Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 1/2

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Sutra
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ १.२ ॥

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Inception

अवतरणिका - तस्य लक्षणाभिधित्सयेदं सूत्रं प्रववृते – 

अर्थ - उस योग का लक्षण करने की इच्छा से यह सूत्र प्रवृत्त हुआ है - 

Word Meaning

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥२॥

शब्दार्थ - (योगः) समाधि (चित्त-वृत्ति-निरोध:) चित्त की वृत्तियों का निरोध। 

सूत्रार्थ - चित्त की वृत्तियों का निरोध = रुक जाना 'योग' अर्थात् 'समाधि' है। 

Vyas Bhashya

सर्वशब्दाग्रहणात्संप्रज्ञातोऽपि योग इत्याख्यायते। चित्तं हि प्रख्याप्रवृत्तिस्थितिशीलत्वात्रिगुणम्।

प्रख्यारूपं हि चित्तसत्त्वं रजस्तमोभ्यां संसृष्टमैश्वर्यविषयप्रियं भवति। तदेव तमसानुविद्धमधर्माज्ञानावैराग्यानैश्वर्योपगं भवति। तदेव प्रक्षीणमोहावरणं सर्वतः प्रद्योतमानमनुविद्धं रजोमात्रया धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्योपगं भवति।

तदेव रजोलेशमलापेतं स्वरूपप्रतिष्ठं सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रं धर्ममेघध्यानोपगं भवति। तत्परं प्रसंख्यानमित्याचक्षते ध्यायिनः। चितिशक्तिरपरिणामिन्यप्रतिसंक्रमा दर्शितविषया शुद्धा चानन्ता च, सत्त्वगुणात्मिका चेयमतो विपरीता विवेकख्यातिरिति। अतस्तस्यां विरक्तं चित्तं तामपि ख्यातिं निरुणद्धि। तदवस्थं संस्कारोपगं भवति। स निर्बीजः समाधिः। न तत्र किञ्चित्संप्रज्ञायत इत्यसंप्रज्ञातः। द्विविधः स योगश्चित्तवृत्तिनिरोध इति॥२॥

व्या० भा० अ० - सूत्र में 'सर्व' शब्द का ग्रहण न होने से 'सम्प्रज्ञात समाधि' भी योग कही जाती है। चित्त तीन प्रकार के स्वभाववाला प्रकाशशील, गतिशील और स्थितिशील है। इससे यह त्रिगुणात्मक है।

प्रकाशशील चित्त, सत्त्व, रजस् एवं तमस् से संसृष्ट होकर ऐश्वर्य एवं विषय का इच्छुक होता है। वही चित्तसत्त्व तमस् के द्वारा बिंधा हुआ अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य एवं अनैश्वर्य को प्राप्त होता है। वही (चित्तसत्त्व) क्षीणमोहावरणवाला सब ओर से प्रकाशमान्, रजोमात्रा से संसृष्ट धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य को प्राप्त होता है।

वही (चित्तसत्त्व) रजोगुण की मात्रा रूपी मल के सम्पर्क से पृथक् हुआ, अपने शुद्ध (सात्त्विक) रूप में प्रतिष्ठित और बुद्धि तथा पुरुष की पृथक्ता के ज्ञान से युक्त, धर्ममेघ समाधि को प्राप्त होता है। योगी लोग उस (धर्ममेघ समाधिनिष्ठ चित्त) को 'परं प्रसंख्यान' कहते हैं। चेतन पुरुष परिणाम से रहित, निर्लेप (बुद्धि आदि के सम्मिश्रण से रहित) विषयों का द्रष्टा, शुद्ध (पवित्र), नाशरहित है। सत्त्वगुणात्मिका यह विवेकख्याति इस चितिशक्ति = जीवात्मा से विरुद्ध स्वभाव वाली है। उस विवेकख्याति के प्रति विरक्त चित्त उसको भी रोक देता है। उस अवस्था को प्राप्त चित्त संस्कारमात्रशेष स्थिति वाला होता है। वह निर्बीज समाधि है। उस अवस्था में सम्प्रज्ञात स्थिति में ज्ञात पदार्थों का परिज्ञान नहीं होता। वह चित्तवृत्तिनिरोध योग दो प्रकार का है॥२॥

Yog Prakash

इस सूत्र में योग के स्वरूप का वर्णन है। सूत्र में 'सर्व' शब्द का ग्रहण न होने से 'सम्प्रज्ञात समाधि' भी योग कही जाती है।

चित्त तीन प्रकार के स्वभाव वाला अर्थात् प्रकाशशील, गतिशील और स्थैर्यशील है; इससे त्रिगुणात्मक है। सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण चित्त के उपादान कारण हैं। इसीलिए उसका स्वभाव तीन प्रकार का है। चित्त में होने वाले वास्तविक और अवास्तविक ज्ञान को वृत्ति = व्यापार कहते हैं।

चित्त के निर्माण में सत्त्वगुण की प्रधानता है। परन्तु उसमें रजोगुण, तमोगुण भी मिश्रित रहते हैं। जिस समय चित्त में रजोगुण और तमोगुण का उभार होता है उस समय मनुष्य विविध ऐश्वर्यों का इच्छुक होता है। यह चित्त की 'क्षिप्तावस्था' है।

जब तमोगुण का उभार अधिक मात्रा में होता है तब व्यक्ति को अधर्म, अज्ञान आदि अधिक प्रिय लगते हैं। यह चित्त की 'मूढ़ावस्था' है। 

जब तमोगुण दब जाता है और रजोगुण का कुछ उभार होता है तब व्यक्ति की धर्म, ज्ञान, वैराग्य में अधिक रुचि होती है। यह चित्त की 'विक्षिप्तावस्था' है।

जब सत्त्वगुण की प्रधानता रहती है और रजोगुण, तमोगुण दब जाते हैं तो साधक धर्ममेघ समाधि में पहुँच जाता है। इस अवस्था को योगी लोग 'परं प्रसंख्यान' के नाम से कहते हैं। इस समाधि में पदार्थ का स्वरूप अच्छे प्रकार से परिज्ञात होता है। यह चित्त की 'एकाग्रावस्था' है।

ये विविध परिवर्तन चित्त में होते हैं, जीवात्मा में नहीं, क्योंकि चित्त परिवर्तनशील है, वह उत्पन्न होता है, और नष्ट भी होता है। जीवात्मा अपरिवर्तनशील है, न उत्पन्न होता है, और न नष्ट होता है।

धर्ममेघ समाधि के समय बुद्धि का और जीवात्मा का पृथक्-पृथक् स्वरूप ज्ञात रहता है। इस ज्ञान का नाम विवेकख्याति है। यह सत्त्वगुणात्मक है। जीवात्मा इससे भिन्न है। जब धर्ममेघ समाधि को प्राप्त योगी विवेकख्याति में भी दोष देखता है तो उससे भी वैराग्य हो जाता है। यह परवैराग्य है। यह असम्प्रज्ञात समाधि का साधन है। परवैराग्य से चित्त की समस्त वृत्तियों का निरोध हो जाता है और असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि हो जाती है। असम्प्रज्ञात समाधि को निर्बीज समाधि भी कहते हैं। यह चित्त की 'निरुद्धावस्था' है।

यह चित्त-वृत्ति-निरोध दो प्रकार का है एक सम्प्रज्ञात और दूसरा असम्प्रज्ञात। चित्तवृत्ति निरोध = 'असम्प्रज्ञात समाधि' की सिद्धि हो जाने पर योगी की क्या स्थिति होती है इसको सूत्रकार ने अगले सूत्र में कहा है॥२॥

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