Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 1/22

1/22
Sutra
मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषः ॥ १.२२ ॥

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ततोऽपि विशेषः॥२२॥

शब्दार्थ - (मृदु-मध्य-अधिमात्रत्वात्) ऊँचे विवेक-वैराग्य और अभ्यास के भी मृदुमध्य-अधिमात्र भेद होने से ( तत:-अपि-विशेषः) अपेक्षाकृत ऊँचे विवेक-वैराग्य-अभ्यास वाले योगियों को शीघ्र समाधिलाभ और समाधिफल की प्राप्ति होती है।

सूत्रार्थ - ऊँचे विवेक-वैराग्य-अभ्यास के भी कम, मध्यम और अधिक होने से पूर्व की अपेक्षा अधिक ऊँचे विवेक वैराग्य - अभ्यास वाले योगियों को शीघ्र समाधि-लाभ व समाधिफल की प्राप्ति होती है।

Vyas Bhashya

मृदुतीव्रो मध्यतीव्रोऽधिमात्रतीव्र इति, ततोऽपि विशेषः। तद्विशेषान्मृदु तीव्रसंवेगस्यासन्नस्ततो मध्यतीव्रसंवेगस्यासन्नतरस्तस्मादधिमात्रतीव्रसंवेगस्याधिमात्रोपायस्यासन्नतमः समाधिलाभः समाधिफलं चेति॥२२॥

व्या० भा० अ० - मृदुतीव्र, मध्यतीव्र, अधिमात्रतीव्र, इस प्रकार होने से उससे भी विशेष है। उस विशेष के कारण मदतीव्रसंवेग वाले का समाधिलाभ और समाधिफल समीप, मध्यतीव्र संवेग वाले का उससे अधिक समीप (समीपतर) अधिमात्र तीव्रसंवेग और अधिमात्र उपाय वाले का उससे भी अधिक समीप (समीपतम) होता है॥२२॥

Yog Prakash

यहाँ पर वह बतलाया गया है कि योग साधनों के अनुष्ठान भिन्न-भिन्न स्तर से होने के कारण योगियों को न्यूनाधिक काल में समाधि और मोक्ष की प्राप्ति होती है। 
समाधि प्राप्ति में काल का कम अधिक लगना योगविद्या के प्रशिक्षण देने वाले आचार्यों की न्यूनाधिक योग्यता पर भी आश्रित है। जो ईश्वरसाक्षात्कार तक पहुँचे हुए योगी, वेद और वेदानुकूल ऋषिकृत ग्रन्थों के विद्वान् योगविद्या के पढ़ाने और उसका क्रियात्मकरूप में प्रशिक्षण देने में निपुण हैं, शिष्यों को इस विद्या को देने में अधिक समय देने वाले हैं, इस विद्या को पढ़ाने के मुख्यलक्ष्य वाले हैं, ऐसे आचार्यों से योगविद्या पढ़ने, से शीघ्र प्राप्ति होती है। ऐसे गुरुओं के सानिध्य में रहने वाले, सर्वदा सर्वथा उनकी आज्ञा का पालन करनेवाले और निष्कामभाव से परोपकार करने वाले शिष्यों को शीघ्र सफलता मिलती है और अन्यों को विलम्ब से। शीघ्र सफलता प्राप्ति के अन्य साधन हैं जैसे कि यदि राजा और प्रजा योगविद्या के पढ़ने-पढ़ाने में तन, मन, धन से पूर्ण सहयोग देवें, विद्यालयों में इसके प्रशिक्षण की उत्तम व्यवस्था हो और वे राजा एवं प्रजा मोक्ष प्राप्त करना-करवाना ही अपने जीवन का लक्ष्य समझते हों। इससे योगाभ्यासियों को शीघ्र ही सफलता मिलती है अन्यथा अधिक समय लगता है॥२२॥

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