इस सूत्र में ईश्वर के स्वरूप का वर्णन है।
पुरुष शब्द से ईश्वर और जीवात्मा दोनों का ग्रहण होता है। यहाँ पर ईश्वर को पुरुषविशेष कहा है। इससे पूर्व सूत्र में ईश्वरप्रणिधान से समाधि की शीघ्र प्राप्ति बतलाई है। परन्तु जब तक साधक ईश्वर के स्वरूप को शब्दप्रमाण अथवा अनुमानप्रमाण से अच्छी प्रकार से नहीं जानता तब तक ईश्वरप्रणिधान नहीं कर सकता। इसलिये सूत्रकार ने उसका लक्षण बतलाया है।
जो क्लेशों से रहित है, वह ईश्वर है। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ये पाँच क्लेश हैं। जो जीवों को दुःख देते हैं वे क्लेश कहे जाते हैं। संसार में जितने भी मनुष्य, पशु आदि देहधारी प्राणी हैं, उन सबके दुःख का कारण मुख्यरूपेण ये क्लेश हैं। जब जीवात्मा योगाभ्यास से मोक्ष प्राप्त कर लेता है, तब एक सीमितकाल पर्यन्त इन क्लेशों से छूट जाता है। परन्तु मोक्ष की
अवधि समाप्त होने पर पुनः मुक्ति की प्राप्ति से पूर्व सञ्चित अपने शेष कर्म तुल्य पाप पुण्य के आधार पर ईश्वर की व्यवस्था से संसार में जन्म लेता है। जन्म लेने पर पुनः क्लेश दुःख देने लगते हैं। इस प्रकार से जीवात्मा कभी क्लेशयुक्त और कभी क्लेशमुक्त होता रहता है। परन्तु ईश्वर कभी भी क्लेशयुक्त नहीं होता। ऐसा ईश्वर जीवों से पृथक् पुरुषविशेष है। चेष्टा विशेष का नाम कर्म है। कर्म दो प्रकार के हैं - सकाम और निष्काम। सकाम कर्म के तीन भेद हैं- शुभ, अशुभ और मिश्रित।
जीवात्मा शुभ, अशुभ और मिश्रित कर्म करता रहता है। जो सकाम शुभ, अशुभ और मिश्रित कर्म कभी भी नहीं करता, सदा निष्कामकर्म ही करता है, वह ईश्वर है। सूत्र में कर्म शब्द के प्रयोग से यह नहीं समझना चाहिये के ईश्वर कोई भी कर्म नहीं करता। ईश्वर कर्म करता है और सदा शुभकर्म ही करता है किन्तु कभी अशुभ कर्म नहीं करता। यदि ईश्वर कर्म न करे तो सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और जीवों को कर्मानुसार फल देना आदि कार्य सिद्ध नहीं हो सकते।
कर्मों के फल को 'विपाक' कहते हैं। जीवात्माएँ शुभाशुभ और मिश्रित कर्मों के फलों को सुख-दुःख रूप में भोगती हैं। जो कर्मों के सुख-दुःख फल को कभी नहीं भोगता, वह ईश्वर है। इसलिये वह पुरुषविशेष है।
शुभाशुभ और मिश्रित कर्मों के सुख, दुःख फल को भोगने से जो संस्कार उत्पन्न होते हैं उनको 'आशय' कहते हैं। जीवात्माएँ सुख-दुःख फलों को भोगती हैं, अतः संस्कारयुक्त होती हैं। ईश्वर सुख-दुःख का भोग कभी नहीं करता अतः उसमें ऐसे संस्कार भी नहीं बनते।
ईश्वर में अनन्तज्ञान, अनन्तबल, अनन्त आनन्द, अनन्तक्रिया है। यह उसका ऐश्वर्य है। जैसा उसका ऐश्वर्य है वैसा ऐश्वर्य न जीवों का, न प्रकृति का और न विकृति का है। जब समान ऐश्वर्य नहीं है तो उससे अधिक तो हो ही नहीं सकता। ईश्वर के अनन्त ऐश्वर्य की सिद्धि अनुमान प्रमाण से भी होती है। इस सृष्टि की रचना को देखने से यह ज्ञात होता है कि इसके रचयिता में अनन्तज्ञान, अनन्तबल और अनन्तक्रिया है क्योंकि उस प्रकार के सामर्थ्य के बिना संसार की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और जीवों के कर्मफल की व्यवस्था नहीं हो सकती।
कोई यह कह सकता है कि यह सृष्टि अनादिकाल से जैसी की तैसी चली आ रही है इसका बनाने वाला कोई नहीं है। इसका समाधान यह है कि जो वस्तु तोड़ने से टूट जाती है, वह अनादि नहीं हो सकती। जैसे - शरीर, वृक्षादि तोड़ने से टूट जाते हैं, वैसे ही पृथिवी भी तोड़ने से टूट जाती है। जैसे शरीर, वृक्षादि पदार्थ उत्पन्न होते हैं और नष्ट होते हैं वैसे ही सृष्टि उत्पन्न और नष्ट होती है। यह न अनादिकाल से जैसी की तैसी चली आ रही है और न ऐसी ही रहेगी। इसलिए इस संसार का बनाने वाला अनन्त ऐश्वर्यवान् ईश्वर है।
कोई यह भी कह सकता है कि इस सृष्टि का एक उपादानकारण है, उसको सांख्यदर्शन की भाषा में प्रकृति अर्थात् सत्त्व-रजस्-तमस् नामक सूक्ष्म पदार्थ कहते हैं। उन्हीं सूक्ष्म पदार्थों सेसृष्टि की रचना होती है। उन में सृष्टि बनाने का स्वभाव है, उनसे इस सृष्टि की उत्पत्ति हो जाती है। अतः अनन्त ऐश्वर्य वाले ईश्वर के मानने की आवश्यकता नहीं है। इसका समाधान यह है कि जिन सूक्ष्मपदार्थों से यह सृष्टि बनी है, वे जड़ पदार्थ हैं अर्थात् ज्ञानरहित हैं। ज्ञानरहित होने से विचारपूर्वक वे सब मिलकर जीवों के प्रयोजनों को जानकर उनके लिये अनुकूल विभिन्न प्रकार के संसार को नहीं बना सकते। जैसे कि इस मिट्टी के अणु विचारपूर्वक मिलकर यह योजना बनायें कि "हम मिलकर ईंट बना कर ऐसे भवन का निर्माण करेंगे जिससे अनेक मनुष्यों को सुख की प्राप्ति होगी।" ऐसा नहीं हो सकता। इसी प्रकार से लोहे के सूक्ष्मकण मिलकर स्वयं विमान नहीं बन सकते। घड़ी आदि बुद्धिपूर्वक निर्मित जितनी भी वस्तुएँ हैं उन सब के निर्माता चेतन जीव शरीरधारी होते हैं, वे सब पदार्थ अपने आप नहीं बनते। अतः अनन्त ऐश्वर्यवान् एक चेतन पदार्थ सृष्टि का कर्त्ता है।।
कोई यह कह सकता है कि अनेक जीवात्माएँ मिलकर अपने सामर्थ्य से संसार की रचना कर लेंगे। ईश्वर को मानने की आवश्यकता नहीं है। इसका समाधान यह है कि प्रथम सृष्टि की रचना होती है। पश्चात् शरीरों की रचना होती है। उन शरीरों में रहकर अग्नि, जल, वायु, अन्न आदि अनेक पदार्थों की सहायता से शरीरधारी जीव कुछ वस्तुओं का निर्माण करते हैं। सृष्टि की रचना से पूर्व वे कुछ भी नहीं कर सकते। अतः सृष्टिकर्त्ता ईश्वर का मानना आवश्यक है।
यह भी प्रश्न उठता है कि ईश्वर ने सृष्टि की रचना क्यों की ? इसका उत्तर यह है कि जीवात्माओं को लौकिकसुख, मोक्षसुख और पूर्वसृष्टि में किये हुए कर्मों का फल देने के लिए ईश्वर ने सृष्टि की रचना की है।
कुछ लोगों की यह मान्यता है कि ईश्वर के सान्निध्य से सृष्टि स्वयं बन जाती है, ईश्वर कुछ नहीं करता। यह मान्यता ठीक नहीं है। क्योंकि बुद्धिपूर्वक रचना के लिये ज्ञान और बल का सहयोग अनिवार्य है। यदि ईश्वर अपने ज्ञान और बल का प्रयोग न करे तो सृष्टि की रचना सान्निध्यमात्र से कभी नहीं हो सकती। इसलिये सृष्टिकर्त्ता ईश्वर ही को मानना अनिवार्य है॥२४॥