानकर उनके लिये अनुकूल विभिन्न प्रकार के संसार को नहीं बना सकते। जैसे कि इस मिट्टी के अणु विचारपूर्वक मिलकर यह योजना बनायें कि "हम मिलकर ईंट बना कर ऐसे भवन का निर्माण करेंगे जिससे अनेक मनुष्यों को सुख की प्राप्ति होगी।" ऐसा नहीं हो सकता। इसी प्रकार से लोहे के सूक्ष्मकण मिलकर स्वयं विमान नहीं बन सकते। घड़ी आदि बुद्धिपूर्वक निर्मित जितनी भी वस्तुएँ हैं उन सब के निर्माता चेतन जीव शरीरधारी होते हैं, वे सब पदार्थ अपने आप नहीं बनते। अतः अनन्त ऐश्वर्यवान् एक चेतन पदार्थ सृष्टि का कर्त्ता है।।

 

कोई यह कह सकता है कि अनेक जीवात्माएँ मिलकर अपने सामर्थ्य से संसार की रचना कर लेंगे। ईश्वर को मानने की आवश्यकता नहीं है। इसका समाधान यह है कि प्रथम सृष्टि की रचना होती है। पश्चात् शरीरों की रचना होती है। उन शरीरों में रहकर अग्नि, जल, वायु, अन्न आदि अनेक पदार्थों की सहायता से शरीरधारी जीव कुछ वस्तुओं का निर्माण करते हैं। सृष्टि की रचना से पूर्व वे कुछ भी नहीं कर सकते। अतः सृष्टिकर्त्ता ईश्वर का मानना आवश्यक है।

यह भी प्रश्न उठता है कि ईश्वर ने सृष्टि की रचना क्यों की ? इसका उत्तर यह है कि जीवात्माओं को लौकिकसुख, मोक्षसुख और पूर्वसृष्टि में किये हुए कर्मों का फल देने के लिए ईश्वर ने सृष्टि की रचना की है।

कुछ लोगों की यह मान्यता है कि ईश्वर के सान्निध्य से सृष्टि स्वयं बन जाती है, ईश्वर कुछ नहीं करता। यह मान्यता ठीक नहीं है। क्योंकि बुद्धिपूर्वक रचना के लिये ज्ञान और बल का सहयोग अनिवार्य है। यदि ईश्वर अपने ज्ञान और बल का प्रयोग न करे तो सृष्टि की रचना सान्निध्यमात्र से कभी नहीं हो सकती। इसलिये सृष्टिकर्त्ता ईश्वर ही को मानना अनिवार्य है॥२४॥

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