'संवेग' शब्द का अर्थ विवेक एवं वैराग्य है। 'उपाय' शब्द का अर्थ अभ्यास है। समाधि प्राप्ति के ये दोनों मुख्यसाधन हैं। इनको पहले लिखा भी है। इन तीनों साधनों का विशेष रूप से प्रयोग करने वाला योगी शीघ्र ही समाधि लाभ प्राप्त करता है।
विवेक, वैराग्य और अभ्यास को अपने सामर्थ्य के आधार पर भिन्न-भिन्न स्तर से प्रयोग करने वाले योगियों के नौ भेद नीचे लिखे जाते हैं -
मृदु अभ्यास, मृदुविवेक, मृदुवैराग्य, वाले योगियों को समाधि और मोक्ष की प्राप्ति अधिक काल में होती है।
मृदु अभ्यास, मध्यविवेक, मध्यवैराग्य वाले योगियों को समाधि और मोक्ष की प्राप्ति पूर्वोक्त काल से कुछ न्यूनकाल में होती है।
मृदु अभ्यास, तीव्रविवेक, तीव्रवैराग्य वाले योगियों को समाधि और मोक्ष की प्राप्ति पूर्वोक्त काल से कुछ न्यूनकाल में होती है।
मध्य अभ्यास, मृदुविवेक, मृदुवैराग्य वाले योगियों को समाधि और मोक्ष की प्राप्ति पूर्वोक्त काल से कुछ न्यूनकाल में होती है।
मध्य अभ्यास, मध्यविवेक, मध्य वैराग्य वाले योगियों को समाधि और मोक्ष की प्राप्ति पूर्वोक्त काल से कुछ न्यूनकाल में होती है।
मध्य अभ्यास, तीव्र विवेक, तीव्र वैराग्य वाले योगियों को समाधि और मोक्ष की प्राप्ति पूर्वोक्त काल से कुछ न्यूनकाल में होती है।
अधिमात्र अभ्यास, मृदु विवेक, मृदु वैराग्य वाले योगियों को समाधि और मोक्ष की प्राप्ति पूर्वोक्त काल से कुछ न्यूनकाल में होती है।
अधिमात्र अभ्यास, मध्य विवेक, मध्य वैराग्य वाले योगियों को समाधि और मोक्ष की प्राप्ति पूर्वोक्त काल से कुछ न्यूनकाल में होती है।
अधिमात्र अभ्यास, तीव्र विवेक, तीव्र वैराग्य वाले योगियों को समाधि की प्राप्ति पूर्वोक्त काल से कुछ न्यूनकाल में होती है।
प्रायः योगाभ्यासियों के मन में यह जिज्ञासा रहती है कि कितने काल तक साधना करने पर समाधि और मोक्ष प्राप्ति होती है। इस विषय में सूत्रकार ने कहा है कि इनकी प्राप्ति में समय की सीमा नहीं है। इसी बात को सांख्यकार कपिलाचार्य जी ने भी कहा है कि "न काल नियमो वामदेववत्"॥सांख्य० ४/२०॥ जैसे वामदेव ने ऊँचे विवेक, वैराग्य, अभ्यास, श्रद्धा, वीर्य और यमनियमादि आठ अङ्गों के तीव्र अनुष्ठान से अल्पकाल में ही असम्प्रज्ञात समाधि और मोक्ष को प्राप्त कर लिया था। वैसे ही प्रत्येक योगाभ्यासी इनकी सिद्धि कर सकता है।
साधक को यह भी जानना आवश्यक है कि कृतकृत्यता प्राप्त करने के लिये जैसे योगसाधनों के तीव्र अनुष्ठान की आवश्यकता है, वैसे ही योग के विरोधी कारण अविद्या, अधर्माचरण, विपरीत उपासना, सकाम कर्म, अविद्यायुक्त ग्रन्थों का पठनपाठन, अशुद्ध खानपान और तीन एषणादि को शीघ्र छोड़ना आवश्यक है। उसके साथ समाधि से मिलने वाले फल को भी जान लेवें। संक्षेप में असम्प्रज्ञात समाधि से प्राप्त होने वाले फल १. ईश्वरसाक्षात्कार, २ . जीवात्मा के स्वरूप का विशेष परिज्ञान, ३. व्याधि आदि विघ्नों तथा उपविघ्नों का नाश, ४. ईश्वर का साक्षात्कार होने पर आनन्द की प्राप्ति, ५. क्लेशों का नाश, ६. योगाभ्यासी का मुक्ति का अधिकारी बनकर जन्ममरणादि समस्त बन्धनों से छूटना इत्यादि अनेक फलों की प्राप्ति होती है॥२१॥