इस सूत्र में योग के स्वरूप का वर्णन है। सूत्र में 'सर्व' शब्द का ग्रहण न होने से 'सम्प्रज्ञात समाधि' भी योग कही जाती है।
चित्त तीन प्रकार के स्वभाव वाला अर्थात् प्रकाशशील, गतिशील और स्थैर्यशील है; इससे त्रिगुणात्मक है। सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण चित्त के उपादान कारण हैं। इसीलिए उसका स्वभाव तीन प्रकार का है। चित्त में होने वाले वास्तविक और अवास्तविक ज्ञान को वृत्ति = व्यापार कहते हैं।
चित्त के निर्माण में सत्त्वगुण की प्रधानता है। परन्तु उसमें रजोगुण, तमोगुण भी मिश्रित रहते हैं। जिस समय चित्त में रजोगुण और तमोगुण का उभार होता है उस समय मनुष्य विविध ऐश्वर्यों का इच्छुक होता है। यह चित्त की 'क्षिप्तावस्था' है।
जब तमोगुण का उभार अधिक मात्रा में होता है तब व्यक्ति को अधर्म, अज्ञान आदि अधिक प्रिय लगते हैं। यह चित्त की 'मूढ़ावस्था' है।
जब तमोगुण दब जाता है और रजोगुण का कुछ उभार होता है तब व्यक्ति की धर्म, ज्ञान, वैराग्य में अधिक रुचि होती है। यह चित्त की 'विक्षिप्तावस्था' है।
जब सत्त्वगुण की प्रधानता रहती है और रजोगुण, तमोगुण दब जाते हैं तो साधक धर्ममेघ समाधि में पहुँच जाता है। इस अवस्था को योगी लोग 'परं प्रसंख्यान' के नाम से कहते हैं। इस समाधि में पदार्थ का स्वरूप अच्छे प्रकार से परिज्ञात होता है। यह चित्त की 'एकाग्रावस्था' है।
ये विविध परिवर्तन चित्त में होते हैं, जीवात्मा में नहीं, क्योंकि चित्त परिवर्तनशील है, वह उत्पन्न होता है, और नष्ट भी होता है। जीवात्मा अपरिवर्तनशील है, न उत्पन्न होता है, और न नष्ट होता है।
धर्ममेघ समाधि के समय बुद्धि का और जीवात्मा का पृथक्-पृथक् स्वरूप ज्ञात रहता है। इस ज्ञान का नाम विवेकख्याति है। यह सत्त्वगुणात्मक है। जीवात्मा इससे भिन्न है। जब धर्ममेघ समाधि को प्राप्त योगी विवेकख्याति में भी दोष देखता है तो उससे भी वैराग्य हो जाता है। यह परवैराग्य है। यह असम्प्रज्ञात समाधि का साधन है। परवैराग्य से चित्त की समस्त वृत्तियों का निरोध हो जाता है और असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि हो जाती है। असम्प्रज्ञात समाधि को निर्बीज समाधि भी कहते हैं। यह चित्त की 'निरुद्धावस्था' है।
यह चित्त-वृत्ति-निरोध दो प्रकार का है एक सम्प्रज्ञात और दूसरा असम्प्रज्ञात। चित्तवृत्ति निरोध = 'असम्प्रज्ञात समाधि' की सिद्धि हो जाने पर योगी की क्या स्थिति होती है इसको सूत्रकार ने अगले सूत्र में कहा है॥२॥